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गुरु नानक|Guru nanak information in hindi

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सांप्रदायिक सद्भाव के अग्रदूत गुरु नानक

गुरु नानक देव शांति, सांप्रदायिक सद्भाव , जातीय एकता और सर्वधर्म समभाव की परंपरा के अग्रदूत थे। नानक देव जी की महानता केवल इसमें नहीं है कि  उन्होंने एक नए धर्म की नींव डाली । नानक इसलिए महान हैं कि उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त विसंगतियों को न केवल साहस पूर्वक रेखांकित किया बल्कि वह हर अन्याय के विरुद्ध स्वयं जूझे।  एक उच्च कोटि के साहित्यकार के रूप में नानक का महत्व इसलिए और अधिक बढ़ जाता है कि उन्होंने मध्ययुगीन भक्ति काव्य की दीन -हीन तथा तत्कालीन सामाजिक स्थितियों से निर्लिप्त काव्य परंपरा को नए तेवर दिए। ‘कोई नृप होई हमें का हानि?’ या  ‘संतन को कहा सी करी सो काम’  जैसी तटस्थ निर्लिप्तता या उदासीनता को नानक ने सामाजिक आस्थाओं से जुड़े हुए का्व्य  के माध्यम से एक सर्वथा नई पहचान व दिशा दी ।गुरु नानक देव के काव्य का स्वर भक्ति काल में रचित काव्य के समानांतर चलते हुए भी कहीं अधिक व्यापक और अपने आसपास के परिवेश के प्रति तीखी व जीवंत प्रतिक्रियाओं से भरपूर है । तत्कालीन मुगल सल्तनत के जुल्मों का उन्होंने अपने सहज काव्य के माध्यम से दृढ़ता पूर्वक प्रतिकार किया। सर्वशक्तिमान शासक वर्ग का इतना मिर्गी और प्रखर विरोध भारतीय इतिहास में दुर्लभ है।

लाहौर के पास जन्म

सिख धर्म के आदि गुरु ,महान समाज सुधारक दृढ़ मानवतावादी गुरु नानक का जन्म लाहौर से 40 मील दूर स्थित जिला शेखपुरा के तलवंडी नामक गांव में आज से करीब  छः शताब्दियों  साल 1526 की कार्तिक शुक्ला पुर्णिमा तदनुसार 15 अप्रैल 1429 में हुआ था। उनका जन्म स्थान तलवंडी वर्तमान में ‘ननकाना साहिब’ के नाम से मशहूर है। नानक के पिता का नाम कालूराम मेहता और माता का नाम तृप्ता देवी था । उनके जन्म पर जब जन्म कुंडली बनाई गई तो परिवार के पुरोहित पंडित हरिदयाल ने ग्रह फल देखकर भविष्यवाणी की कि यह बालक कालांतर में देश व जाति का महान नेता बनेगा और समूची मानव जाति को राह बताएगा।

बाल्य काल से ही नानक में महापुरुष होने के सारे लक्षण नजर आने लगे। पांच वर्ष की अल्पायु में वह जीवन , जगत और ईश्वर जैसे गूढ़ विषयों पर गंभीर बातें करने लगे। जैसे-जैसे नानक बड़े होने लगे ,उनके भीतर का विलक्षण व्यक्तित्व उभरने लगा। विद्यालय के पंडितों और मदरसे के मौलवियों ने उन्हें एक अद्भुत विद्यार्थी के रूप में देखा। एक बार विद्यालय में शिक्षक ने उनसे ‘ओंकार ‘ शब्द लिखकर अभ्यास करने को कहा तो बालक नानक ने इस शब्द का अर्थ पूछा । शिक्षक हतप्रभ रह गया।  तब नैसर्गिक ज्ञानी नानक ने ‘ओंकार’  शब्द की इतनी सुंदर और विस्तृत व्याख्या की कि गुरु व उपस्थित सहपाठी आश्चर्य से उन्हें देखते रह गए।

नानक का विवाह

दुनियादारी के प्रति नानक के उपेक्षा भाव से उनके पिता बड़े चिंतित हुए। नानक को सांसारिकता से जोड़ने हेतु उनका विवाह सुलक्ष्मी के साथ कर दिया गया। बत्तीसवें वर्ष की आयु तक नानक श्रीचंद व लक्ष्मी दास नामक दो बच्चों के पिता बन चुके थे।

गुरु नानक का बढ़ता आध्यात्म

अब नानक के पिता निश्चिंत हो गए कि नानक अब गृहस्थी जिम्मेदारी संभाल लेंगे किंतु नानक गृहस्थ-जीवन का निर्वाह करते हुए भी संसार के प्रति अनासक्त बने रहे। उनका झुकाव धीरे-धीरे आध्यात्म की ओर बढ़ने लगा ।तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों नानक को उद्वेलित करने लगीं। उस समय देश धार्मिक व आध्यात्मिक दृष्टि से एक गहरी उदासीनता में जकड़ा हुआ था। चारों तरफ कुसंस्कारों और अंधविश्वासों का घटाटोप अंधकार छाया हुआ था ।एक विदेशी संस्कृति राज- सत्ता के सहयोग से समूचे सांस्कृतिक मूल्यों का अतिक्रमण कर रही थी उस चुनौती के समक्ष देश का मनोबल होता जा रहा था धर्म के नाम पर मुल्ला-मौलवी व पुरोहित वर्ग सामान्य ज्ञान का शोषण कर रहे थे और सांप्रदायिकता लोगों के दिलों में घर करती जा रही थी।

गुरु नानक के उपदेश

ऐसे कठिन समय में नानक सांप्रदायिक सद्भाव व मानवतावाद के निर्भीक एवं प्रखर प्रवक्ता बनकर सामने आए ।उन्होंने अपनी बेलौस शैली में हिंदुओं व मुसलमानों दोनों को नसीहत दी। उनके भक्तों में सभी धर्मों और जातियों के लोग थे। उनका कहना था कि सभी धर्मों का मूल तत्व एक ही है । उनके दर्शन का सारांश अनुभवजन्य ज्ञान था । नानक के अनुसार, जीवन का प्रत्यक्ष दर्शन ही धर्म की आधारशिला है।वह किसी शास्त्र सम्मत मान्यता के प्रति आग्रह नहीं रखते थे। नानक के नजदीक सहज अनुभूति और विश्वास धर्म के नैसर्गिक तत्व थे।

 उन्होंने कभी किसी धर्म के सिद्धांतों और दर्शन को गलत ठहराने का प्रयास नहीं किया। उनका एकमात्र धर्म था – सभी धर्मों के मूल तत्व के सार को संग्रहित करना और एक माला में पिरोना। नानक के अनुसार, माला में  पिरोए जाने केबाद भी फूल का निजत्व समाप्त नहीं होता।

नानक को चाहने वाले लोगों में हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदाय के लोग थे। उन्होंने जनमानस में फैला सांप्रदायिकता का जहर नष्ट करने की हर संभव कोशिश की।   कर्मकांड और धर्म के नाम पर धंधा करने वाले लोगों के खिलाफ नानक ने अलख जगाया। वह एकेश्वरवाद के प्रखर प्रवक्ता व मूर्ति पूजा के प्रबल विरोधी थे । उनका कहना था कि सच्चा मानवीय नैतिक जीवन अपनाने और ईश्वर की आराधना करने से ही मानव पवित्र और महान बन सकता है । नानक की नजर में कुरान पवित्र थी जितने कि पुराण ।उनकी वेशभूषा रहन-सहन और जीवनशैली में शादी थी उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो सकता था

महिलाओं की दुर्दशा से द्रवित

तत्कालीन समाज में स्त्रियों की दुर्दशा ने नानक को अत्यंत द्रवित किया। उन्होंने कहा कि स्त्री से ही मनुष्य जन्म लेता है । स्त्री से ही जगत की उत्पत्ति का क्रम चलता है । स्त्री  ही हमें सामाजिक बंधन में रखती है। गुरु वाणी में उसी स्त्री की रक्षा के द्वारा समाज की जीवन रक्षा का स्पष्ट बोध दिया है।

समानता का व्यव्हार

गुरु नानक की वाणी एक व्यवहारिक जीवन दर्शन है, उन्होंने कभी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं रखा। सब मनुष्य एक समान , कोई छोटा या बड़ा नहीं है । इस तथ्य को नानक इन शब्दों में रेखांकित करते हैं –

“सब को उच्चा आखिए, नीचे न दिसे कोय।”

गुरु नानक

अर्थ

गुरु नानक ने कहा – यदि कोई किसी को छोटा या नीच समझता है तो नानक ‘नीचों’ के साथ है !समस्त मानव जाति एक ही ईश्वर की संतान हैं। परंतु ऐसे समाज की रचना की जाए, जिसमें मनुष्य एक दूसरे का शोषण न कर सके।

गुरु नानक की चार ऐतिहासिक यात्राएं

अपने मूल्यों, सिद्धांतों और अनुभवों के प्रचार का नानक का अपना एक तरीका था । उन्होंने तत्कालीन तथाकथित धार्मिक नेताओं की कूपमंडूकता का विरोध किया, जो शेष विश्व में हो रही ज्ञान विज्ञान और आध्यात्मिक क्षेत्र की प्रगति से सर्वथा अनभिज्ञ रहकर सदैव अपनी श्रेष्ठता पर आत्ममुग्धग  रहा करते थे। नानक ने मानव चेतना को कुंठित करने वाली इस प्रवृत्ति को अपनी जीवनशैली में शामिल करने से इनकार किया ।उनकी मान्यता थी कि यदि कोई धर्म प्रकृति के संपर्क में आने से, विभिन्न धर्मों संप्रदायों और मतों के व्यक्तियों के मिलने व बातचीत करने मात्र से भ्रष्ट हो जाता है , तो वह धर्म तो सचमुच कभी का भ्रष्ट हो चुका है । नानक ने अपने जीवन के 25 वर्ष सुदूर यात्राओं में व्यतीत किए ।यह यात्राएं इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण व महान हैं कि यह आज से 600 साल पहले उस समय की गईं, जब परिवहन के कारगर साधन सहज सुलभ नहीं थे।

नानक ने अपने जीवन में चार बड़ी यात्राएं कीं, जिन्हें ‘चार उदासियों’  के नाम से पुकारा जाता है ।

  • उनकी पहली यात्रा (1497 से 1509ई०) सुदूर पूर्व में थी; जब वह धर्म उपदेश देते हुए असम तक गए।
  • दूसरी यात्रा (1510 से 1515ई०) दक्षिण की ओर थी। इस यात्रा में नानक ने जैन और बौद्ध धर्म से संबंधित स्थलों का भ्रमण किया और श्रीलंका तक गए ।
  • यात्रा के तीसरे दौर (1515 से 1515ई0) में नानक ने हिमालय पर्वत की श्रंखलाओं में  प्रकृति से साक्षात्कार किया ।
  • उनकी अंतिम यात्रा(1517 से 1521ईo)  मुसलमानों के पवित्र तीर्थों की थी, जिसके दौरान वह मक्का- मदीना, इराक, ईरान, अफगानिस्तान आदि देशों में गए और वहां के लोगों को अपने सिद्धांतों के बारे में बताया। बगदाद में तो आज भी गुरु नानक की बगदाद- यात्रा की स्मृति में एक गुरुद्वारा मौजूद है ।दुनिया में बहुत कम धर्म प्रचारक ऐसे हुए हैं ,जिन्होंने अपने धार्मिक सिद्धांतों के प्रतिपादन हेतु इतने व्यापक यात्राएं की हों।

अंतिम समय

संत 1538 ई. में गुरु नानक का निधन हो गया। उन्होंने अपना अंतिम समय इरावती नदी के तट पर बिताया। गुरु नानक में अपना संपूर्ण जीवन दिग्भ्रमित मानवता को ईश्वर- आराधना, मानव -प्रेम, एकता व समता का मार्ग दिखाने में निकालने में लगा दिया। आज के जहरीले सांप्रदायिक, हिंसक,और मजहबी जुनून से ग्रस्त वातावरण में गुरु नानक उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने वह अपने युग में थे। वस्तुतः नानक की प्रासंगिकता देश काल से ऊपर सर्वकालिक है।