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पलंग: इतिहास के आईने में

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पलंग व शय्या के विकास की भी दिलचस्प दास्तान है। प्राचीन सभ्यताओं में पलंग, मूल रूप में उच्च वर्ग के लोगों के लिए एक विलासोपकरण के रूप में विकसित किया गया था, अर्थात् यह उनकी विलासिता की वस्तु माना जाता था।

प्राचीन मिश्र में पलंग केवल विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के व्यक्तियों द्वारा ही उपयोग में लाया जाता था। सामान्य व्यक्ति एक प्रकार का लकड़ी का ‘तकिया‘ लगाकर जमीन पर ही सोते थे। वहां पर किए गए उत्खननों से अनेक प्रकार के पलंग प्राप्त हुए हैं इन पलंगों के सिरहाने पर पशुओं की आकृतियां बनी होती थीं। ‘तुतान खामने‘ की कब्र की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं में आबनूस पर सोने की नक्कासी वाला पलंग मिला है। असीरिया एवं बेबीलोन के शासक यदा-कदा कांसा के पलंग काम में लाते थे। इन पर अनेक प्रकार के रत्न जुडे़ होते थे।

‘ओल्ड टेस्टामेंट‘ में भी पलंगों का संदर्भ अनेक स्थानों पर मिलता है। तदनुसार पलंग यद्यपि सामान्य उपयोग की वस्तु थी, किन्तु लोहे का वह पलंग जिस पर ‘बाशन‘ का बादशाह ‘ओग‘ शयन किया करता था, एक अद्भुत वस्तु थी।
यूनान की एक प्राचीन किवदंती के अनुसार पलंग ‘प्रोक्रुस्टीज‘ का एक ‘कुख्यात‘ आविष्कार माना जाता है। प्राचीन यूनान में पलंग खराद पर चढ़ाई हुई लकड़ी के बने होते थे ये पलंग मामूली किस्म के होते थे, किन्तु सिकन्दर महान के विजय अभियानों के बाद इन पलंगों में फारस की विलासिता का समावेश हो गया। ‘जैनोफेन‘ के जमाने में फारस के बादशाह मुलायम एवं लचीले पलंगों पर शयन किया करते थे। सिकन्दर महान सामान्यतः एक स्वर्ण के गद्देदार पलंग पर बैठकर अपना दरबार लगाया करता था।
यूनान व रोम में गद्देदार पलंगों का प्रचलन था। साहित्यकार होमर के नायक तथा रोमन गण-राज्य के पादरी लकड़ी के सख्त व सादा पलंगों का उपयोग करते थे, किन्तु भोजन करने के बाद वे भी गद्देदार पलंगों पर लेटते थे। रोम में शंहशाहों के जमाने में बड़े पलंग भी काम में लाए जाते थे। इन पलंगो पर छः व्यक्ति एक साथ शयन कर सकते थे। उस जमाने में ‘डबल बेड‘ भी चलन में आ गए थे।


रोमन साम्राज्य के विघटन के बाद प्राचीन काल के लोगों द्वारा उपयोग में लाया जाने वाला पलंग वास्तव में लुप्त हो गया। इसके बाद शार्लमेन ( 724 से 814 ई0 ) के जमाने मे ंपुनः पलंग का प्रचलन हो गया । मध्य कालीन यूरोप में केवल अभिजात्य वर्ग एवं उदीयमान मध्यम वर्ग के लोग ही पलंग का उपयोग करते थे। आरंभिक मध्यकाल की कला में ऐसे पलंगों का चित्रण किया गया है, जो पैरों की और से सिरहाने की ओर उठे होते थे। उस समय अनेक पदार्थों के पलंग बनते थे, जैसे कांसा, चांदी आदि।

मध्यकाल के अन्त में अनेक आकार-प्रकार के पलंगों का निर्माण होने लगा। इस संदर्भ में ‘ग्रेट बैड आॅफवेयर‘ काफी प्रसिद्ध था। यह पलंग बारह फुट वर्गाकार का था तथा साढे-सात फुट जमीन से ऊंचा था। सोलहवीं शताब्दी में महारानी एलिजाबेथ के जमाने में पलंगों का महत्व बहुत बढ़ गया था। साहित्यकार शेक्सपियर द्वारा अपनी धर्मपत्नी के पक्ष में लिखी गई वसीयत में भी इसका महत्व परिलक्षित होता है।


सोलहवीं शताब्दी एवं उसके बाद भी पलंग सम्मान प्रदान करने का एक साधन बन गया था। फ्रांस में प्रतिष्ठित व्यक्तियों, जैसे बादशाहों एवं उनकी रानियों को उनकी मृत्यु के बाद पलंग पर लिटाकर उनका सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता था। कुलीन महिलाएं अपना दरबार पलंग पर बैठाकर लगाया करती थीं। कार्डिनल ‘रिखलू‘ वृद्धावस्था में पलंग पर बैठकर यात्रा किया करता था। उसका पलंग इतना बड़ा होता था कि उसक अन्दर प्रवेश देने के लिए मकान की दीवारों को तोड़ना पड़ता था। फ्रांस में एक शाही पलंग इतने अधिक सम्मान व पूजा की वस्तु बन गया था कि सत्रहवीं शताब्दी में लोग उसका सम्मान घुटने टेककर करते थे, हालांकि उस पर कोई व्यक्ति बैठा भी नहीं होता था। चैदहवां लुई पलंगों को इतना महत्व देता था कि उसके पास चार सौ तेरह पलंग थे।
विलियम हैरिसन ने अपनी पुस्तक ‘डिस्क्रिप्सन आॅफ इंग्लैण्ड ( 1577 ) में लिखा है कि सोलहवीं शताब्दी में पलंग एक सामान्य उपयोग की वस्तु बन गया था। इस शताब्दी में ‘तृण-शय्या‘ का स्थान पलंग ने ले लिया था।। इससे पहले लोग प्रायः तृण-शय्या को उपयोग लेते थे। अठारहवीं शताब्दी में धनवान लोग अपने पलंगों की साज-सज्जा पर बेहद पैसा बरबाद करते थे।
पलंगों में खटमल व पिस्सू घर कर लेते थे और इनको नष्ट करने का कोई प्रभावकारी तरीका इजाद नहीं हुआ था। पक्षियों के पंखों से सज्जित पलंगों का भी उपयोग होने लगा था। सराय में रात्रि को एक ही पलंग पर दो व्यक्तियों को शयन करना पड़ता था।

अमरीका के प्रथम उपनिवेशी अपनी अन्य आदतों के साथ तत्कालीन यूरोप के पलंग भी लाए। किन्तु नई जगह पर उन्हें काफी जीवन-संघर्ष करना पड़ा। अतः उन्होंने सादा जीवन अपनाया और वे सादा शय्या का उपयोग करने लगे। समयान्तराल में वहां पर भी ‘प्रैस बैड‘ – दरवाजे युक्त आलमारी में स्थापित पलंग का प्रचलन हो गया।
अठारहवीं शताब्दी के मध्य में ‘फील्ड बैड‘ का, जिस पर महराबदार ढांचे पर एक छतरी लगी होती थी, प्रचलन हुआ किन्तु सन् 1840 तक अमेरिका में एक अपनी शुद्ध स्वतंत्र शैली का आरंभ हुआ। इसके बाद ऐसे ऊंचे पलंग बनने लगे कि जिन पर बढ़ने के लिए सीढ़ियों का उपयोग आवश्यक हो गया।
इसके बाद पर्दा पलंग, छतरी वाले पलंग भी बनने लगे। लकड़ी के पलंग, जो किसी समय खटमलों के आश्रय-स्थल जाने जाते थे, पुनः 1920 ई0 तक इंग्लैण्ड में उपयोग में आने लगे। इसी समय दीवान जैसे पलंग का भी उपयोग होने लगा। अमरीका में यह पलंग ‘हाॅलीवुड बैड‘ के नाम से जाना जाने लगा इस पलंग में स्प्रिंग वाला गद्दा एक स्प्रिंग युक्त बाॅक्स में लगा दिया जाता था।


इसके पाए छोटे होते थे। यह एक समायोज्य ढांचे पर रखा होता था। ‘डबल बैड‘ का स्थान ‘जुड़वा बैड‘ ने ले लिया। बीसवीं शताब्दी में ‘सोफा-बैड‘ का आविष्कार हुआ। इसके बाद ‘रोल-अवे बैड‘ का प्रचलन हुआ। यह एक प्रकार की खाट थी, जिसे समेटकर रखा जा सकता था और इसमें लगे हुए पहियों के द्वारा इसे लुढ़काकर ले जाया जा सकता था।
‘बैक बैड‘, जो एक तले से ऊपर दूसरे तले के रूप में होते थे, का भी उपयोग होने लगा। कालान्तर में ‘अस्पताल बैड‘ जिसमें तीन भाग होते थे एवं जिसके किसी भी भाग को ऊंचा व नीचा किया जा सकता था, का प्रचलन हो गया।
भारत व एशिया के देशों में पलंगों के विकास की लगभग इसी प्रकार की कहानी है। राजा महाराजाओं व धनवान लोगों के यहां कीमती व सुसज्जित पलंग उपयोग में आने लगे और समयानुसार इनका स्वरूप बदलता गया।
सचमुच पलंग का सफरनामा काफी रोमांचक और दिलचस्प रहा है।