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रूमाल: दिलचस्प इतिहास

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रूमाल के इर्द-गिर्द भी दंतकथाएं बुनी गई है और आज के युग में भी उन पर विश्वास किया जाता है। मूल रूप से रूमाल चेहरे को पौंछने या साफ करने के लिए काम में लाया जाता है। सभ्यता के उदय काल से ही ऐसे किसी छोटे सहायक वस्त्र की आवश्यकता थी, जो बिना किसी असुविधा के साथ में ले जाया जा सके। भारत में हाथ से निर्मित अंगोछों को साथ में रखा जाता था। आज भी पुरानी पीढ़ी रूमाल रखना पसंद नहीं करती, अंगोछा ही वापरती है।
ऐसा विश्वास किया जाता है कि पहली शताब्दी की रोम सभ्यता में रूमाल का प्रयोग होता था। जब रोम की सभ्यता का ह्यास हुआ था, तब पसीना साफ करने के लिए इंग्लैंड में इसी तरह के चैकोर वस्त्र का उपयोग शुरू हुआ । यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि मध्ययुगीन सभ्यता में रूमाल का प्रचलन नहीं था। जिसे हम वर्तमान संदभों में रूमाल समझते हैं, उसका चलन 16वीं शताब्दी से शुरू हुआ होगा। रूमाल का प्रयोग उन दिनों पूरी तरह उच्च-वर्ग के लोगों द्वारा किया जाता था। इंग्लैंड धनाढ्य वर्ग के कुलीन पुरूष रूमाल जेब में रखने के बजाए उसे हाथ में रखकर चलना पसंद करते थे। उन दिनों रूमाल विलासिता का प्रतीक समझा जाता था। इंग्लैंड के बादशाह हेनरी (अष्टम) रेशमी कपड़ों में स्वर्ण जड़ित बेल-बूटी वाले रूमाल का प्रयोग करते थे। रूमाल की भेंट देने को ‘मूल्यवान भेंट‘ माना जाता था। 1556 में रानी मेरी ट्यूडर को एडवर्ड (षष्ठम) की नर्स श्रीमती पेन ने छह बेशकीमती रूमालों की भेंट दी थी जो रेशम पर स्वर्ण जड़ित थे।
सोलहवीं शताब्दी तक कोई भी भद्र महिला या पुरूष बिना रूमाल के संतुष्ट नहीं होता था। धीरे-धीरे रूमाल मानवीय परिधान का आवश्यक अंग हो गया। उस समय रूमाल की लंबाई-चैड़ाई तीन या चार इंच होती थी और स्नेह के प्रतीक चिन्ह के बतौर लोग रूमाल भेंट में दिया करते थे। इसी वजह से उन दिनों लिखे गये नाटकों में भी रूमाल भेंट देने के विशिष्ट उल्लेख हैं। शेक्सपियर की प्रसिद्ध त्रासदी आथेलो में नाटक का नायक आथेलो उसकी पत्नी डेस्टीमोना को प्रेम की भेंट स्वरूप रूमाल भेंट करता है और यही रूमाल उन दोनों की मौत का कारण बनता है। इसलिए यह भी अंधविश्वास प्रचलित है कि रूमाल भेंट में नहीं देना चाहिए। इ्रंग्लैंड में चाल्र्स (प्रथम) के युग में रूमालों की मांग इतनी बढ़ गई कि जब चाल्र्स (द्वितीय) सत्ता में आए तो उन्होंने कानून द्वारा रूमालों केे आयात पर प्रतिबंध लगा दिया।
दिसंबर 1672 में एक ‘आर‘ नाम का रूमाल गुम गया था, जिसकी पुलिस में रिपोर्ट की गई थी और इसकी चर्चा लंदन गजट में हुई थी। इससे प्रमाणित हो जाता है कि 17वीं शताब्दी के अंत तक रूमाल मूल्यवान धरोहर समझा जाने लगा था। 18वीं व 19वीं शताब्दी में जब सुंघनी का प्रयोग बढ़ा, तब नाक साफ करने के लिए रूमाल की जरूरत ज्यादा महसूस हुई। प्रथम विश्व युद्ध के बाद रूमाल सज्जा के रूप में भी उपयोग में आने लगा और कोट की जेब के ऊपर रूमाल का प्रदर्शन शुरू हुआ। उन दिनों दो रूमाल रखे जाने लगे एक कोट की जेब में और दूसरा पेंट की जेब में । आज तो नाम व उपनामों वाले तरह-तरह के रूमाल बाजार में उपलब्ध हैं।