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जानें अंतरिक्ष यात्री क्या खाते हैं (Food for astronaut)

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विज्ञान के तेजी से विकास के साथ यान में जाने वाले यात्रियों की तादाद में भी तेजी से वृद्धि हुई है। विज्ञान में रूचि रखने वाले जब इन अंतरिक्ष यात्राओं के बारे में सुनते-पढ़ते हैं तो उन्हें यह सहज जिज्ञासा होना स्वाभाविक ही है कि ये यात्री अंतरिक्ष में क्या खाते पीते होंगे?

जब पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने सोयूज 11 यान से सेल्यूत 7 प्रयोगशाला में प्रवेश किया तो वहां पहले से मौजूद दो अंतरिक्ष यात्रियों ने उन्हें खाना खिलाने की पहले से तैयारी कर रखी थी। राकेश शर्मा को तब अंतरिक्ष में गर्मागर्म खाना खिलाया गया था।

आइये, अंतरिक्ष के भोजन के बारे में कुछ दिलचस्प जानकारी आपको दें:-

  • अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जो भोजन सामग्री यान में रखी जाती है, वह ऐसी होती है, जो कम जगह घेरे, हल्की हो और सहजता से पच सके। साथ ही इस बात का भी ख्याल रखा जाता है कि वह खाद्य सामग्री ऐसी हो जो काफी समय तक रखी रहने पर भी खराब न हो और उसे खाया जा सके। इस बात का भी ख्याल रखा जाता है कि अंतरिक्ष यात्री जिन चीजों को खाने-पीने का आदी है, उसी से बनी सामग्री रखी जाती है, ताकि शरीर उन्हें आसानी से पचा सके। आम तौर पर नयी चीज शरीर वहां पर एकदम पचा नहीं पाता है।
  • खाना खाने के वास्ते अंतरिक्ष में चाकू या छुरी का उपयोग नहीं हो सकता है, इसलिए सभी चीजों को छोटे आकार में तैयारी किया जाता है, ताकि खाने-पीने में मुश्किल न आये। उदाहरण के तौर पर रोटियां आमतौर पर चाकलेट की शक्ल की बनायी जाती हैं और एक रोटी का वजन साढ़े चार-पांच ग्राम के आसपास होता है और उसे एक कौर मंे ही खाया जा सकता है। इन रोटियों को खास तौर पर सेलीफीन के थैलों में लपेटकर रखा जाता है। राकेश शर्मा की अंतरिक्ष यात्रा के समय कुछ ऐसे भारतीय भोजन भी अंतरिक्ष यान में रखे गये थे, जिन्हें पहली दफा अंतरिक्ष यात्रा में शामिल किया गया था, जैसे आलू छोले, शाकाहारी पुलाव और सूजी का हलवा।
  • अमरीका में अंतरिक्ष में यात्रियों के भोजन के आधार पर अनेक कम्पनियों ने कई नयी खाद्य वस्तुएं बनाकर उनका धुंआधार प्रचार किया है। पिल्सबरी नामक एक कम्पनी ने तो ‘स्पेस फूड स्टिक‘ ही बना डाली, जो सिगरेट के आकार की होती है। इसमें 8 प्रतिशत प्रोटीन, 70 प्रतिशत कार्बोहाइडेट और 13 प्रतिशत वसा होती है। शेष 9 प्रतिशत में विटामिन और खनिज होते हैं।
  • इस तरह के भोजन को तैयार करने मंे हवा का प्रयोग नहीं किया जाता। इस कारण यह कई दिनों तक खराब नहीं होता।
  • अंतरिक्ष यात्रा के दौरान इस टिकियानुमा भोजन को बगैर चबाये यूं ही गटक लिया जाये तो कोई दिक्कत नहीं, मगर इन टिकियों को गीला करना पड़ता है, पानी के इंजेक्शन लगाकर। उन पर नमक-मसाला भी छिड़कना पड़ता है, लेकिन नमक-मसाला लगाते समय सावधानी रखनी होती है, ताकि वह इधर-उधर न फैलने पाये। खाना खाते समय खाद्य वस्तु और मुंह के बीच की दूरी जितनी कम हो, उतना ही अच्छा। वहां पानी भी खुले गिलास से नहीं पिया जा सकता, बल्कि बच्चों की तरह बोतल से चूसकर पीना होता है, क्योंकि गुरूत्वाकर्षण नहीं होने से पानी से भरा गिलास यदि उल्टा भी कर दिया जाये तो एक बूंद पानी फर्श पर नहीं गिरेगा और हल्का-सा झटका लगने पर कमरे में पानी की बौछार हो सकती है।
  • सूखी चीजों को गीला करने के लिए उसकी प्लास्टिक थैली के अन्दर ही इंजेक्शन लगाया जाता है, फिर थैली को दांत के बीच दबाकर पके आम की तरह चूसना पड़ता है। आदमी की ग्रास नली अनके छल्लेदार मांसपेशियों से बनी होना अंतरिक्ष यात्रियों के हक में है वरना भोजन गले से नीचे ही नहीं उतरता।
  • अंतरिक्ष में यात्रियों को प्यास बहुत कम लगती है। दरअसल प्यास न लगने के मूल में कारण यह है कि अंतरिक्ष में शरीर के निचले हिस्से में खून कम, हृदय और मस्तिष्क के भाग में अधिक जमा हो जाता है। इससे यात्रियों को पानी की अधिकता का भ्रम होता है, फिर भी यात्रियों को यह बात प्रशिक्षण के दौरान बता दी जाती है कि प्यास न लगे, तब भी पानी पीते रहे हैं। यदि वह लगातार पानी नहीं पीयेंगे तो शरीर में पानी की मात्रा कम हो जायेगी और यह स्थिति उनकी सेहत के लिए नुकसानदेह होगी।
  • अंतरिक्ष में यान में बैठे यात्रियों को न तो भोजन की कमी होती है और न ही भोजन के स्वाद में कोई अन्तर आता है। केवल भोजन करने के तरीके में परिवर्तन आ जाता है।