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finger print | फिंगर प्रिंट

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अपराध अनुसंधान में क्रांतिकारी  परिवर्तन फिंगर प्रिंट सिस्टम से

अपराध अनुसंधान के क्षेत्र में क्रांतिकारी  परिवर्तन का श्रेय फिंगर प्रिंट सिस्टम को जाता है।  सही अपराधी का पता लगाने और अपराध के अन्वेषण की दिशा में आज यह प्रणाली अत्यधिक  विश्वसनीयता प्राप्त कर चुकी है। अपराध विज्ञान जगत में इस महत्वपूर्ण शाखा का जाल संसार भर में फैला हुआ है।

क्या संसार में किसी भी व्यक्ति के अंगुलियों के निशान किसी अन्य से नहीं मिलते ?

अंगुलियों के निशान से अपराधी तक पहुँचने की यह प्रणाली इस तथ्य पर आधारित है कि संसार में किसी भी व्यक्ति के अंगुलियों के निशान किसी अन्य से नहीं मिलते। प्रत्येक अंगुलियों के निशान और अंगूठे के निशान अपने आप में अद्धितीय हैं। साथ ही एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये निशान जन्म से मृत्यु पर्यन्त बिल्कुल एक जैसे रहते हैं। इनमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता है। यह निशान गर्भ के छठे महीने में ही स्पष्ट रूप से उभर आते हैं।

फिंगर प्रिंट का इतिहास

कुदरत के इस नायाब करिश्मे की जानकारी आज से कोई दो हजार वर्ष पूर्व सर्वप्रथम  चीनवासियों को हुई। उस युग में महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेजों और फरमानों पर सम्राट अपने अंगूठे की छाप का इस्तेमाल करते थे। मध्य युग में मोम की परतों पर अंगुलियों की छाप के निशान अवशेष रूप मे उपलब्ध हुए है।

वैज्ञानिक दृष्टि से अंगुलियों की छाप से संबंधित परीक्षण सर्वप्रथम इटली में प्रारम्भ हुए। सन्‌ 1686 में शरीर रचना भाषा के वैज्ञानिक प्रोफेसर मारसेली मालविनों द्धारा इस दिशा में सूक्ष्म अध्ययन से गहन वैज्ञानिक अनुसंधान किये गये। इसके बाद इस दिशा में शनेः शनैः वैज्ञानिक परीक्षण चलते रहे। सन्‌ 1823 में डॉ. पार्किजी ने, सन्‌ 1880 में विलियम हशैक ने इस बारे में महत्वपूर्ण अनुसंधान किये।

विलियम हशैक उस समय बंगाल के हुगली नगर के कलेक्टर थे। भारत में अशिक्षा के कारण लोग लेन-देन के पुष्टिकरण के लिये कागजातों पर अंगूठे के निशान लगाया करते थे। इस  तथ्य से उनका ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ और उन्होंने इस सम्बन्ध में बंगाल के तत्कालीन आई.जी. पुलिस सर एडवर्ड से इस बारे में जिक्र किया और बाद में अपने सहयोगी हेमचन्द्र बसु तथा अजीम-उल हक की मदद से विभिन्‍न अपराधियों की अंगुलियों और अंगूठे के निशान लेकर फाईल में रखना प्रारम्भ किया।

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विश्व का प्रथम फिंगर प्रिंट ब्यूरो

सर हैनरी ने अपराध विज्ञान की इस नवीनतम शाखा को मान्यता दिलाने हेतु अथक प्रयास कियें। उनके प्रयासों के फलस्वरूप ही सन्‌ 1897 मे कलकत्ता में विश्व का सर्वप्रथम फिंगर प्रिंट ब्यूरो स्थापित हो सका। सर एडवर्ड रिर्चर्ड हैनरी बाद में स्काटलैण्ड यार्ड के कमिश्नर नियुक्त हुए, जहां सन्‌ 1901   में उन्होने अपराधियों को पकड़ने हेतु अंगुली की छाप से संबंधित अपने द्वारा विकसित प्रणाली लागू की।

हैनरी द्वारा प्रतिपादित इस प्रणाली में अंगुलियों के निशानों को भिन्न-भिन्न वर्गो में विभाजित  कर दिया जाता था। ये समूह सूक्ष्यदर्शी यंत्र से धारियों की गिनती  करके उन्हें पुन: एक विशेष समूह में बांटा जाता था और उसे आधार बनाकर अपराधी की खोज की जाती थी।

यह प्रणाली हैनरी वर्गीकरण  प्रणाली के नाम से विख्यात हुईं  तथा आज संसार के अधिकांश देशों में यह प्रणाली आवश्यक संशोधनों के साथ उपयोग में लाई जा रही है। सर हैनरी के नेतृत्व में ब्रिटिश पुलिस एजेन्सी स्काटलैण्ड यार्ड ने अंगुलियों के निशानों द्वारा कई उलझे हुए प्रकरणों को सुलझाने में आशातीत सफलता प्राप्त की।

अदालतों ने दी फिंगर प्रिंट को मान्यता

सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि उस समय तक अदालतों ने फिंगर प्रिंट को एक ग्राह्‌ साक्ष्य के रूप में मान्यता प्रदान नहीं की थी। सर हैनरी ने एक हत्या और डकैती के मुकदमें में तफ्त्तीश  शुरू की और फिंगर प्रिंट के आधार पर अपराधी को खोज निकाला। अदालत में अपराधी को पकड़  सकने की सफलता का श्रेय अंगुलियों के निशान वाली प्रणाली को देते हुए अदालत को संतुष्ट कर दिया और इस प्रकार फिंगरप्रिंट को अदालती कार्यवाही में एक महत्वपूर्ण व विश्वसनीय साक्ष्य के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई |

अपराधी की खोज में फिंगर प्रिंट महत्वपूर्ण

आज फिंगर प्रिन्ट प्रणाली अपराध विज्ञान में महत्वपूर्ण स्थान अर्जित कर चुकी है। कई फिंगर  प्रिन्ट ब्यूरो स्थापित हो चुके हैं, जहां अपराधियों की अंगुलियों के निशान संग्रहित किये जाते हैं।  अंगुलियों के निशान घटना स्थल पर अपराध के समय अपराधी द्वारा छोड़े जाते हैं। अंगुलियों के  छाप के निशान रोम छिद्रो से निकलने वाले पसीने व चिकनाई पर निर्भर करते हैं।

अपराध के करते  समय मानसिक तनाव के कारण शरीर से निकलने वाले पसीने की मात्रा में प्राकृतिक रूप से बढोतरी  होती है और अपराध स्थल पर अपराधी द्वारा स्पर्श की गई वस्तुओं पर उसकी अंगुलियों के निशान अंकित हो जाते हैं। लकडी की अलमारियों, दरवाजों, कांच आदि वस्तुओं पर यह निशान अधिक स्पष्ट होते हैं। विशेषज्ञों द्वारा इन निशानों पर एक खास किस्म का घाउडर छिड़क कर इन्हें स्पष्ट रूप से उमार लिया जाता है, फिर कैमरे द्वारा इनके चित्र खींच लिये जाते हैं। इसके बाद  प्रारम्भ होता है, सूक्ष्म तुलनात्मक अध्ययन, जो बाद में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में न्यायालय में प्रस्तुत  किया जाता है।

अपराध विज्ञान की चमत्कारिक खोज की एक शताब्दी

अपराध विज्ञान की यह चमत्कारिक खोज अपनी सफलता की एक शताब्दी तय कर चुकी है। हमारे देश में भी इस प्रणाली को वैधानिक मान्यता प्राप्त है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 तथा 73 में फिंगर प्रिन्ट विशेषज्ञ की साक्ष्य को मान्यता प्रदान की गई है। सीधे साक्ष्य के अभाव में  फिंगर प्रिन्ट को एक महत्वपूर्ण, अकाट्य साक्ष्य माना जाता है। देश में अठारह फिंगर पिन्ट ब्यूरो कार्यरत है, जिनमें करीब 50 लाख अपराधियों की अंगुलियों के निशानात का रिकार्ड मौजूद है। कोलकाता में सेन्‍्ट्रल फिंगर प्रिन्ट ब्यूरो के नाम से केन्द्रीय कार्यालय स्थित है।

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अपराधियों की धरपकड़ के अलावा भी फिंगर प्रिन्ट प्रणाली उपयोगी

आधुनिक, अनुसंधानो और तकनीक ने इस विशाल संग्रह से वांछित अंगुली के निशान  सरलता से ढूंढ निकालना भी बहुत आसान कर दिया है। अपराधियों की धरपकड़ के अलावा फिंगर प्रिन्ट प्रणाली से जीवन बीमा, भविष्य निधि, पेंशन, रजिस्ट्रेशन, वसीयत आदि महत्वपूर्ण दस्तावेजों को जालसाजी से मुक्त रखने में सहायता मिलती है।वर्तमान  में देश में सफलतापुर्वक संचालित आधार कार्ड इसी प्र आधारित हैं l  यह प्रणाली  व्यक्ति की पहचान का सर्वाधिक  सरल, विश्वसनीय तथा वैज्ञानिक आधार है।

अपराध अनुसंधान के क्षेत्र में क्रांतिकारी  परिवर्तन का श्रेय फिंगर प्रिंट सिस्टम को जाता है।  सही अपराधी का पता लगाने और अपराध के अन्वेषण की दिशा में आज यह प्रणाली अत्यधिक  विश्वसनीयता प्राप्त कर चुकी है। अपराध विज्ञान जगत में इस महत्वपूर्ण शाखा का जाल संसार भर में फैला हुआ है।

अंगुलियों के निशान से अपराधी तक पहुँचने की यह प्रणाली इस तथ्य पर आधारित है कि संसार में किसी भी व्यक्ति के अंगुलियों के निशान किसी अन्य से नहीं मिलते। प्रत्येक अंगुलियों के निशान और अंगूठे के निशान अपने आप में अद्धितीय हैं। साथ ही एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये निशान जन्म से मृत्यु पर्यन्त बिल्कुल एक जैसे रहते हैं। इनमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता है। यह निशान गर्भ के छठे महीने में ही स्पष्ट रूप से उभर आते हैं।

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आधुनिक, अनुसंधानो और तकनीक ने इस विशाल संग्रह से वांछित अंगुली के निशान  सरलता से ढूंढ निकालना भी बहुत आसान कर दिया है। अपराधियों की धरपकड़ के अलावा फिंगर प्रिन्ट प्रणाली से जीवन बीमा, भविष्य निधि, पेंशन, रजिस्ट्रेशन, वसीयत आदि महत्वपूर्ण दस्तावेजों को जालसाजी से मुक्त रखने में सहायता मिलती है।वर्तमान  में देश में सफलतापुर्वक संचालित आधार कार्ड इसी प्र आधारित हैं l  यह प्रणाली  व्यक्ति की पहचान का सर्वाधिक  सरल, विश्वसनीय तथा वैज्ञानिक आधार है।

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