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घोड़ा | horse Information in Hindi

आदमी ने जिन जंगली जानवरों से दोस्ती कर उन्हें पालतू बनाया, उनमें घोड़े का महत्वपूर्ण स्थान है। यह सच है कि घोड़ों को आज हमारी जीवन शैली में कोई अहम मुकाम हासिल नहीं है और वे क्रमशः अपना अस्तित्व अस्मिता और पहचान खोते जा रहे हैं। आइये हम आपको घोड़े की जानकारी देते हैं !

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परिचय – घोड़ा

लेकिन घोड़ों ने पौराणिक आख्यानों से लेकर आधुनिक धुड़दौड़ांे तक का लम्बा सफर मानव जाति के साथ तय किया है। आज भले ही घोड़ों की प्रासंगिकता इस मशीनीकरण के युग में समाप्त हो चली है लेकिन शक्ति के माप-दंड के रूप में आज सभी पैट्रोल, डीजल विद्युत चालित वाहनों और इंजिनो की शक्ति का अनुमान ‘हार्स पाॅवर‘ ( अश्व शक्ति ) की ईकाई के रूप में लगाया जाना घोड़ों की सर्वकालिक शक्ति सम्पन्नता को रेखांकित करता है। एक जमाना था, जब समूची राजनीति और सत्ता-संचालन घोड़ों के इर्द-गिर्द घूमा करता था।

किसी भी मध्य युगीन राजसत्ता की शक्ति का आकलन उसकी सेना में मौजूद घोड़ों की गुणवत्ता और संख्या से लगाया जाता था। युद्ध-अभियानों में घोड़ों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती थी, इसका उल्लेख आवश्यक नहीं आज भी सभी देशों की सेनाओ के प्रशिक्षित घोड़ांे का एक दस्ता होता है।

घोड़ो का क्रमिक विकास

घोड़ा स्तनधारी वर्ग ‘मैमेलिया‘ के तहत आता है तथा श्रेणी विभाजन के आधार पर यह ‘पेरिसोडेक्टाइला‘ वर्ग में आता है। आज घोड़े को हम जिस रूप में देखते हैं, मूलतः यह उसके क्रमिक विकास का परिणाम है। ऐसा माना जाता है कि इस धरती पर घोड़े का उद्भव ‘आदि-नूतन कल्प‘ में हुआ। उस समय इसका आकार एक लोमड़ी के बराबर हुआ करता था। इसके बाद क्रमिक विकास के क्रम में घोड़े ‘अल्प्नूतन कल्प‘ में ‘मीसोहिप्पस‘ के रूप में सामने आए। अब इनका आकार भेड़ के बराबर था। धीरे-धीरे परिस्थितियों की अनुकूलता के आधार पर इसका आकार बढ़ता रहा और इसमें विभिन्न शारीरिक परिवर्तन होते रहे।

घोड़ो का इतिहास

इस धरती पर घोड़ों के अस्तित्व की प्राचीनता के कई पौराणिक और ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं। ‘पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं और असुरों के समुद्र-मंथन से प्राप्त हुए चैदह रत्नों में एक घोड़ा था। समुद्र-मंथन से प्राप्त हुए इस घोड़े का नाम ‘उच्चैःश्रवा‘ था। ऋग्वेद मे वर्णन मिलता है कि युद्ध के देवता इन्द्र के अश्वों के बाल और पूछ मयूरों के समान थी। कुछ पौराणिक कथाओ में कलियुग में भगवान विष्णु का श्वेत-अश्व ( कल्कि-अवतार ) के रूप में प्रकट होने का उल्लेख मिलता है। अश्वमेद्य यज्ञों में प्रकट होने वाले अश्वों को ‘श्यामकर्ण‘ कहा जाता था। इनके कान एकदम काले तथा शेष शरीर दुग्ध के समान श्वेत होता था। सूर्य के सप्ताश्व रथ का संचालन करने वाले घोड़ो के नाम क्रमशः गायत्री, बृहती, उष्णिक, जगती, त्रिष्टुभ, मनुष्टम और पंक्ति थे।

यूनान की पौराणिक कथाआंे मे समुद्र को घोड़े तथा धरती को घोड़ी के रूप में दर्शाया गया है। इसी कारण वहां अश्व को समुद्र और प्रजनन का प्रतीक माना जाता है। बलूचिस्तान के रानाघंुडई में खुदाई के दौरान पाए गए पांच हजार वर्षो से भी अधिक प्राचीन अवशेषो में घोड़ो को जीवन और मृत्यु तथा उदय और अस्त का प्रतीक बताया गया है।
जब हम इतिहास की ओर मुड़ते हैं तो पाते हैं कि बीता हुआ इतिहास अश्वों की अद्वितीय शौर्य परम्पराओं से भरा पड़ा है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सेना में अश्वों की भूमिका, उनके रख-रखाव तथा उपचार के प्रबन्धों पर विस्तार से वर्णन मिलता है। सम्राट अशोक के काल के शिला लेखों में वर्णित है कि अशोक ने अपने राज्य में अश्वों के लिए उच्च स्तरीय चिकित्सालयों का निर्माण करवाया। चीनी यात्री हृवेनसांग ने अपने यात्रा वर्णनों में लिखा है कि सम्राट हर्ष की चतुरंगिणी सेना में एक लाख अश्वारोही तथा साठ हजार हाथी थे।

बाणभट्ट रचित ‘हर्षचरित‘ के अनुसार सम्राट के अश्वांे का रंग सफेद, बादामी और चितकबरा होना अतिशुभ माना गया है। पृथ्वीराज चैहान द्वारा द्रुतगामी अश्व पर संयोगिता का हरण किया गया था, सम्राट अकबर का श्वेत अश्व ‘नूरबेजा‘, महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा ‘चेतक‘, टीपू सुल्तान का घोड़ा ‘दिलखुश‘ दारा शिकोह का घोड़ा ‘दिलपंसद‘ आदि इतिहास प्रसिद्ध अश्व घोड़ों की सर्वकालिक ऐतिहासिकता और उपयोगिता के तथ्यों की पुष्टि करते हंै।

खेती से सवारी तक

शायद आपको यह आश्चर्यजनक लगे, किंतु मध्य-युग में सैंकड़ो बरसों तक यूरोप में घोडे़ को खेती के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा। वैसे आदमी आदमी ने घोड़े से अपनी दोस्ती के प्रारंभिक दौर में उसे सवारी तथा बोझा ढोने के लिए इस्तेमाल किया। आदमी और घोडे़ की दोस्ती इतनी पुरानी है कि उस समय तक आदमी ने कपड़े पहनना भी नही सीखा था। वह केवल अपनी कमर मे चमड़ा लपेटे रहता था, सवारी के लिए जब आदमी घोड़े पर चढ़ना चाहता तो कमर में लिपटा गोल कपड़ा उसमें व्यवधान डालता। इस परेशानी ने ही आदमी को दोहरी मोहरी वाला वस़्त्र पहनना सिखाया। शायद यही दुनिया की ‘पहली पेंट‘ रही होगी।
सवारी से होते हुए कब आदमी ने घोड़ो को युद्ध के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता किन्तु यह र्निविवाद है कि प्रथम विश्वयुद्ध में घोड़ों ने ही मुख्य भूमिका निभाई है। घोड़े सदियो तक आदम के आदिम हिंसक स्वभाव के कारण लड़े जाने वाले अनगिनत युद्धों के चश्मदीद गवाह रहे हैं।

शाही इक्कों और रथों में भी उपयोग

युद्ध के अतिरिक्त घोड़े शाही इक्कों और रथों में भी जोते जाते रहे हैं। आज भी कई शहरों में घोड़े तांगे खीचते देखे जा सकते हैं। आज घोड़े सर्वाधिक सम्मान घुड़दौड़ के मैदानों में पा रहे हैं। घुड़ दोड़ के घोड़ों की कीमते सुनकर आप हैरत में पड़ सकते हैं। भारत में अच्छी से अच्छी नस्ल के घोड़े की कीमत 4 – 5 लाख रूपये तक है। अभी कुछ समय पूर्व स्काटलैंड का ‘शरेगार‘ नामक घोड़ा चोरी हो गया। उस घोड़े की कीमत तीन करोड़ रूपये आंकी गई। अमेरिका के किनलैंड शहर में हुई घोड़ों की नीलामी में दुबई के शेर मोहम्मद अल मकतूक ने ‘माईबपर्स‘ नाम के घोड़े पर दस करोड़ अस्सी लाख रूपये की बोली लगाई। घोड़ो की नीलामी के इतिहास में यह किसी एक घोड़े के लिए अब तक चुकाई गई सबसे बड़ी कीमत है।

दुनिया भर में विख्यात अरबी घोड़े

यों तो सभी देशों में घोड़ों की अच्छी नस्लें पाई जाती है, किन्तु अपनी शक्ति और चपलता के अरबी घोड़े सारी दुनिया में मशहूर रहे हैं। आज भी अरबी घोड़े अपनी शुद्ध नस्ल के कारण पूरी दुनिया में आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं।
हाॅलैंड और डेनमार्क के घोड़े अपने स्वस्थ शरीर और तगड़े डील डौल के कारण प्रसिद्ध हैं। रूस के ‘कजाक‘ घोड़े अपनी शक्ति तथा सहनशीलता के लिए जाने जाते है। घोडांे की सर्वाधिक प्रसिद्ध जाति ‘यूरोब्रेड‘ का विकास सत्रहवीं शताब्दी में ब्रिटेन में किया गया। यह प्रजाति अरबी घोड़ो व स्थानीय घोड़ांे के संयोग से विकसित की गई। अत्यन्त सुन्दर और साहसी ये घोड़े आज संसार भर में रेस या घुड़-दौड़ के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माने जाते है।

शक्ति, चपलता और गति घोड़ों के ईश्वर प्रदŸा गुण हैं। कुरआन में कहा गया है कि खुदा ने घोड़ा बनाया और उसकी गर्दन में बिजली भर दी। अपनी शक्ति सम्पन्नता, के कारण ही घोडे को पुरूषत्व अथवा मर्दानगी का द्योतक माना जाता है।

अपने अस्तित्व के लिए लड़ता घोड़ा

न जाने कितने किस्सों कहानियों, इतिहासों और पौराणिक कथाओं के घने जंगलो से गुजरती हुई घोड़ो के महत्व की यह विकास यात्रा आकर एक ऐसे वीरान मुकाम पर ठहर गई है जब लगता है कि इस सक्रिय सजग प्राणी का जन्म इस धरती पर केवल हर दूल्हे को जीवन में एक बार अपनी पीठ पर बिठाने के काम के लिए ही हुआ था। इतने सम्पन्न अतीत का स्वामी घोड़ा आज सचमुच अपने अस्तित्व और अस्मिता की लड़ाई में बेहद निरीह और असहाय नजर आता है।