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निबंध : डॉक्टर जाकिर हुसैन

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स्वतंत्र भारत के तीसरे राष्ट्रपति डाक्टर जाकिर हुसैन, अपने बहुआयामी सरल व्यक्तित्व के कारण लोगों के दिलों में हमेशा-हमेशा जीवित रहेंगे। जाकिर साहब मूलतः एक अत्यंत उच्चकोटि के शिक्षक थे। उन्होंने देश के शैक्षणिक पुनरूत्थान आंदोलन को न केवल मजबूत बनाया, बल्कि उसे सर्वथा नवीन दिशा भी प्रदान की। शिक्षा के क्षेत्र में जाकिर साहब ने गाॅंधी जी के आदर्श को मूर्त-रूप प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । महान राष्ट्रवादी, प्रकृति के अनन्य पुजारी, धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त के निर्भीक व्याख्याकार, आदर्श शिक्षक और सबसे बढ़कर एक बेहतरीन इंसान – ये सब जाकिर हुसैन के महान व्यक्तित्व के बहुरंगी रूप थे।

जन्म

भारत के इस महान सपूत का जन्म 8 फरवरी 1897 के दिन हैदराबाद के एक अफगान परिवार में हुआ था। उनके पिता फिदा हुसैन हैदराबाद के प्रख्यात वकीलों में से एक थे। साथ ही वह ’आईने दकन’ नामक उर्दू की एक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन भी करते थे। इस प्रकार जाकिर हुसैन को साहित्यिक संस्कार विरासत में प्राप्त हुए थे। दुःख बचपन ही से जाकिर हुसैन के संगी साथी रहे। अभी जाकिर हुसैन की आयु केवल नो बरस की ही थी कि उनके वालिद का इंतकाल हो गया। इसके बाद जाकिर साहब अपनी माॅं तथा भाइयों के साथ कायमगंज के समीप स्थित अपने गाॅंव में चले आए।

शिक्षा

यहीं अंग्रेज शिक्षक के निर्देशन में उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद 1907 में वह इटावा के हाइ-स्कूल में दाखिल हुए तथा दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की । इसी दौरान उनकी माता का भी देहावसान हो गया। उस समय ‘प्लेग’ के रूप में महामारी फैली हुई थी, जिसमें जाकिर साहब के भाई एवं अन्य अनेक रिश्तेदार काल-कलवित हो गए। अब जाकिर हुसैन बिल्कुल अकेले और बेसहारा थे। जिंदगी के इस मुश्किल संघर्ष में भी जाकिर साहब ने धेर्य और विश्वास का दामन नही छोड़ा। उन्होंने अपनी शिक्षा को निरंतर जारी रखते हुए अलीगढ़ विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया और उच्च श्रेणी में एफ. ए. की परीक्षा पास की। इस बीच स्वयं जाकिर साहब गंभीर रूप से बीमार हो गए और उनकी शिक्षा में व्यवधान उत्पन्न हो गया। छः बरसों तक गाॅंव में रहने के बाद जब जाकिर साहब पुनः स्वस्थ हुए तो विद्यानुरागी स्वभाव ने उन्हें आगे अघ्ययन के लिए प्रेरित किया।
जकिर हुसैन ने पुनः अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दाखिला लिया व प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा पास की। इसके बाद आप एम.ए. तथा कानून के अध्ययन में व्यस्त हो गए। जाकिर हुसैन एक अत्यंत प्रतिभाशाली छात्र के तौर पर अपने कालेज में लोकप्रिय थे।
अलीगढ़ में अध्ययन के दौरान ही एक रोज कालेज में जाकिर हुसैन ने महात्मा गांधी का भाषण सुना, जिसमें उन्होंने छात्रों से अंग्रेज सरकार के अधीन चलने वाले कालेजों के बहिष्कार का आव्हान किया। गांधी के भाषण और उनके सरल व्यक्तित्व ने युवा जाकिर हुसैन पर गहरा प्रभाव डाला। वह अपने कुछ साथियों सहित 19 अक्तूबर,1923 को कालेज का बहिष्कार कर गांधीजी के निर्देशन में राष्ट्र-सेवा के लिए निकल पड़े।
यह जाकिर हुसैन के जीवन का सर्वाधिक नाजुक और महत्वपूर्ण मोड़ था। इसी ने जाकिर हुसैन के भावी जीवन की दिशाएं तय कीं। मौलाना आजाद और गांधीजी के प्रयासों से 1920 में ’ जामिया मिलिया ’ नामक अभिनव शिक्षा संस्था की स्थापना हुई थी। इसका उद्धेश्य राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी मौलिक शिक्षा पद्धति विकसित करना था। गांधीजी के आदेश पर जाकिर हुसैन ने जामिया मिलिया का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और ’बुनियादी तालीम’ के काम में जुट गए। उन दिनों इस संस्था की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। जाकिर हुसैन ने तन-मन-धन से इस संस्था को ऊंचा उठाने के लिए काम किया। वह हर महीने अपनी तनख्वाह कम करते गए और आखिर 75 रूपये माहवार पर आकर रूके। वह जामिया मिलिया में अघ्यापन के अतिरिक्त स्वयं भी अध्ययन करते थे। दिन-रात वह संस्था की प्रगति के कार्य में जुटे रहते। एक बार उनके परिवार वालों ने उन्हें आराम करने के लिए कहा तो उन्होंने उŸार दिया – ’’ आराम मैं भला कैसे करूं? तनख्वाह तो मैं काम करने की लेता हूॅं। ’’ जामिया मिलिया के माध्यम से जाकिर साहब ने शिक्षा का एक नया स्वरूप हमारे सामने प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि राजनीति के संकीर्ण माघ्यम से देश का पुनरूत्थान नहीं हो सकता। इसके लिए शिक्षा और संस्कृति के प्रति नया नजरिया अपना कर और राष्ट्रीय चेतना को नया स्वरूप देना होगा।
विद्यानुरागी जाकिर हुसैन को जब अध्ययन हेतु विदेश जाने का अवसर मिला तो उन्होंने इसका पूरा लाभ उटाया। जाकिर हुसैन ने तीन वर्ष जर्मनी में रहकर अर्थशास्त्र में शोध-प्रबंध लिखा और बर्लिन विश्वविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि हासिल की। जर्मनी में रहकर भी आप निरंतर जामिया मिलिया से जुड़े रहे। पीएचडी करके लौटने के बाद उन्होंने नाममात्र के वेतन में इस संस्था के सचिव का पद संभाला। बाद में उन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय इस संस्था की सेवा में व्यतीत कर दिया। वहां जाकिर हुसैन ने अध्यापक से लेकर कुलपति तक के रूप में काम किया। जाकिर हुसैन बाइस वर्षों तक जामिया मिलिया के कुलपति रहे। उनके कुशल व संवेदनशील प्रशासन के कारण जामिया मिलिया राष्ट्रीय स्तर पर एक उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान के रूप में उभर कर सामने आया।


महात्मा गांधी के ’ बुनियादी शिक्षा ’ के विचार को क्रियान्वित करने के लिए जब राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया तो सन् 1937 में जाकिर हुसैन को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने बड़ी निष्ठापूर्वक यह कार्य किया। आजादी के बाद भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद के अनुरोध पर जाकिर हुसैन ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय के उपकुलपति का पद ग्रहण किया। वह इस पद पर आठ वर्ष तक रहे।
सन् 1957 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जाकिर हुसैन को बिहार का राज्यपाल बनने की पेशकश की। चूंकि जाकिर हुसैन सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करने के आदी थे, उन्होंने इस प्रस्ताव से विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया। किंतु नेहरू जी द्वारा बहुत दबाव डालने पर उन्होंने यह पद अनिच्छापूर्वक स्वीकार किया। सन् 1962 में जाकिर हुसैन को सर्वसम्मति से भारत का उपराष्ट्रपति चुना गया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान को देखते हुए सन् 1963 में उन्हें ’ भारत रत्न ’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। सन् 1967 में वह भारतीय गणराज्य के तीसरे राष्ट्रपति के तौर पर चुने गए और आयु-पर्यंत इस गरिमामय पद पर बने रहे।


जाकिर हुसैन बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों और विषयों में उनका नजरिया आईने की तरह साफ था। धर्म-निरपेक्षता के वह बहुत सशक्त प्रवक्ता और समर्थक थे। मानवता को वह सबसे बड़ा धर्म मानते थे। जाकिर हुसैन की साहित्यिक प्रतिभा का समूचा मूल्यांकन शायद नहीं हो पाया है। बाल-साहित्य में उनका अनुपम योगदान रहा है।


हांलाकि हिंदी जाकिर साहब की माृतभाषा नहीं थी, लेकिन उनका हिंदी-प्रेम सचमुच अनुकरणीय था। उन्होंने एक-एक शब्द अलग करके हिंदी सीखी थी। उनका कहना था कि हिंदी ही एक मात्र ऐसी भाषा है, जो पूरे हिंदुस्तान को एक सूत्र में बांध सकती है।

बागवानी जाकिर हुसैन का प्रिय शौक था। खासतौर पर गुलाबों की खेती में तो उन्हें महारत हासिल थी। वह सैंकड़ों किस्मों के गुलाबों की पहचान रखते थे। खुद मेहनत करके गुलाब खिलाते थे। खूबसूरत रंग-बिरंगे पत्थर और कलाकृतियां एकत्रित करना भी जाकिर साहब को बहुत भाता था।
जाकिर हुसैन का व्यक्तित्व सादगी, विनम्रता, विद्वता, आदर्शवाद तथा संकल्प-शक्ति का अनूठा सम्मिश्रण था। उनके बारे में राजगोपालाचारी का यह कथन बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है ’’ मेरी नजर में जाकिर हुसैन से बढ़ कर कोई भी ऐसा योग्य नागरिक नहीं है, जिसने गरीबी के गुलाब की तरह विकसित होकर देश की सर्वोच्च सŸाा अर्जित की हो, जिसे इतने बड़े मुल्क का राष्ट्रपति होने का कोई मोह न रहा हो और जो ’ अपनेपन ’ की भावना कभी न भूला हो।’’