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एक गांव साईकिलों का

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इंग्लैण्ड के उस गांव का नाम है – बेन्सन। बेन्सन को ‘साईकिलों का गांव‘ नाम से जाना जाता है। दुनिया-भर के पर्यटक हर साल यहां आकर एक से दो सप्ताह तक साईकिल-सवारी का लुफ्त उठाते हैं। इस दरमियान कई रईस पर्यटक तो लाखों रूपये खर्च कर डालतेे हैं।
यूं तो साईकिल एक बेहद सस्ती सवारी है और दुनिया के हर कोने में सहज सुलभ हो जाती है, किंतु साईकिलों के गांव बेन्सन में जो साईकिले मिलती हैं, वह कम से कम पचास-साठ वर्ष पुरानी है। आधुनिक माॅडल की साईकिलें लाना बेन्सन में निषिद्ध है। पूरे गांव में एक भी ऐसी साईकिल नहीं मिलेगी, जो आधुनिक तकनीक से नवीन माॅडल में बनी हुई हो। बड़े-बड़े उद्योगपति और धनी लोग बेन्सन में साईकिलों पर सवारी करते हुए मटन चाप, बिस्कुट, कोका कोला, केक, पेस्ट्री, फल आदि खाद्य पदार्थो का आंनद लेते हुए आसानी से देखे जा सकते है। इन साईकिलों की चाल बहुत धीमी होती है।
बेन्सन में एक साईकिल ‘ बोन शेकर ‘ नाम से मशहूर है। बाॅन शेकर यानी हड्डी तोड़! इस साईकिल को एक सौ साल पहले ‘आउट आफ फैशन‘ करार दिया जा चुका था। ‘बोन शेकर‘ साइकिल आज की साईकिल की रफ्तार से किसी भी सूरत में मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। इसकी रफ्तार वर्तमान साइकिल की रफ्तार से एक चैथाई भी नहीं है लेकिन उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में नौसिखिया साइकिल सवार इस पर सवार होने पर प्रायः हड्डी-फसली तुड़वा लिया करते थे, इसलिए इस साइकिल का नाम ‘बोन शेकर‘ पड़ गया।
एक तीन पहियों की साईकिल बेन्सन में महारानी विक्टोरिया के शासन काल में बनाई गयी गयी थी, जिस पर दो आदमी बड़ी आसानी से बैठ सकते थे। अपने जमाने में यह साईकिल भी खासी लोकप्रिय हुई व उस वक्त के राजकुमारों और रईसों की पसंदीदा सवारी बन गई।
बड़े-बड़े राजा-महाराजा और नगर सेठ अपनी पत्नियों के साथ इस साइकिल पर सैर करने के लिए निकला करते थे। उस समय साइकिल इतनी दुर्लभ हुआ करती थी कि साइकिल-सवारों को देखने के वास्ते सड़क पर दर्शकों की अच्छी खासी भीड़ जमा हो जाती थी।
बेन्सन में उन विदेशी धनी पर्यटकों की सुरक्षा के लिए, जो केवल मनोरंजन के लिए बेन्सन में साइकिल सवारी करने आते हैं, यह तय किया गया है कि यहां पर मोटरों को चलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। सादे मैदान व सड़कों पर साइकिल-सवार बिना किसी डर या खतरे के घूम-फिर सकें, इसके वास्ते किसी भी तेज गति वाले वाहन को यहां नहीं चलने दिया जाता।
बेन्सन में नैड पासी नामक एक अमीर व्यक्ति एक ‘साइकिल-संग्रहालय‘ का मलिक है। इस संग्रहालय में साइकिल का प्रारंभ से लेकर आज तक का सभी प्रकार का माडल उपलब्ध है। संग्रहालय की सभी साइकिलें, हांलाकि वह बहुत पुरानी है, बिल्कुल चुस्त-दुरूस्त अवस्था में है और उन्हें चलाई जा सकती है। शौकीन पर्यटक संग्रहालय से अपनी पंसद का माडल किराये पर लेते हैं और उसे चलाने के लिए मैदान में ले जाते हैं।
नैड पासी के इस संग्रहालय से साइकिल हासिल करने के लिए एक मजेदार शर्त निभानी पड़ती है। शर्त यह है कि किसी भी माॅडल विशेष को चलाने के लिए चालक को उसी जमाने का लिबास पहनना होगा, जिस जमाने की वह साइकिल है। नेड के संग्रहालय से यह लिबास भी किराये पर मिल जाता है।
बेन्सन के मैदान, गलियों, चैराहांे पर सैकड़ों प्रकार की पुरानी साइकिलें चलते हुए देखी जा सकती हंै। नैड पासी के संग्रहालय की एक साइकिल पूरे तौर पर लकड़ी की बनी हुई है। यह साइकिल पर्यटकों के विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रहती है और हर पर्यटक इसकी सवारी करने को लालायित रहता है।
भारत में साईकिल आम आदमी का वाहन है, लेकिन बेन्सन में यह हर खास आदमी का वाहन है। करोड़पति पर्यटक महज सप्ताह-दो सप्ताह साइकिल चलाने के लिए हवाई जहाज और हैलिकाप्टरों के द्वारा बेन्सन आते हैं और ऊंचे किराये पर साइकिल प्राप्त कर चलाते हैं।उनके द्वारा जो रकम इस शौक को पूरा करने के लिए खर्च की जाती है, उस रकम में भारत में आसानी से एक हजार साइकिलें खरीदी जा सकती हैं।
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