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सफरनामा सुगंध का

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कंद-मूल, फल-फूल, पŸिायों से लेकर जीव-जन्तुओं के तन में बसने वाली गंध की पहचान करने का आदिमानव युगों से प्रयत्न करता रहा और वह प्रकृति की सभी खुशबुओं को बोतल या शीशी में बंद करने में सफल हो गया है।
चंदन, गुलाब, केवड़ा, मृग, मछली आदि की गंध का प्रयोग प्राचीन-काल से ही मानव अपने व्यक्तित्व को सजाने-संवारने के लिए करता रहा है। महत्वपूर्ण मांगलिक अवसरों, महोत्सव से लेकर शारीरिक, मानसिक एवं त्वचा संबंधी रोगों तक के लिए वह इन सुगंधियों का सहारा लेता है। सुगंधियों के ऐतिहासिक पृष्ठ पलटें, तो देखेंगे कि विश्व के लगभग सभी प्राचीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक साहित्य में नाना प्रकार की सुगंधियों तथा उनके उपयोग के विवरण मिलेंगे। इनसे ज्ञात होता है कि उन देशों की धार्मिक तथा सामाजिक प्रथाएं एवं परंपराएं सुगंधियों से जुड़ी थीं। प्राचीन मिस्त्र विभिन्न सुगंधियों के लिए प्रसिद्ध था। इसका प्रमाण मिस्त्र की ममियां हैं। उस समय की वैज्ञानिक पद्धति से निर्मित अंगराग तथा सुगंधित लेपों से तत्कालीन राजा और रानियों के शवों को सुरक्षित रखा जाता था। सहस्त्र वर्षों के व्यतीत हो जाने पर भी इन ममियों के अंगराग आज भी ठीक अवस्था में हैं। मिस्त्र में राज्याभिषेक के समय राजा नाना प्रकार की सुगंधियों से, सुंगंिधत जल से स्नान कराया जाता था। मिस्त्र की विश्वविख्यात मलिका क्लियोपेट्रा अंगराग तथा सुगंधि-शास्त्र की आविष्कार मानी जाती हैं। बेबीलोन की सम्राज्ञी हंबूरानी ने अपने शासन के समय प्रजा के लिए खुशबू वाले पानी से नहाना अनिवार्य नियम बना दिया था। किवदंती है कि बालक यीशु के जन्म पर किन्हीं तीन अलौकिक व्यक्तियों ने उनको सुगंधि भेंट में दी थी, तब से ही आज तक बड़े दिन के उपलक्ष्य में ईसाई अपने प्रियजनों को सुंगधि देते हुए मंगल कामनाएं करते हैं।
चीन के मछेरों द्वारा अच्छा शिकार पाने के लिए सुगंधित धूप जलाने की परंपरा थी। ईरान में ‘इत्रे गिल‘ (एसेंस आफ अर्थ) मशहूर थी। भारत भूमि से निकली गंध से प्रसन्न हो जाने वाले घुम्मकड़ ईरानी बंजर रेगिस्तानी मिट्टी से गंध का सार इत्रे खिल ले गए। फारस में ‘खिल‘ शब्द समय के प्रभाव से ‘गिल‘ हो गया और सार उतारने की क्रिया अतर हो गई। इस क्रिया के कुशल शिल्पी कालांतर में अत्तार कहलाए।
प्राचीन भारत में वैदिक काल से हवन और यज्ञ में सुंगधित सामग्री प्रयोग में लाई जाती थी। विवाह या अन्य मांगलिक अवसरों पर अतिथियों को सुगंध लगाने की पंरपरा थी।
सुगंधित पदार्थो और अंगराग का प्रयोग देहयष्टि की सौंदर्य वृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए किया जाता था। रामायण और महाभारत में अंगराग और सुगंधि द्रवों का प्रयोग औषधियुक्त तेलों में होता था। सीता के विवाह के समय चंदन, गुलाब की पत्तियों का उबटन लगाया गया था। चेतना शून्य व्यक्ति को चेतना में लाने के लिए सुगंधित जल के प्रयोग का संकेत है। महाराज दशरथ के शव को भरत के आने तक सुरक्षित रखने के लिए सुगंधित तेलों में डूबों कर रखा गया था।
महाभारत काल में सुगंधित द्रवों का प्रयोग करना लोगों की परिष्कृत रूचि का परिचायक माना जाता था। उस युग में विभिन्न प्रकार के अंगराग, सुगंधित विलेपनों, तथा सौंदर्यवर्धक उबटनों को तैयार करने के लिए राजप्रासाद तथा अंतःपुर में विशेष प्रसाधक-प्रसाधिकाएं नियुक्त किए जाते थे। सुभद्रा के विवाह के अवसर पर कृष्ण द्वारा जो भेंट स्वरूप एक हजार दासियां दी गई थीं, वे प्रसाधिकाएं सुगंधित द्रवों के उबटन, लेप और अंगराग लगाने की कला में दक्ष थीं।
द्रौपदी ने अज्ञातवास का समय काटने के लिए सैरंधी के रूप में रानियों के लिए अंगराग और लेप बनाने वाली दासी बनकर काम किया था। द्रोणपर्व के 58वें अध्याय में युधिष्ठर की दिनचर्या का उल्लेख है कि उनके 108 युवा प्रसाधक सोने के घड़ों के सुगंधित जल से स्नान कराते थे। अग्निपुराण में राजा के उपभोग योग्य सुगंधों की निधि का उल्लेख किया गया है। सुगंधों का सार निकालने मे कुशल, निपुण पुरूष और स्त्रियां सुगंधित आसव एवं अर्क बनाने के लिए नियुक्त थे। अंतःपुर में सुगंधियों की मांग अधिक थी।
मौर्यकाल में अंगरागों और सुगंधित द्रवों का प्रचलन बहुत था। इन सुगंधियों में विष मिला होने की संभावना से कौटिल्य ने कहा था कि, प्रसाधक या प्रसाधिकाएं राजा के स्नान आदि कार्यो मंे आने वाले सुगंधित उबटन, अंगराग, चंदन, केसर तथा सिर पर लगाई जाने वाली सुगंधित वस्तुओं को स्वयं अपने तन पर लगाकर इन सब द्रवों का परिक्षण कर लें, तदुपरांत राजा को लगाएं।
संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में प्रत्येक मौसम में लगाए जाने वाले सुगंधित पदार्थों, अंगराग का वर्णन मिलता है। इनमें स्वप्ननासदŸाा रधुवंश, ऋतुसंहार, कुमार संभव, आदि प्रमुख हैं। अंगरू, चंदन, केसर, कपूर, गुलाब आदि सुगंधित द्रवों का लेप केवल सौंदर्य वर्धन के लिए ही नहीं त्वचा को निरोग बनाए रखने के लिए भी किया जाता था।
मध्यकाल में फ्रांस में इत्र का यूरोपीय या पश्चिमी रूप तैयार हुआ। इत्र या सुगंधियों को चंदन के तेल की जगह अल्होहल में मिलाकर बनाया जाने लगा। इसका नया नाम सेंट या ‘परफ्यूम’ हो गया।
प्राचीनकाल में सुगंध निकालने वाले विशेषज्ञ किसी फूल या पŸिायों का सुंगधित भाग निकाल लेते और उसे पीसकर तेल, पानी या शराब में डालकर सुगंधियां तैयार करते थे। आजकल आसवन की विशेष विधि से सुगंध तैयार की जाती है। इस विधि का आविष्कार एक अरबी चिकित्साशास्त्री डाॅं. एवीसेना ने किया था। गुलाब के तेल की खोज मुगल बेगम नूरजहां ने नहाते समय गुलाब जल भरे हौज में तैरते तैलीय कणों को देखकर की थी। तैलीय कणों को एकत्र करके, बेगम ने सूंघा तो उनका रोम-रोम खुशबू से भर गया और इसे ‘इत्रे जहांगीरी‘ नाम दे डाला। गुलाब की शुद्ध सुगंध या खुशबू आज सारे विश्व में लोकप्रिय है।
परफ्यूम या सुगंधियों का भी अनोखा प्रभाव है। इनसे स्त्री-पुरूषों का तो लगाव होता ही है, जंगली जानवर भी अपनी प्रिय खुशबूओं से खिंचकर चले आते हैं। जंगली जानवरों का पकड़ने और उन्हें पालतू बनाने के लिए नाना प्रकार की खुशबूओं का प्रयोग प्राचीनकाल से चला आ रहा है। लैवेंडर की गंध शेर, चीता, जैसे खूंखार जानवरों को बहुत पंसद है। इसकी सुंगध से उनमें सम्मोहन हो जाता है। चंदन, केवड़े की खुशबू सांप बहुत पंसद करते हैं। परंतु जहां ये जानवर सुगंधों के शौकीन हैं, वहीं ‘सिटेªनेला‘ की गंध से मच्छर दूर भागते हैं।
आज सुगंधियों के विषय में नित नई-नई खोजें हो रही हैं। अल्कोहल से बनी सुगंध, इत्र या परफ्यूम के पूरे विश्व में अपने-अपने ढंग से बनाए जाने वाले कारखाने हैं, जिनकी तीखी गंध नथुनों का फाड़ डालती है। भारत में आज भी प्राचीन पद्धति से इत्र बनाने वाले गंधी कन्नौज, अलीगढ़, राजस्थान, और मालवा के सीमावर्ती गांवों में मिल जाएंगे। इनके बनाए फुलैल या इत्र में जो मृदुता और सरलता है, वह विश्व के अन्य इत्रों में कहां?