सफरनामा इंजेक्क्षन का

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विलियम होर्व नाम के एक सर्जन ने पहली बार 1628 में लिखा कि शरीर में रक्त के चलने का एक निश्चित सिद्धांत है। हृदय और धमनियों के बीच में रक्त एक निश्चित तरीके और गति से चलता रहता है। वहीं से रक्त धमनियांे में सुई लगाकर दवा पहुंचाने का विचार आरंभ हुआ। किंतु सन 1664 में इस बात को लेकर एक गंभीर विवाद उठ खड़ा हुआ कि इंजेक्शन की सुई लगाकर रक्त की धमनियों में दवा पहुंचाने का आविष्कारक कौन है? डाॅक्टर जाॅन डैनियल मेजर स्वयं को एवम् डाॅक्टर एलशोल्ज स्वयं को आविष्कारक मानते थे। पर इतिहास ने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर डाॅक्टर रैन को आविष्कारक माना। उनके पश्चात् इस कार्य को डाॅ. क्लार्क, डाॅ. मेजर, डाॅ. चाल्र्स, फ्रेकेसेट्स, डाॅ एलशोल्ज एवं डाॅ. होफमेन ने क्रमशः आगे बढ़ायाय।
एक दिन डाॅक्टर रैन ने राबर्ट बायल नामक एक सज्जन से कहा कि वे किसी भी द्रव्य पदार्थ को रक्त के प्रवाह में डाल सकते हैं। ये बात सन् 1656 की है। बायल ने तुरंत एक बड़े कुŸो की व्यवस्था कर डाली। उस कुŸो के अंदर इंजेक्शन द्वारा धतूरा डालने का प्रदर्शन चिकित्सकों एवं बुद्धिजीवी वर्ग के समक्ष किया गया। सारी प्रक्रिया बड़ी सफल रही। धतूरे ने कुŸो के ऊपर अपना असर दिखाया।मानव शरीर में दवा डालने का प्रयोग सन् 1657 में हुआ। क्रौक्स मैटलोरम नामक पदार्थ को एक घरेलू नौकर की रक्त धमनी में दिया गया। यह प्रक्रिया बहुत सफल नहीं रही। उधर डाॅक्टर टिमथी क्लर्क नामक एक सज्जन ने सन् 1668 में यह घोषणा की कि पिछले दस वर्षो से वे कई प्रकार के द्रव्यों को मानव शरीर के अंदर रक्त धमनियों से डालते आ रहे थे। पर वे अपने शोध से निराश ही रहे। उनकी यह विचारधारा बनी कि इलाज का यह तरीका बेकार है।
सन् 1661 में डाॅक्टर एलशोल्ज ने अपने परीक्षण प्रारंभ किये। उन्होंने जो खास बात देखी। वो यह थी कि कुŸाों की रक्त धमनियों में इंजेक्शन की सुई लगाना इंसानों से अधिक कठिन है। कुŸो की चमड़ी को काटकर, रक्त धमनी को सामने लाकर फिर सुई उसमें डालना एक समयलेवा काम था। पर इंसानों की रक्त धमनी में सुई द्वारा दवा डालने के लिए चमड़ी को काटना आवश्यक नहीं था।
अभी तक इंजेक्शन की सुई के ऊपर किसी का ज्यादा ध्यान नहीं गया था। आमतौर से सुइयां भौंडी तरह की होती थीं। सन 1844 के आसपास जब अधक्त्वचा (चमड़ी के सतह से थोड़ा नीचे) में इंजेक्शन दिया जाने लगा, तब सुईयों पर ध्यान दिया जाने लगा। इस तरह का सबसे पहला इंजेक्शन मीथ अस्पताल (डबर्लिन) में दिनांक 3 जून 1844 को फा्रंसिस रिन्ड द्वारा दिया गया। सत्रह वर्ष तक रिन्ड ने किसी को अपना औजार नहीं दिखाया। आखिरकार सन् 1861 में उन्होंने अपने खास तरह के इंजेक्शन के बारे में लेख लिखा।
सन् 1853 में एडिनवर्ग के डाक्टर ऐलिग्जेंडर बुड ने अपने तरीके से एक इंजेक्शन तैयार किया। इंजेक्शन 90 मि.मि. लंबा एवं 10 मि.मी. चैड़ा होता था। पिस्टर के ऊपरी हिस्से को रूई द्वारा लपेटा जाता था ताकि वो इंजेक्शन के अनुरूप फिट हो जाए।
आज इंजेक्शन की विधि में बहुत उन्नति हो गयी है। अब सुईयां और प्लास्टिक की बनी डिस्पोजल सिरिंज मिलने लगी हैं, जिनको एक बार ही इस्तेमाल किया जाता है।
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