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पलक – पुराण

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हमारी आंखे शरीर का सबसे संवेदनशील व दुर्बल इंद्रिय है। इनका बहुत बड़ा हिस्सा हमारी खोपड़ी से सुरक्षित रहता है। इनकी खोल में चर्बी की मोटी परत वाली हड्डियों की कोटर है, जो तेज से तेज धक्के सह सकती है। आंखों की कुल सतह का दसवां हिस्सा बादाम के आकार का होता है, जिससे हम देखते हैं और रोशनी प्राप्त करते हैं।। जब यह खुला होता है तो उसके और वायुमंडल के बीच कुछ और नही होता।
शरीर अपने इस बहुमूल्य अंग की सुरक्षा, पलकें झपकाकर करता है। पलक झपकने की क्रिया एक सेकंड के दसवें हिस्से से भी कम समय लेती है। इस दौरान आंखों के खुले भाग पर शरीर की सबसे पतली चमड़ी का एक परदा, जो मजबूत रेशेदार कार्टिलेज का बना होता है, आंखों को ढक लेता है। पलकें सिकुड़कर आंखों को आंसुओं से तर कर देती है। आंसू आंखों में जमा कचरे को साफ करते हैं और नम रखते है।
पलक झपकाने की क्रिया के कई रूप हैं। आंखों को साफ करने के अलावा अकस्मात् आने वाली परिस्थितियों, जैसे भारी शोर-शराबा और गुस्सा अथवा अविश्वास प्रकट करने के लिए हम हम अपनी पलक स्वेच्छा से झपकाते हैं। नैसर्गिक पलक झपकाने की क्रिया न तो स्वेच्छा से होती है और न प्रतिक्रयास्वरूप। पलक झपकाने की क्रिया प्राकृतिक होती है। आंख को साफ करने के लिए एक मिनट में एक बार से अधिक पलक झपकाने की आवश्यकता नहीं, फिर भी एक मिनट में लोग 15 बार पलक झपकाते हैं। हम इतनी जल्दी पलक क्यों झपकाते है? अप्रत्यक्ष रूप से हमारे मस्तिष्क और पलक झपकाने की क्रिया में सीधा संबंध है।
कैमरों, अवरक्त किरणों और इलेक्ट्राॅड की सहायता से वैज्ञानिक हमारी आंखों के आसपास की नसों और मांसपेशियों का विद्युत प्रवाह मापकर जान सकते हैं कि किस प्रकार आदमी की चुस्ती और सुस्ती, चिंता अथवा ध्यान केंद्रित करने की स्थिति के अनुसार पलक झपकाने की दर और अवधि घटती-बढ़ती रहती है।
पता चला है कि सतर्कता की स्थिति में व्यक्ति सबसे कम पलक झपकाते हैं। उपन्यास पढ़ रहा आदमी एक मिनट में लगभग छह बार पलक झपकाता है। बातचीत में व्यस्त व्यक्ति एक मिनट में दो बार से अधिक पलक नहीं झपकाता। हाय-वे पर मोटरगाड़ी चलाते समय व्यक्ति जितनी बार पलक झपकाता है, शहर के टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजरते समय कम पलके झपकाता हैं। जब चालक किसी दूसरी गाड़ी से आगे निकलता है, तब उसकी पलक झपकाने की क्रिया बहुत कम हो जाती हैं। उसकी आंखंे सड़क पर से स्पीडो मीटर पर आ जाती है या वह पीछे देखने वाले शीशे में अथवा मुड़कर पीछे देख रहा होता है। ऊब होने पर व्यक्ति के पलक झपकाने की गति पर अधिक असर पड़ता है। कुछ लोगों को 32 मिनट के लिए संगीत की तान सुनायी गयी तो पाया गया कि पलक झपकाने के दौरान सेकंड के जितने अंश के लिए उनकी आंखे बंद हुई थीं, उस अंश के लिए 30 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी। अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क जब पाता है कि आने वाले सूचना जरूरी नहीं है तो वह अपने आपको विश्राम देता है और उसकी पलकें जल्दी नहीं झपकतीं। अनुसधानकर्ताओं ने पता लगाया है कि हम जो काम करते हैं, उसके अनुसार हमारी पलक झपकाने की गति घटती-बढ़ती है। ड्रांइग बनाने जैसे कार्यो में लगे लोग कम पलक झपकाते हैं। थका हुआ व्यक्ति आराम करते हुए अधिक बार पलक झपकाता है। परेशान होने पर हम अधिक पलक झपकाते हैं।
चिंता की स्थिति पलक झपकाने की क्रिया में वृद्धि करती है। हेलीकाॅप्टर का नौसिखिया पायलट अपने प्रशिक्षक की तुलना में अधिक पलकें झपकाता है। प्रश्नों की बौछार तले गवाह, उस गवाह की अपेक्षा अधिक पलक झपकाता है, जिसके साथ वकील दोस्ताना ढंग से पेश आ रहा हो। जब कोई व्यक्ति किसी सवाल का जवाब देते समय किस जड़ वस्तु का सामना करने के बजाय किसी अन्य व्यक्ति का सामना करता है तो उसकी पलक झपकाने की क्रिया बढ़ जाती है। जब ऐसे व्यक्ति से कठिन सवाल किये जाये जिनका जवाब सीधे ‘हां‘ या ‘ना‘ में वहीं देना हो तो पलक झपकाने की गति और बढ़ जाती है। पलक झपकने और आशंकित होने के बीच के संबंध के कारण टेलीविजन पर समाचार पढ़ने वालों को हिदायत दी जाती है कि वे शांतचित्त और संयत दिखने के लिए सामान्य रूप से पलक झपका सकते हैं, ताकि बेझिझक कैमरे का सामना कर सके। यही बात राजनीतिज्ञों पर लागू होती है। चिंता और तनाव की स्थिति में पलकें झपकाने की गति बढ़ जाती है, पर ऐसा क्यों होता है, मनोवैज्ञानिक इसका कारण अभी तक पता नहीं लगा सके हैं।
किसी चीज को याद रखने और पलक झपकाने के बीच सीधा संबंध है। यदि किसी से कहा जाये कि वह अक्षरों की श्रृंखला को याद करे तो अधिक संभावना है कि सारे अक्षर याद करने के तुरंत बाद वह पलक झपकायेगा। उसे और अक्षर याद करने को कहा जाये तो पलक झपकाने की अवधि बढ़ जायेगी। मस्तिष्क को दो चीजों के मुकाबले छह चीजों को याद रखने में अधिक समय लगता है। पलक झपकाने से उस क्षण का पता चलता है, जिस समय स्मरण शक्ति बनती है। मस्तिष्क अनुमान लगाता है कि अब कोई नयी सामग्री याद करने के लिए नहीं आयेगी।
पढ़ते समय यही हालत होती है। किसी पंक्ति को पढ़ते वक्त उसे समझ न पाने के कारण पिछले शब्द को तीन-चार बार जब हम दोहराते हैं तो पलक झपकाने की संभावना अधिक रहती है। ऐसा जान पड़ता है कि ज्ञानेंद्रियों से संबंधित महत्वपूर्ण कार्यो के बीच मस्तिष्क को विश्राम की आवश्यकता होती है। पलक झपकाने की क्रिया यह विराम है। इस तरह पलक झपकाने की क्रिया मस्तिष्क के विराम चिन्ह के समान है। लगता है यह क्रिया उस समय होती है, जब हम कोई सूचना पाने के बाद उसके बारे में सोचना शुरू कर देते हैं। शहरों में गाड़ी चलाने वाले कभी-कभी जो आंखे झपकाते हैं, वह अर्धविराम है। वे अपनी आंखों के सामने से तेजी से गुजरते दृश्यों को याद करने के लिए इकाइयों में बांट लेते हैं। याददाश्त रखने अथवा निर्णय लेने के दौरान पलक झपकाने के बीच की लंबी या कम अवधि पूर्ण विराम की सूचक है। इससे मस्तिष्क को सोचने-विचारने और सूचना को सुरक्षित रखने का मौका मिलता है।
इन बातों से पता चलता है कि एक जैसा कार्य विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न दरों से पलक झपकाने की क्रिया को प्रेरित करता है। गणित की पहेलियां हल करने के लिए ज्यादातर व्यक्ति अधिक बार पलक झपकाते हैं। जो व्यक्ति संख्याओं को अपने मस्तिष्क पर रखकर सोचते हुए देखकर हल ढूंढता है, वह उस चित्र को अपने दिमाग में अच्छी तरह बिठाने के प्रयत्न में कम से कम पलक झपकायेगा। इस तरह दूसरे व्यक्ति के पलक झपकाने की दर में वृद्धि हो सकती है, क्योंकि उसका दिमाग सवाल का हल ढंूढने के प्रत्येक चरण में पलक झपकाने का आदेश दे सकता है। हर आदमी की विचार प्रक्रिया उसके पलक झपकाने में प्रतिबिंबित होकर उसकी मनोदशा को अभिव्यक्त करती है।