छोटी-सी हरड़ बडे़-बड़े गुण

छोटी-सी हरड़ बडे़-बड़े गुण

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आज हम ऐलोपैथी चिकित्सा पद्धति के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि अत्यंत कारगर व गुणकारी घरेलू पद्धति के औषधिय उपयोगों को भी भूलते जा रहे हैं। अंग्रेजी दवाओं के सेवन से मिलने वाली तात्कालिक राहत में हमने इसके पश्चातवर्तीय कुप्रभावों को नजरअंदाज कर दिया है। आयुर्वेद हमारी अति प्राचीन आजमाई हुई चिकित्सा-पद्धति है। इसमें रोग के लक्षणों की अपेक्षा रोगों के कारणों के निदान पर जोर दिया जाता है।
आयुर्वेदिक उपचार में प्रयुक्त होने वाली औषधियों में से अधिकांश बहुत ही साधारण घरेलू वस्तुएं हैं, जो कई रोगों में कारगर होने के साथ बिल्कुल हानिरहित होती हैं। ‘हरड़‘ भी एक ऐसी ही घरेलू औषधि है, जिसे आयुर्वेद में एक गुणकारी एवं दिव्य रसायन औषधि माना गया है।
हरड़ को संस्कृत में ‘हरीतकी‘ नाम से जाना जाता है। इसके अन्य नाम ‘शिवा‘, ‘पथ्या‘, ‘अभ्या‘, ‘चेतकी‘, ‘विजया‘, ‘रोहिणी‘, ‘पूतनाव‘, ‘अमृतजीवन्नी‘ आदि हैं। अंग्रेजी में इसे ‘चेव्यूलिक मायरोबेलन‘ कहा जाता है। आयुर्वेद में हरड़ के सात प्रकार बताए गए हैं। हरड़ मध्यम आकार के वृक्ष पर उगती है। हिमालय के तराई क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाली चेतकी हरड़ सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इस हरड़ का आकार सामान्य से काफी बड़ा होता है और इसका रंग धवल होता है। अभ्या हरड़ नेत्र-विकारों में उपयोगी है, जबकि रोहिणी हरड़ रक्त विकारों के उपचार मुफीद मानी जाती है।
हरड़ की उपयोगिता के सम्बन्ध में आयुर्वेद-चिकित्सा के विभिन्न शास्त्रों में विशद वर्णन मिलता है। इसकी उपयोगिता को रेखांकित करते हुए यह कहावत प्रचलित है कि जिस घर में मां नहीं होती, उस घर में हरड़ मां की भांति बच्चों की देखभाल की भूमिका निभाती है। भावप्रकाश निघण्टू में बताया गया है कि हरड़ पीस कर चूर्ण के रूप में इस्तेमाल करने से कब्ज दूर होती है। चबाकर खाई गई हरड़ शरीर के ताप को संतुलित करती है। उबालकर खाने से दस्त बंद होते हैं तथा भूनकर उपयोग करने से यह तीनों दोषों का निदान करती है।
हरड़ एक गर्म तासीर वाली वस्तु है। इसमें पच्चीस प्रतिशत गैली टेनीक अम्ल पाया जाता है। यह बल और बुद्धिवर्द्धक होने के साथ-साथ नेत्र-ज्योति बढ़ाती है। उदर-रोगों और पाचन-तंत्र को सक्रिय बनाने में हरड़ एक रामबाण दवा है। हरड़ में विजातीय पदार्थो को शरीर से बाहर निष्कासित करने की अदभुत शक्ति समाहित होती है। इसी कारण यह कब्ज व अन्य उदर संबंधी रोगों को दूर कर पाचन-संस्थान को सुदृढ़ करती है।
पुरानी कब्ज के रोगियों को नित्य प्रति भोजन के आधा घंटा पश्चात डेढ़ से दो ग्राम तक हरड़ का चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लेना चाहिए। इसके नियमित सेवन से पुरानी से पुरानी कब्ज दूर हो जाती है। यदि सप्ताह में एक बार बच्चे को हरड़ घिसकर दी जाए तो उसे जीवन में कभी कब्ज की शिकायत नहीं होगी।
बीस से बाईस ग्राम हरड़ चूर्ण, दस ग्राम तुलसी के पŸो, दस ग्राम सेंधा नमक और 25 ग्राम अजवाइन को मिलाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण के सेवन से बदहजमी, पेट-दर्द, अजीर्ण, गैस आदि रोगों में बहुत लाभ होता है।
रक्त-विकार से शरीर पर फोड़े-फुंसी हो जाते हैं तथा चर्म रोग होने की आशंका रहती है। रक्त-शुद्धि के लिए हरड़, बहेड़ा तथा आंवला को समान मात्रा में मिलाकर त्रिफला चूर्ण तैयार कर लंे और प्रतिदिन रात्रि को सोते समय 15-20 ग्राम चूर्ण दूध अथवा गुनगुने पानी के साथ लें। इससें रक्त-विकार तो दूर होते ही हैं, साथ ही कब्ज में भी राहत मिलती है और नेत्र-ज्योति बढ़ती है।
मुंह में छाले हो जाने की दशा में हरड़ के चूर्ण का सेवन रात्रि के समय गर्म दूध के साथ करें। इसके चूर्ण को शहद में मिलाकर छालों पर लगाने से शीघ््रा्र राहत मिलती है। हरड़ चूर्ण और कत्थे के चूर्ण से बने मंजन से दांत रगड़ने से दांत एकदम साफ हो जाते हैं व मसूढ़े स्वस्थ्य एवं मजबूत होते हैं।
हरड़ को रात-भर साफ पानी में भिगाए रखें और सुबह उस पानी से आंखे धोएं। इससे आंखों को शीतलता मिलती है।
पेद-दर्द होने पर हरड़ को घिसकर गुनगुने पानी के साथ सेवन करें। तत्काल लाभ होगा। हरड़ पेट-दर्द के कारणों को नष्ट कर स्थायी रूप से आराम दिलाती है।
बच्चों को अक्सर पेट में कीड़े होने की शिकायत हो जाती है। बच्चों के पेट के कीड़ों को नष्ट करने के लिए हरड़ चूर्ण के साथ वायविडंग मिलाकर गर्म पानी के साथ लिया जाता है।
बवासीर के मस्सों पर हरड़ को घिसकर मोटा-मोटा लेप करने से राहत मिलती है।
बहुत कम लोग जानते हैं कि हरड़ एक बहुत अच्छा प्राकृतिक एंटीसेप्टिक भी है। जख्म या घाव को हरड़ के काढ़े से धोने से घाव जल्दी भर जाता है। हरड़ में मौजूद ‘माइरो बेलोलीन‘ नामम तत्व पुराने घावों को शीघ्र ठीक करता है।
खाज-खुजली, दाद आदि चर्म रोगों में हरड़ का लेप करने से शीघ्र ही वांछित लाभ मिलता है। पाडंु-रोग में छोटी हरड़ के चूर्ण को गाय के शुद्ध घी में मिलाकर लेने से लाभ होता है। हरड़ को करेले के पŸाों में मिलाकर घिसकर पानी के साथ लेना भी पांडु रोग में लाभकारी रहता है।
बड़ी हरड़ के छिलके, सफेद जीरा और अजवाइन को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को प्रतिदिन सवेरे-शाम दही में मिलाकर लेने से सूखी आंव, मरोड़ में अतिशीघ्र वांछित लाभ होता है।
उल्टी और जी मितलाने पर हरड़ के चूर्ण को शहद में मिलाकर दूध के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। छोटी हरड़ के चूर्ण को गर्म पानी के साथ लेने से हिचकियां आना रूक जाती हैं। एक्जीमा में शरीर के प्रभावित अंग पर हरड़ को गौ-मूत्र में पीसकर नियमित रूप से लेप करना चाहिए।
हरड़ को वर्षा-ऋतु में सेंधा नमक के साथ, शरद ऋतु में शर्करा के साथ, हेमंत में सौंठ के साथ, शिशिर में पिपली के साथ, वंसत में शहद के साथ तथा ग्रीष्म में गुड़ के साथ सेवन करना अत्यंत लाभकारी रहता है।
हरड़ का सेवन गर्मी व प्यास से पीड़ित होने पर, थकान के समय, गर्भवती स्त्रियों के लिए और रक्त-स्त्राव के समय करना वर्जित है।
हरड़ के समुचित सेवन से हम कई छोटी-मोटी बीमारियों से सहजता से मुक्ति पा सकते हैं। वास्तव में यह छोटी-सी हरड़ बडे़-बडे़ गुणों से युक्त है। हरड़ के सेवन को आदत बनाइए।