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एक पौश्टिक फल: बेल

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बेल गर्मियों में सब्जीमण्डी में बहुतायत से आने वाला एक बहु-उपयोगी और पौष्टिक फल है, जो गर्मी के मौसम में स्वस्थ रहने में हमारी मदद करता है। बेल स्वाद में एक रूचिकर और स्वादिष्ट फल है। आयुर्वेद में बेल को स्वास्थ्य के लिए काफी लाभप्रद फल माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार, पका हुआ बेल मधुर, रूचिकर और पाचक तथा शीतल फल है तथा कच्चा बेल फल रूखा, कटु, पाचक, गर्म, वात, कफ, शूलनाशक व आंतों के रोगों में उपयोगी होता है। बेल का फल ऊपर से कठोर होता है तथा इसमें पर्याप्त मात्रा में बीज होते है। इसके गूदे में एक खास प्रकार की मनमोहक सुगंध होती है। बेल के फल को ताजा सेवन करने के अलावा, सुखा कर भी उपयोग में लिया जाता है। इसे संस्कृत में ‘बिल्व‘ तथा हिंदी में ‘बेल‘ अथवा ‘बेलुझा‘ कहा जाता है। भारत में बेल का वृक्ष काफी पवित्र माना जाता है। बेल की पत्तीयोंभगवान शिव की प्रतिमा पर चढ़ाई जाती हैं। बेल-पत्रों को यदि व्यवस्थित रूप से रख दिया जाए, तो महीनों बाद भी यह वैसे ही रहते है। बेल भारत का एक प्राचीन वृक्ष है। इसका जिक्र धार्मिक गं्रथ ‘यजुर्वेद‘ में भी मिलता है। बेल का वृक्ष पूरे भारत में, खास तौर पर हिमालय की तराई में, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में 5000 फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है।
बेल के फल के सौ ग्राम गूदे का रासायनिक विश्लेषण इस प्रकार है: नमी – 61.5 प्रतिशत, वसा – 0.3 प्रतिशत, प्रोटीन – 1.8 प्रतिशत, फाईबर – 2.9 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट – 31.8 प्रतिशत, कैल्शियम – 85 मिलिग्राम फास्फोरस – 50 मिलिग्राम, आयरन – 0.6 मिलिग्राम, विटामिन सी – 2 मिलिग्राम। इनके अलावा, बेल में 137 कैलोरी ऊर्जा तथा कुछ मात्रा में विटामिन बी भी पाया जाता है। इस प्रकार बेल के इस रासायनिक विश्लेषण से भी इस तथ्य की पुष्टि हो जाती है कि यह काफी स्वास्थ्यप्रद फल है।
पश्चिमी देशों में भी बेल पर काफी शोध कार्य हुआ है। डा. एक्टन और डा. नोल्स ने अपनी ‘डिसेन्ट्रीज आॅफ इण्डिया‘ पुस्तक में तथा डा. हेनरी ने ‘ट्रांजेक्शन आॅफ रायल सोसायटी फार ट्रापिकल मेडिसन एण्ड हाईजीन‘ नामक पुस्तक में बेल के चमत्कारिक औषधिय गुणों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है।
उदर-विकारों में बेल का फल रामबाण दवा है। वैसे भी अधिकांश रोगों की जड़ उदर-विकार ही हैं। बेल के फल के नियमित सेवन से कब्ज जड़ से समाप्त हो जाती है। कब्ज के रोगियों को इसके शर्बत का भी नियमित सेवन करना चाहिए। बेल का पका हुआ फल उदर की स्वच्छता के अलावा, आंतों को भी साफ कर उन्हें ताकत देता है।
यदि कोई विषैला पदार्थ खाने में आ गया हो, तो बेल-फल भरपेट खाना चाहिए। इससे दस्त के साथ जहर निष्प्रभावी होकर बाहर निकल जाता है।
मधुमेह के शिकार लोगों को भी बेल के फल का नियमित सेवन करना चाहिए। इसके अलावा मधुमेह के रोगी को बेल की पत्तीयों का रस दिन में दो बार सेवन करना चाहिए। एक माह तक नियमित सेवन से डाईबिटीज की बीमारी में काफी राहत महसूस होगी।
रक्ताल्पता में पके सूखे बेल की गिरी का चूर्ण बनाकर उबलते हुए दूध में मिश्री के साथ इस पाउडर का एक चम्मच प्रतिदिन सेवन करें। इससे शरीर में नये रक्त का निर्माण होगा और स्वास्थ्य लाभ होगा।
गर्मियों में प्रायः अतिसार की वजह से पतले दस्त होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में कच्चे बेल को आग में भूनकर उसका गूदा रोगी को खिलाएं।
गर्मियों में लू लगना एक सामान्य बात है। लू लगने की स्थिति में बेल के ताजे पत्तीयों को पीसकर मेंहदी की भांति पैरों के तलुओं पर भली प्रकार मलें। इसके अलावा, सिर, हाथ, छाती पर भी इसकी मालिश करें। रोगी को बेल का मिश्री मिश्रित शर्बत भी पिलाएं। वह जल्दी ही राहत महसूस करेगा।
पेप्टिक अल्सर होने पर बेल की पत्तीयों को धोकर पानी में भिगो दें। सवेरे इस पानी को छानकर रोगी को पिलाएं। लम्बे अर्से तक यह प्रयोग करने पर लाभ मिलेगा। दरअसल बेल की पत्तीयों में पाया जाने वाला टैनिन अल्सर को भरने में सहायक होता है।
बुखार होने पर बेल की पत्तीयों के काढ़े का सेवन लाभप्रद है। यदि मधुमक्खी, बर्र अथवा ततैया ने काट लिया है, तो भारी जलन होती है। ऐसी स्थिति में बेल-पत्र का रस काटे हुए स्थान पर लगाने से राहत मिलती है तथा जलन व सूजन भी कम पड़ जाती है। बेल की पत्तीयों का रस पीने से श्वास-रोग में काफी लाभ होता है। मुंह में गर्मी के कारण यदि छाले हो गए हैं, तो बेल की पत्तीयोंको मुंह में रखकर चबाएं।
नेत्रों में दर्द व जलन होने पर बेल की पुल्टिस बांधंे । इससे दर्द व जलन कम होगी व आंखों को शीतलता व राहत मिलेगी। बेल की पत्तीयों को पीसकर शरीर पर उबटन करने के बाद स्नान करने से शरीर में मनमोहक सुगंध आने लगती है।
बेल की पत्तीयों और अन्य औषधियों से निर्मित तेल कईं बार होने वाले जुकाम में लाभ पहुंचाता है। पीलिया के रोगी को बेल की पत्तीयों का ताजा रस काली मिर्च के साथ मिलाकर दिये जाने से रोगी को राहत मिलती है।
बवासीर आजकल एक आम बीमारी हो गई है। खूनी बवासीर तो बहुत ही तकलीफ देने वाला रोग है। बेल की जड़ का गूदा पीसकर बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर उसका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सुबह-शाम लें। लेकिन यदि पीड़ा अधिक है, तो दिन में तीन बार लें। इससे बवासीर में काफी लाभ आप महसूस करेंगे। यदि किसी कारण से बेल की जड़ें उपलब्ध न हो सके, तो कच्चे बेलफल का गूदा, सौंफ और सौंठ मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर सेवन करना भी लाभ पहुंचाएगा। यह प्रयोग कम-से-कम एक सप्ताह करें।
इस तरह सुस्पष्ट है कि बेल चमत्कारिक औषधि फल है। चरम संहिता में कहा गया है – ‘‘ रोगानि विलŸिा मिनतित्त बिल्वः‘ अर्थात रोगों को जड़ से खत्म करने की अदभुत क्षमता के कारण ही ‘बेल‘ को ‘बिल्व‘ कहा गया है। समुचित स्वास्थ्य लाभ हेतु बेल का नियमित सेवन कीजिए।