download 11 1

दुश्मनी



download 11

एक बार कुत्तो को शहर से बाहर जाने का काम पड़ा। उनका यह सफर कई महीनों का था। कुत्तो के कुनबे का सरदार बड़ा चिंतित हुआ। चिंता का कारण यह था कि उनके पास कुछ कीमती चीजें थीं, जिन्हें सफर में साथ लेकर चलना ठीक नहीं था। उसके सामने यह समस्या उठ खड़ी हुई कि उन चीजों को कहां और किसके पास रखा जाये, जिससे उनकी पूरी हिफाजत हो और साथ ही उनका रखवाला लोभी और दगाबाज न हो।
एक बूढ़े कुत्तो ने सरदार की परेशानी देखकर सलाह दी: ‘क्यों न आप अपनी कीमती चीजें अपनी हमदर्द बिल्लियों को सौंप दें। वे हमारी मित्र हैं और हम उन पर भरोसा कर सकते हैं।‘ सरदार को यह सुझाव पसंद आया। उसने बिल्लियों के बारे में अब तक सोचा ही न था, जो कुत्तो के साथ दिन-रात सगे-संबंधियों की तरह रहती थीं और हर सुख-दुख में साथ देती थीं।
सरदार ने बिल्लियों की सरदारिन को बुलवाया। सरदारिन फौरन हाजिर हुई। कुत्तो कुनबे के सरदार ने कहा, ‘‘मौसी, एक जरूरी काम के लिए मैने तुम्हे याद किया है। तुम्ही मेरी मदद कर सकती हो। बात यह है कि हमारा कुनबा एक लंबे सफर की तैयारी कर रहा है। मेरे पास कुछ कीमती चीजें हैं, जिन्हें मैं तुम्हारे हवाले कर देना चाहता हूं। मुझे विश्वास है कि तुम हमारे लौटने तक उनकी रखवाली करोगी और मेरी चिंता दूर करोगी।‘ बिल्लियों की सरदारिन ने खुश होकर कहा, ‘भला इसमें सोचने की क्या बात है। हम और आप अलग थोड़े ही हैं। आपकी अमानत मेरे पास बिल्कुल सुरक्षित होगी। हम अपनी जान से अधिक उसकी कीमत समझेंगे।‘
कुत्तो का कुनबे का सरदार बड़ा खुश हुआ। उसके उदास चेहरे पर चमक दिखायी पड़ने लगी। उसने एक-एक करके कई सामान बिल्लियों की सरदारिन को लाकर दिये। सरदारिन के साथ कुछ और बिल्लियां भी आयी थीं। सबने मिलकर सामानों को उठाया और चली गयीं।
कुत्तो का कुनबा दो-चार दिन बाद चला गया। बिल्लियां उन्हें काफी दूर तक पहुंचाने गयीं और भरी-भरी आंखों से विदा करके घर लौटीं।
दिन बीतते गये। बिल्लियों की सरदारिन ने एक सुरक्षित स्थान पर कुत्तो की धरोहर रखी थीं। उसने वहां पर पहरे का इंतजाम कर दिया था। कई महीनों के बाद भी जब कुत्तो का कुनबा नहीं लौटा तो बिल्लियों को नियम से पहरा देने में ऊब-सी होने लगी। सरदारिन भी अपनी जिम्मेदारी को बोझ समझने लगी। सब बिल्लियों ने अपनी सरदारिन को सुझाव दिया कि अब इस बोझ को अपने माथे से उतार कर किसी और के सिर पर रखा जाये।
बिल्लियों के साथ चूहों की खूब पटती थी। वे बिल्लियांे का बड़ा आदर करते थे और बिल्लिया भी उन्हें हर तरह से प्यार-दुलार देकर खुश रखती थीं। एक दिन बिल्लियों की सरदारिन ने चूहों के मुखिया को बुलाया और कहा, ‘भई, कुत्तो भाइयों ने तो हमारे गले अजब मुसीबत बांध दी है। उनके लौटने का कोई ठिकाना नहीं और हम कुत्तो के कुनबे के सरदार की धरोहर की रखवाली करते-करते थक चुकी हैं। अब कुछ दिनों तक तुम और तुम्हारे विशाल परिवार को मैं यह जिम्मेदारी सौंपना चाहती हूं। क्या तुम मेरी मदद करोगे?‘
चूहों का मूखिया अपनी मोटी काया को पिछले पंजो पर उठाते हुआ बोला,- ‘ इसमें पूछने की क्या बात है, आपका हाथ बंटाने के लिए तो हम चैबीस घंटे तैयार रहते हैं। आप चिंता न कीजिए, हम चूहे पूरी सावधानी से धरोहर की देखभाल करेंगे।‘ बिल्लियों की सरदारिन ने उसी समय सारा सामान चूहों के मुखिया को सौंप दिया। सामान काफी बड़े थे, इतने बड़े कि उन्हें बिलों में ले जाना संभव नहीं था। चूहों ने एक खास जगह पर उन चीजों को ले जाकर ठीक से रख दिया और पहरेदारों को चुनकर उन्हें पहरे का अलग-अलग समय दे दिया।
गर्मी का मौसम जैसे-तैसे बीत गया। जब सर्दी आयी और जाड़ा तेज हुआ तो पहरेदार चूहों को तकलीफ होने लगी।
कुछ तुनकमिजाज चूहों ने आपस में सलाह की, ‘इस तरह सर्दी में ऐंठ कर भला कौन अपनी जान देगा। क्यों न इन समानों में ही रहने के लिए घर बना लिया जाये।‘ सलाह सबको जंच गयी। फौरन सामानों को तेज दांतों से काटकर पहरेदारों ने अपने लिये आरामदायक जगह बना ली।
काटते-कुतरते समय चूहों को कुछ सामानों का अच्छा स्वाद भी मिला। कड़ाके की सर्दी में भोजन के लिए इधर-उधर जाना भी कम मुसीबत का काम नहीं था, इसलिए भोजन के लिए धरोहर की चीजों को कुतर-कुतर कर खाने की शुरूआत भी हो गयी। कुछ और चूहे भी धीरे-धीरे इस काम में जुटे। बिल्लियों के विश्वासपात्र चूहों के मुखिया को भी आखिर एक दिन लालच वहां खींच लाया। फिर क्या था, सारे सामानों को काट-कुतर कर कुछ ही दिनों में ठिकाने लगा दिया गया।
कुत्तो कुछ महीनों बाद सफर से लौटे। कुत्तो के कुनबे के सरदार ने जब बिल्लियों की सरदारिन के पास धरोहर की चीजों को साथ लेकर आने का संदेश भेजा तो वह चूहों के मुखिया के पास पहंुची। वहां का हाल देखकर तो उसके क्रोध का ठिकाना न रहा। वह दगाबाज चूहों को पकड़कर दबोचने के लिए झपटी। चूहे जान बचाकर अपने बिलों में घुस गये।
कुत्तो को जब यह खबर लगी तो वहां भी बिल्लियों की दगाबाजी पर सबका खून खौल उठा। वे बिल्लियों को उनकी करतूत की सजा देने के लिए आग-बबूला होकर दौड़े। बिल्लियों ने सिर पर पैर रखकर इधर-उधर भागना शुरू किया। पुरानी मित्रता खत्म हो गयी। कुत्तो के लिए बिल्लियां और बिल्लियों के लिए चूहे शत्रु बन गये। बैर की यह आग उनके दिलों में उस दिन जो जली तो फिर कभी बुझ न पायी।
कहते हैं, तब से आज तक कुत्तो ने बिल्लियों को और बिल्लियों ने चूहों को जहां भी पाया, मार कर अपना बदला चुकाया है।