iron

खतरनाक है – शरीर में अधिक आयरन!

(dangerous more iron in the body)

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लौह तत्व शरीर के लिए बहुत जरूरी है। ये तत्व हीमोग्लोबिन रूप में खून में रह कर सांस द्वारा फेफड़ो में आई आक्सीजन को शरीर के अंगों में पहुंचाते हैं।
शरीर में लौह तत्वों की कमी से होने वाला रोग एनीमिया (अल्प रक्तता) है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विकासशील देशों में लगभग 25 करोड़ से अधिक महिलाएं और लगभग इतने ही बच्चे एनीमिया के शिकार हैं। पर शरीर में जरूरत से ज्यादा लौह तत्व भी नुक्सानदेह हैं और ज्यादा होने की दशा में भी बीमारी हो सकती है।
कुछ साल पहले तक ‘हीमोक्रोमेटोसिस‘ (रक्त वर्णकता) नाम की यह बीमारी दुर्लभ समझी जाती थी। लेकिन ज्यों-ज्यों इसके बारे में जानकारी मिलती गई, इससे पीड़ित लोगों के बारे में ज्यादा पता चलता गया। आज यह रोग ‘सामान्य‘ श्रेणी में आ गया है। आस्ट्रेलिया, फ्रांस, स्वेडन, ब्रिटेन और अमेरिका से मिली रिपोर्ट के अनुसार हजार में दो से तीन लोग इसका शिकार होते हैं। भारत में यह संख्या अभी साफ नहीं है।
अब तक के अनुसंधानों और अध्ययनों से चिकित्सा वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह रोग आनुवांशिक है यानी यह संतान को अपने माता-पिता से होता है। जिन्हें ‘हीमोक्रोमेटोसिस‘ के जीन माता और पिता दोनों से मिलते हैं, उनमें यह रोग होता है। हमारी कोशिकाओं के नाभिक में डीएनए अणुओं के जीन ही माता-पिता के गुणों को संतान में ले जाते हैं। पर जरूरत से ज्यादा लौह तत्व भी नुकसान पहुंचाते हैं। लौह तत्व धीरे-धीरे शरीर में इकठ्ठा होते रहते हैं और बीमारी का पता चलने में लगभग 20 से 40 साल तक लग जाते हैं।
एक स्वस्थ शरीर में आमतौर पर 4 ग्राम लौह तत्व होते हैं। इसके अलावा शरीर को हर रोज लगभग 2.2 मिलीग्राम लौह तत्वों की जरूरत होती है और साधारणतः आंतें भोजन में उपस्थित लौह तत्वों में से केवल 10 फीसदी ही ग्रहण करती हैं। लेकिन जब यह संतुलन बिगड़ जाता है, तब आंतें ज्यादा लौह तत्व पचाने लगती हैं। यह बढ़ी हुई मात्रा खर्च नहीं होती और शरीर के अंगों में जमा होने लगती है।
इन अंगों में अग्नाश्य, यकृत, हृदय, हाथ-पैरों के जोड़ आदि खास हैं। उग्नाशय और यकृत में लौह तत्वों की मात्रा 50-100 गुना, थायराॅयड ग्रंथि में 25 गुना, हृदय और अधिवृक्क ग्रंथियों में 10-15 गुना बढ़ जाती है। लौह तत्वों की बढ़ी मात्रा से शुरू में शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और कुछ पता नहीं चल पाता लेकिन जब यह मात्रा 20-40 ग्राम तक पहंुच जाती है, तब बीमारी के लक्षण पता चलते हैं।
जिन अंगों में लौह तत्व मात्रा से ज्यादा जमा हो जाते हैं, वे अंग काफी नुकसान उठाते हैं। सबसे पहले मधुमेह होता है। फिर त्वचा का रंग बदलता है। गोरे रंग की त्वचा का रंग बदलकर भूरा हो जाता है। यकृत को नुकसान होने से यकृत सिरोसिस हो जाता है जो बाद में कैंसर को जन्म देता है। हीमाक्रोमेटोसिस से होने वाली मौतों का कारण यकृत का कैंसर ही है। हृदय में लौह तत्वों की बढ़ी मात्रा मांसपेशियों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे हृदय्र गति बंद हो सकती है। हाथ-पैरों के जोड़ों में लौह तत्व जमा हो जाने से गठिया हो जाती है और वृषणों (टेस्टिस) में इकठ्ठे लौह तत्वों से नंपुसकता और पुरूष बांझपन हो सकता है।
चिकित्सा वैज्ञानिक को ज्यादा शराब पीने वालों के खून की जांच में ज्यादा तादाद में लौह तत्वों के होने का पता चला है। यह लौह तत्व शराब तैयार करने के बर्तनों से आते हैं। शराबियों को होने वाली यकृत सिरोसिस में लौह तत्वों का काफी हाथ है।
हीमाक्रोमेटोसिस के 80 प्रतिशत रोगी मधुमेह के शिकार होते हैं, लेकिन दिल की धड़कन बंद होने की घटनाएं केवल 15 प्रतिशत रोगियों में देखी गई हैं। यह भी देखा गया है कि यह रोग आमतौर पर पुरूषों को ही होता है। महिलाओं को यह रोग मासिक चक्र बंद होने के बाद ही हो सकता है।
इस का संदेह होते ही खून की जांच बहुत जरूरी हो जाती है। मधुमेह, हृदय और यकृत रोगों से पीड़ित ऐसे लोगों को, जिनमें उन बीमारियों का कोई साफ कारण न हो, हीमोक्रोमेटोसिस के लिए रक्त की जांच जरूर करा लेनी चाहिए। इस बीमारी का इलाज वक्त पर होना जरूरी है। इस के लिए चिकित्सक रोगी को काफी दिनों तक ऐसे पदार्थो का इंजेक्शन देते हैं, जो शरीर में जमा अतिरिक्त लौह भंडार में कमी लाते हैं। फिर कम से कम एक या दो साल तक हर सप्ताह या दो सप्ताह में एक बार शरीर से खून निकलवाने की सलाह दी जाती है। फिर शल्य क्रिया से शरीर की शिराओं में जमा लौह तत्व निकालने की सलाह दी जाती है। लेकिन यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि इलाज से फायदा तभी तक होता है, जब तक ज्यादा लौह तत्वों से शरीर के उŸाकों को नुकसान न पहुंचा हो। यह देखा गया है कि बीमारी का पता चलने के पांच साल बाद शल्य क्रिया द्वारा जमा हुए लौह तत्वों को हटाने से 66 प्रतिशत सफलता मिलती है। लेकिन यदि शल्य क्रिया 10 साल बाद की जाए तो सफलता की संभावना केवल 32 प्रतिशत रह जाती है।
हीमोक्रोमेट्रोसिस के रोगियों को बगैर लौह तत्व वाले भोजन की सलाह नहीं दी जाती क्योंकि भोजन में बहुत थोड़ी मात्रा में ही लौह तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर की रोजमर्रा की जरूरतों के लिए होते हैं। हां, जिन व्यक्तियों में लौह तत्व की कमी नहीं है, उन्हें लौह तत्व गोलिया या लोह संपूरित विटामिन कभी नहीं खाने चाहिए। इससे लौह शक्ति बढ़ने के बजाए हीमाक्रोमेटोसिस जैसे रोग हो सकते हैं!