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धूल: दिलचस्प जानकारी

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इस संसार में जहां-जहां धरती है, वहां-वहां तक धूल है। धूल हमारे पांवों के नीचे रहती है पर कभी-कभी उड़कर हमारे सिर पर भी चढ़ जाती है। धूल का मानव जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसलिए कहा जाता है, धूल में पैदा हुए, हम धूल में मिल जाएगें
धूल से हम बच नहीं सकते। हम कितनी भी धूल झाड़ते रहें, रगड़-रगड़ कर सफाई करते रहें, धूल हमारे कपड़ों पर, बिस्तर पर, फर्नीचर पर, दीवारों पर, फर्श पर, छत पर, आंगन में और न जाने कहां-कहां पड़ती रहती है। आप अपनी डाईनिंग टेबल को झाड़ पौंछ कर साफ करें, चमका दें, सर्वथा धूल रहित कर दें, पर आधे घंटे बाद ही आप देखेंगे कि डाईनिंग टेबल धूल की एक महीन परत से आच्छादित हो गया है। आह! धूल खिड़की के रास्ते आ गयी होगी। नहीं साहब, खिड़की पूरी तरह बंद कर लें तो भी धूल को मेज पर बैठने से कोई नहीं रोक सकता। धूल के अत्यन्त सूक्ष्म कण हवा में विद्यमान होते हैं, जो लाखों और करोड़ों की संख्या में मेजों पर, कुर्सियों पर, पलंग पर, फर्श पर गिरते ही रहते हैं। आप दिन में सौ बार सफाई कर लें, कुछ न कुछ धूल-कण हर बार मिलेंगे। अब बताइये, आप धूल के सर्व-व्यापी साम्राज्य से बचकर कहां जा सकते हैं?
विश्व के कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां धूल का भीषण रूप देखने में आता है। ऐसे क्षेत्रों में कई-कई घंटे बल्कि कई-कई दिन तक धूल भरे तूफान चलते हैं और लगभग कुछ भी नहीं दिखाई देता। कई बार यहां इतनी धूल उड़ आती है कि उपजाऊ भूमि भी बंजर बन कर रह जाती है।
बड़े-बडे़ मरूस्थलों मंे, सहारा में, अरब में, कालाहारी में, आस्ट्रेलिया में और स्वयं राजस्थान में ऐसे ऐसे भयानक अन्धड़ आते हैं कि रेत के टीले के टीले एक स्थान से उड़कर दूसरे स्थान पर चले जाते हैं और मरूस्थल के सीमावर्ती स्थान भी धीरे-धीरे मरूस्थल में परिवर्तित होते रहते हैं।
मरूस्थल में उड़ने वाले धूल-कण अथवा बालू कण आस पास ही नहीं, सैंकड़ो हजारों मील दूर तक पहंुच जाते हैं। सहारा में उड़ने वाली रेतीली धूल के कण यूरोप के उŸारी भाग अर्थात नार्वे और स्वीडन तक में देखे गये हैं।
धूल कई प्रकार से पैदा होती है। जहां तक जमीन की मिट्टी सूखी होती है, वहां तेज हवा या आंधी चलने से बड़ी महीन धूल पैदा होती रहती है। इसमें 99 प्रतिशत धूल वहीं रह जाती है और केवल एक प्रतिशत धूल आकाश में उड़ कर अन्यत्र पहुंच जाती है। धूल भरे तूफानों का अध्ययन करने से हमें धूल के बारे में बहुत मूल्यवान जानकारी प्राप्त हो सकती है। आजकल उपग्रहों के माध्यम से भी अन्धड़ों का अध्ययन किया जा रहा है।
मरूस्थलों आदि में उड़ने वाली रेत से सीमावर्ती क्षेत्रों में ही नहीं, दूर-दराज के क्षेत्रों में भी जलवायु में परिवर्तन हो जाते हैं। अफ्रीका के सहारा मरूस्थल से उड़ने वाली रेत से इस्राइल और मिस्त्र की नील घाटी में इसी प्रकार के परिवर्तन हुए हैं। वेस्ट इंडीज के बारबाडास द्वीप में 1965 और 1976 के बीच धूल की मात्रा में तिगुनी वृद्धि हुई है। बरमूडा, बहमास और वेस्ट इंडीज तक सहारा की रेतीली धूल एटलांटिक महासागर को पार करके पहुंच जाती है। जब मरूस्थल इतनी दूर तक अपनी रेतीली मार कर सकते हैं तो यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि चारों ओर के सामावर्ती क्षेत्र में कितनी भारी मात्रा में धूल-वर्षा होती होगी।
धूल का हमारे जीवन में बहुत ही महत्व है। कहा जाता है कि बच्चे धूल में पल कर बढ़े होते हैं। हम लोग अपने प्रतिद्वन्दी को धूल चटा देने की बात करते हैं और शत्रुता भीषण रूप धारण कर जाए तो उसे धूल में मिला देने के लिए प्रयत्नशील हो जाते हैं। ‘‘मैं तुम्हें धूल में मिला दूंगा‘‘ – ऐसे वाक्य आपने कई बार सुने होंगे। विडम्बना यह है कि धूल हमें , हम सबको धूल में मिलाती रहती है ओर अन्ततः हम सबको धूल में ही मिलना है- चाहे मिट्टी के नीचे गाड़ा जाकर चाहे चिता में जलाया जा कर। अंततः हम सब धूलमय हो जाते हैं। हम सब मरणशील हैं। केवल धूल अमर है।
प्राचीन काल में गाय सायंकाल को धूल उड़ाती हुई वापस लौटती थी, अतः सांयकाल का नामकरण ही ‘गो-धूलि‘ बेला हो गया। धूल निकृष्ट या त्याज्य ही नहीं, पूज्य और पावन भी होती है। हम सब अपने से बड़े, पूज्य और सम्मान-योग्य व्यक्तियों की चरण-रज लेने में अपने आपको गौरवान्वित मानते हैं, उसे अपने माथे से लगाते हैं। कई लोगों के चरण हमारे घर में पड़ने से ( अब चरण में तो धूल तो होती ही है ) हमारे घर पवित्र हो जाते हैं। देशभक्तों के लिए, शहीदों के लिए अपनी जन्म भूमि के कण-कण में, जर्रे-जर्रे में देवता होता है। विदेशों में जलावतन होकर मातृभूमि से दूर रहने वाले क्रान्तिकारियों की अन्तिम इच्छा यही होती थी कि उन्हें मरने से पहले अपनी मातृभूमि की मिट्टी नसीब हो जाए।
जब किसी मामले को दबाना हो, उस पर चर्चा न करनी हो तो कहा जाता है। ‘‘इस पर धूल डाल दो।‘‘ तो आइये बन्धुवर, अब इस पर धूल डाल दें। पर इससे क्या होगा? धूल में ही तो फूल पैदा होते हैं और माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा वर्णित फूलों की अभिलाषा एक विशिष्ट प्रकार की धूल , एक खास तरह की खाक में मिल जाने की होती है। ऐसी धूल में, जो शहीदों के चरण पड़ने से पवित्र हो गयी हो।