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लाइलाज नहीं है मिर्गी

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‘मिर्गी‘ नामक जटिल बीमारी मानव सभ्यता के इतिहास की शुरूआत से ही अस्तित्व में हैं। तकरीबन हर युग में, हर जगह ‘मिर्गी‘ को लेकर कई अंधविश्वास प्रचलित रहे है, यह आम धारणा रही कि ‘मिर्गी‘ के रोगी पर कोई बुरी आत्मा या भूत-प्रेत का प्रभाव रहता है। इस रोग के कारणों का पता नहीं चलने तक जन मानस में इसकी रहस्यात्मकता बढ़ती रही।
सर्वप्रथम ईसा से कोई चार सौ बरस पूर्व महान चिकित्सा विज्ञानी हिप्पोके्रटिज ने अपने गहन अनुसंधानो के पश्चात यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि मिर्गी दरअसल अन्य रोगों की तरह सामान्य रोग है तथा इसका आत्मा, भूत-प्रेत जैसी मान्यताओं से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस रोग के बारे में प्रचलित अंधविश्वास मनुष्य की अज्ञानता के परिणाम है। हिप्पोके्रटीज की बातों पर लोगों ने भरोसा नहीं किया और वह ‘मिर्गी‘ रोग को और अधिक रहस्यमय बनाने में जुटे रहे।
‘मिर्गी‘ रोग को आयुर्वेद में ‘अपस्मार‘ नाम से संबोधित किया गया है जिसका अर्थ है-‘स्मृति नाश‘ । इसे कुछ लोग एक मानसिक रोग मानते है। चिकित्सकीय भाषा में इसे ‘एपिलेप्सी‘ नाम से जाना जाता है। वस्तुतः मिर्गी एक जटिल प्रकार की बीमारी है, जिसका सम्बन्ध मस्तिष्क की गड़बड़ी से है। डाक्टर हैग्लिंग जैक्सन के शब्दों में, मिर्गी मनुष्य के दिमाग के तंत्रिका ऊतक संस्थान में कभी-कभी अचानक उत्पन्न होने वाली नियन्त्रणहीन विद्युत सक्रियता है। हमारा समूचा शारीरिक संचालन मस्तिष्क द्वारा होता है। मस्तिष्क-केन्द्र द्वारा प्रवाहित विद्युत-तंरगो द्वारा ही सारे कार्य निर्देशित होते है। सामान्य तौर पर ये विद्युत गतिविधीयां स्वाभाविक और नियन्त्रित क्रम से सम्पादित होती रहती है। किन्तु कभी-कभी कुछ व्यक्तियों में विद्युत प्रवाह का यह संतुलन व नियमित क्रम गड़बड़ा जाता है। तब ये विद्युत तंरगे प्रबलतम वेग से उठने लगती हैं, जिसके कारण मस्तिष्क मंडलीय परिसर अचानक उŸोजित हो जाता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य संज्ञा-शून्य हो जाता है तथा विद्युत जनित उŸोजनाओ की कालावधि तक वह मूर्छितावस्था में पड़ा रहता है। कुछ मिनटों मे यह स्थिति समाप्त होते ही मनुष्य की चेतना लौटने लगती है तथा वह धीरे-धीरे पूर्वावस्था में लौट आता है।
‘मिर्गी‘ के वैसे तो कई लक्षण है लेकिन बेहोशी अथवा संज्ञाहीनता इसका प्रमुख लक्षण है, हाथ-पैर अकड़ना, दांतो का भिच जाना, आंखे फिर जाना, मुंह से झाग निकलना, मल-मूत्र घूट जाना आदि भी इस रोग के सामान्य लक्षण है। प्रारम्भ में रोगी के पेट में दर्द होता है और दिल की धड़कन अचानक तेज हो जाती है। फिर वह हाथ-पांव पटकते हुए संज्ञाशून्य हो जाता है।
तात्कालिक रूप से अपस्मार अथवा मिर्गी रोग का निदान कोई खास मुश्किल नहीं होता क्योंकि क्षणिक संज्ञा शून्यता की अवस्था शीघ्र ही स्वतः समाप्त हो जाती है। सामान्य तौर पर मिर्गी के दौरे खतरनाक नहीं होते तथा यह इतने क्षणिक होते हैं कि इलाज शरू करने से पहले ही समाप्त हो जाते हैं। कुछ लोग दौरे के समय अपस्मार और योपस्मार (हिस्टीरिया) में भेद नहीं कर पाते, किन्तु वस्तुतः यह दोनो रोग अलग है। हिस्टीरिया शुद्ध मानसिक रोग है तथा इसके दौरे के समय रोगी के मुंह से झाग नहीं निकलते है।
मिर्गी के स्थायी निदान के लिए रोग का इतिहास, पड़ने वाले दौरों की किस्म और तीव्रता, दो दौरों के बीच की निश्चित कालावधि, दौरो की एक-रूपता आदि कई तथ्यों का सूक्ष्म एवम् गहन अध्ययन करना आवश्यक है इस बीमारी का इलाज काफी लम्बा चलता है, तथा रोगी को वर्षो तक बिना व्यवधान के निरन्तर औषधियां लेनी पड़ती हैं। वैसे इस रोग के पूर्ण उन्मूलन की संभावनाएं कम रहती है, लेकिन यदि पड़ने वाले दौरो की संख्या में कमी होने लगे अथवा दौरे की अवधि में कमी हो तो इसे रोग-मुक्ति का संकेत मानना चाहिए। यदि दवाओं के निरन्तर सेवन के पश्चात भी अनुकूल परिणाम नहीं प्राप्त हो, तब भी रोगी को निराश होकर दवाइयां लेना बंद नहीं करना चाहिए।
इस रोग के मरीजों को सतर्कता और सावधानी के लिहाज से आग, खतरनाक मशीनों अस्त्र-शस्त्रों के सम्पर्क में आने से बचना चाहिए। भारी वाहन चलाना या गहरे पानी में तैरना भी उनके वर्जित है। मिर्गी के रोगी को नियमित रूप से दवा लेनी चाहिए, भरपूर नींद लेनी चाहिए अत्यधिक मैथुन भी हानिकारक है वातकारक खाद्य प्रदार्थ से परहेज करना चाहिए।
मिर्गी के रोगियों के प्रति समाज का भी कुछ दायित्व है, अधिकांश लोग उनका उपहास करते है, दरअसल इस प्रकार के रोगियों को मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता होती है। मिर्गी कोई छूत की बीमारी नही है, न ही यह अनुवांशिक रोग है। यह हमारा सामाजिक दायित्व है कि हम इस प्रकार के रोगियों का सामान्य जीवन जीने के अधिकाधिक अवसर उपलब्ध कराएं। मिर्गी के रोगी भी समाज के महत्वपूर्ण सदस्य है। इतिहास में निर्णायक भूमिकाएं निभाने वाल सिकन्दर महान, नेपोलियन बोनापार्ट, दांते, जूलियस सीजर, दास्तोएवस्की जैसे विलक्षण व्यक्ति भी मिर्गी के मरीज थे। लेकिन यह बीमारी उनकी सफलता में कहीं आड़े नहीं आई।
कैलाश जैन, एडवोकेट