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कैसे बढ़ाऐं पशुओं का दूध?

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पशुओं का दूध बढ़ाने के लिए पौष्टिक चारा, रहन-सहन, घूमना फिरना, अच्छी तन्दुरूस्ती के साथ उनकी नस्ल सुधार करना बहुत जरूरी है। गाय-भैंसो से उचित मात्रा में दूध न प्राप्त कर सकने के कारण वे न केवल आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी हैं वरन् अपने स्वास्थ्य के लिए हम उचित मात्रा में दूध भी नहीं ले पाते। अपनी गाय-भैंसों को बदल कर उत्तम नस्ल में पशु पालने लगना, जिनकी दूध देने की क्षमता बहुत अधिक होती है, न आसान है और न ही व्यावहारिक। इसलिए गाय-भैंसों का कृत्रिम गर्भाधान ही एक ऐसा उपाय है, जिसके द्वारा शनैः शनैः नस्ल सुधार के साथ जल्द से जल्द आने वाली पीढ़ी में दुग्ध क्षमता बढ़ाकर श्वेत क्रांति का सपना पूरा किया जा सकता है।

कृत्रिम गर्भाधान से लाभ:
गांव में उपलब्ध छोटे, कमजोर, अयोग्य और निम्न नस्ल के सांडों के इस्तेमाल से आने वाली पीढ़ी कमजोर और कम दूध देने वाली होती है। हर व्यक्ति उत्तम नस्ल का सांड पाले और रख-रखाव की व्यवस्था करें सम्भव नहीं है। कृत्रिम गर्भाधान विधि से उत्तम नस्ल सुधार व उनमें अन्य गुणों की वृद्धि होती है। सांड का जीवन कम होता है, जब कि उसका वीर्य 50 साल तक सुरक्षित रख कर उपयोग किया जा सकता है। अगर उत्तम नस्ल के सांड पाल कर नस्ल सुधार किया जाए तो भारी संख्या में उन्नत नस्ल के सांडों की जरूरत होगी और उनका रख रखाव आदि एक कठिन समस्या होगी। कृत्रिम गर्भाधान विधि द्वारा सांडों की अधिक संख्या में जरूरत न होने के कारण कम खर्च तथा थोड़े से उन्नत सांडों से ही पशुओं की मौजूदा नस्ल सुधारी जा सकती है।
साधारण तरीके से उन्नत और निम्न नस्ल के सांडांे की परख करना कठिन है। कुछ सांड यद्यपि देखने में हट्टे कट्टे तथा बलशाली दिखाई पड़ते हैं पर, उनका वीर्य अत्यंत निम्न कोटि का होता है। कृत्रिम गर्भाधान विधि में वैज्ञानिक तरीके से उन्नत सांड का चुनाव कर वीर्य इकट्ठा किया जाता है, उसका परीक्षण होता है, तभी उसे प्रयोग करते हैं। जननेन्द्रिय द्वारा फैलने वाले रोग पीड़ित सांड से गाभिन होेने वाली मादा पशु में पहंुच जाते हैं। इस तरह सांडों के सीधे इस्तेमाल से रोगों से पशुओं को पीड़ित होने तथा आने वाली पीढ़ी में भी बीमारी होने का भय रहता है। फिर ऐसे गर्भाधान में कभी-कभी सांड बड़े या गाय छोटी अथवा गाय बड़ी और सांड छोटा होना कठिनाई पैदा करता है। कृत्रिम गर्भाधान में ऐसी कोई समस्या पैदा नहीं होती। साथ अगर उन्नत नस्ल का सांड लूला लगंड़ा है अथवा किसी कारण से वह सीधे गर्भाधान की क्षमता नहीं रखता है लेकिन उसका वीर्य उत्तम गुण वाला है तो कृत्रिम गर्भाधान से उसका उपयोग कर सकते हैं।
कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र पर मादा पशु के जन्नेन्द्रिय की भी जांच होती है जिससे अगर उसमें बांझपन या कोई बीमारी का पता चले तो उसका उचित इलाज भी कर सकते हैं।

सावधानियां:
अपने गाय-भैंसों को कृत्रिम गर्भाधान विधि से गाभिन कराकर लाभ उठाने में नीचे लिखी अवश्य सावधानियां बरतें।

  1. पशु के उठने या गर्म होने के बारे में पूरी तरह सचेत रहें और पशु के गर्म रहते ही केन्द्र पर पहुंच कर कृत्रिम गर्भाधान विधि से गाभिन करा लें। देर हो जाने से यह विधि अप्रभावशाली होगी।
  2. प्रशिक्षित तथा पूरी जानकारी रखने वाले व्यक्ति से पशु का कृत्रिम गर्भाधान न कराने से रोगों के फैलाव का डर हो सकता है। इस लिए पशुपालन विभाग के कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र द्वारा ही पशुओं को गाभिन कराएं।