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हाय, ये मक्खियां

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अनेक प्रकार की मक्खियों को हम कहीं कूड़े के ढेर पर तो कहीं खुले खाद्य पदार्थो पर भिनभिनाते हुए देखते हैं। हमारे घरों में भी अक्सर मक्खियों का जमघट बना रहता है। ये कभी खुले पदार्थो पर भिनभिनाती हैं, तो दूसरे ही क्षण दरवाजों और खिड़कियों के शीशों पर भिनभिनाती-टकराती हुई घर से बाहर खुली हवा में जाने का प्रयास करती हुई दिखाई देती हैं। इस प्रकार ये क्षण में घर के अन्दर होती हंै, तो क्षण में घर के बाहर। दिन भर इधर-उधर तेजी से उड़ते रहना और रात होते ही किसी स्थिर और लटकती वस्तु पर विश्राम करना इन्हें बहुत पसंद है। मक्खी की उड़ने की क्षमता आठ किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है। उड़ते वक्त इसके पंख एक सैकंड में दो सौ बार फड़फडाते हैं।
वैसे मक्खियों की अनेक प्रजातियां होती हैं, किन्तु जो अक्सर हमारे घरों में और ऐसे विक्रय स्थलों पर जहां खाद्य पदार्थ खुले रखकर बेचे जाते हैं, अपना अड्डा जमाए होती हैं, उन्हें ‘घरेलू मक्खी‘ के नाम से जाना जाता है। घरेलू मक्खी सामान्यतः हष्ट-पुष्ट होती है। नर व मादा दोनों का उदर पीला या पीलछौहा रंग लिए होता है।
कई मर्तबा आप मक्खियों से तंग हो जाते हैं और उन्हें मारने के लिए हाथ का झपट्टा उन पर पूरे वेग से मारते हैं, किन्तु यह क्या? आप का हाथ किसी वस्तु से टकरा कर जख्मी हो गया और कहीं दूसरे स्थान पर पहुंच गई। आपने तो अपना हाथ इस ढंग से उठाया था कि मक्खी को हल्का सा भी एहसास न होने पाए। फिर यह कैसे हो गया? आपका हाथ तो जख्मी हो गया और मक्खी बच गई। इसका कारण है मक्खी की दोनों आंखों में सैकड़ों लैंसों का होना, जो मक्खी को अपने चारो ओर होने वाली प्रत्येक हलचल की सूचना प्रतिक्षण देते रहते हैं।
मक्खियों को ‘गंदगी का वाहन‘ कहा जाता है। इसमें भला मक्खी का क्या दोष! इसका जीवन चक्र ही कूड़े-कचरे के ढेर और गंदगी से शूरू होता है। इन गंदे स्थलों पर मक्खी अंडे देती है। अंडे से लार्वा बनने में मात्र 24 घंटे का समय लगता है। आगामी तीन चार दिनों में लार्वा कई बार कायान्तरण करता है। और फिर प्यूपा के रूप में आ जाता है। अपने आस-पास की गंदगी में पैदा होने वाली गरमी से प्यूपा चार दिनों में वयस्क रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार अंडे से वयस्क बनने में अमूमन दस दिन का समय लगता है। और फिर मात्र तीन दिन में मादा अंडे देने लायक हो जाती है।
अंडे सफेद रंग के होते है और 1/25 इंच आकार के होते हैं। मादा के 150 जत्थे में 900 के करीब अंडे देती हैं। बहुत अधिक गरमी हुई तो अंडो को सेने का काम आठ घंटो में पूरा हो जाता है, वर्ना इस कार्य में एक से तीन दिन का समय लगता है। किन्तु ठंडे और खराब मौसमी हालातों में इसका जीवन आठ सप्ताह से अधिक का नहीं होता है। 15 सेें0 डिग्री का यदि तापमान हो तो मक्खी वर्ष भर लगातार प्रजनन करने में सक्षम होती है।
मक्खी के शरीर का हर हिस्सा अपने आप में विशेष मुणवत्ता लिए होता है। इसके शरीर पर स्थित रोमों के नुकीले भाग एक अच्छे वाहक का काम करते हैं। परीक्षणों से इस बात का पता चलता है कि इसके शरीर पर इन रोमों की वजह से चिपक कर आने वाले कीटाणुओ की संख्या लाखों तक हो सकती है। भोजन के नए-नए स्त्रोतों को तलाशते रहना मक्खी का प्रमुख कार्य है। इसे आप अपनी आंखोे से देख सकते हैं। उदाहरण के तौर पर जैसे ही आप किसी मीटे अथवा चिपचिपे खाद्य पदार्थ को खुला रखते हैं, मक्खियां उस पर मंडराना और बैठना शुरू हो जाती है।
वयस्क मक्खी हर प्रकार की नम और तर सामग्री पर बैठ कर उनमें पोषक तत्वों के तरल भाग को चूसती रहती है। यदि सामग्री सूखी होती है, तो मक्खी मुख द्वार पर स्थित नलिकाओं के द्वारा अपने शरीर में से तरल पदार्थ की बूंदें उस पर उगलती हैं और इस प्रकार जब वह सामग्री तरल होने लगती है, तो उसे चूसना शुरू कर देती है। सड़ा-गंदा पानी और शक्कर के दाने, गुड़ और मीठे खाने योग्य पदार्थ आदि इसके आकर्षण का मुख्य केंद्र हंै। मक्खियां जिस पदार्थ को चूसती रहती है अपने साथ लाए हानिकारक कीटाणुओं को उस खाद्य पदार्थ पर छोडती रहती हैं, जो कालरा, टायफाईड, दस्त जैसी बिमारियों का कारण बनते हैं।
मक्खियां ठंड के मौसम में दिखाई नहीं देती हैं। इसका कारण यह है कि इस दौरान मक्खियां किसी गरम स्थान पर जाकर प्रजनन कर रही होती हैं अथवा कहीं छिपकर जाड़े का समय काट रही होती हैं। विशेषकर ऐसे स्थानों पर जहां पशुओं को बांधा जाता है या रखा जाता है। वैसे मक्खियां विभिन्न क्षेत्रों में अनुकूलन के भिन्न-भिन्न तरीके लिए हुए होती हैं।