Curd in a traditional Manipuri earthen pot

दही में गुण बहुत है…

Curd in a traditional Manipuri earthen pot

दही एक पौष्टिक आहार है। इसकी तासीर शीतल होती है। आयुर्वेद के अनुसार दही रूचिकर, भूख बढ़ाने वाला, स्निग्धता प्रदान करने वाला, पाचन में सहायक, वातनाशक, विषनाशक, यकृत की शक्ति बढ़ाने वाला, बवासीर और पेट के रोगों के लिए फायदेमंद, हृदय और मस्तिष्क को शक्ति देने वाला तथा आंतो की सफाई में सहायक होता है।
दही में दूध के सभी गुण मौजूद रहते हैं। दूध में पाये जाने वाले जीवाणु गर्मी पाकर बढ़ने लगते हैं। वे दूध में उपस्थित शर्करा को लेक्टोज अम्ल में तब्दील कर देते हैं। इससे दूध का प्राकृतिक मीठा स्वाद तो खट्टे तीखे स्वाद में परिवर्तित हो जाता है किंतु दूध में मौजूद अन्य गुण जैसे चिकनाहट, विटामिन ए और के, प्रोटीन, कैल्शियम, चूना, फास्फोरस आदि विद्यमान रहते हैं। दही रूचिकर, पाचक और शीतल होता है। एक शक्तिदायक खाद्य पदार्थ होने बावजूद यह मोटापा नहीं बढ़ाता। दही के निम्न रासायनिक विश्लेषण से भी स्पष्ट होता है कि यह गुणों का भंडार है:-
वैज्ञानिकों के मतानुसार दही के रासायनिक संगठन में 89.1 प्रतिशत पानी, 10.9 प्रतिशत ठोस भाग होता है। ठोस हिस्से में चर्बी 4 प्रतिशत, लेक्टोज 2.9 प्रतिशत तथा कैल्शियम फास्फोरस, आयरन, विटामिन ए, बी और सी के भी पर्याप्त अंश पाए जाते हैं।
गर्मियों में दही की लस्सी अथवा छाछ एक बलवर्द्धक और तृप्तिदायक शीतल पेय है। छाछ में दूध की अपेक्षा वसा कम अवश्य होती है किंतु छाछ में दही की अपेक्षा अधिक गुण पाए जाते हैं। दही और छाछ के विभिन्न रोग-निवारक गुणों के कारण ही आयुर्वेद और यूनानी उपचार पद्धति में इससे मंदाग्नि, आंतो की कमजोरी, पेचिश तथा दस्तों का उपचार किया जाता है।
दही वीर्यवर्द्धक होता है और इससे शुक्राणु पुष्ट होते हैं। यह हृदय व मस्तिष्क को शक्ति प्रदŸा करता है और यकृत को भी मजबूत बनाने में सहायक होता है।
हमारा शरीर दही का 91 प्रतिशत भाग एक घंटे में सहजता से पचा लेता है। इस तरह यह अत्यंत पाचक है। दही शरीर की फालतू चर्बी को कम करने में भी मददगार साबित होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि दही के प्रयोग से कैंसर को प्रारंभिक अवस्था में ही रोका जा सकता है।
दही के नियमित सेवन से व्यक्ति दीर्घायु होता है। रूस के जार्जिया प्रदेश की 50 लाख की आबादी में 80 हजार से अधिक लोग सौ वर्ष की उम्र में भी स्वस्थ व प्रसन्नचिŸा हैं। बुल्गारिया में भी सैंकड़ो लोग इस अवस्था में पूर्णतया स्वस्थ हैं। इसके पीछे कारण यह है कि वह दही का भरपूर उपयोग करते हैं। दोनों समय भोजन में दही अनिवार्य रूप से होता है।
दही दिल के लिए भी मुफीद है। अमेरिका के प्रो0 जार्ज बी0 मान ने अनेक शोधों के बाद निष्कर्ष निकाला है कि दही में एक ऐसा तत्व मौजूद होता है, जो रक्त में कोलेस्ट्राॅल को कम करके दिल के दौरे को रोकता है। कोलेस्ट्रोल एक चर्बीयुक्त पदार्थ है, जो शिराओं को अवरूद्ध कर देता है, नतीजतन हृदय-रोग हो जाता है। खाने के बाद दही कोलेस्ट्रोल की संरचना में गिरावट लाता है। हृदय-रोगियों को प्रो0 जार्ज की एक ही राय है कि उन्हें दही बहुत अधिक खाना चाहिए।
पाचन-क्रिया को सुचारू बनाने में भी दही की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, आंतों के निचले हिस्से में फ्लोरा नामक बेक्टीरिया होते हैं। इन बक्टीरियाओं का भोजन पचाने में बहुत बड़ा योगदान होता है। बदपरहेजी अथवा एलोपैथी की दवाइयों का अधिक सेवन करने से इन फ्लोरा बेक्टीरिया की सक्रियता में कमी आ जाती है। इससे भोजन का पाचन सक्रिय रूप से नहीं हो पाता। दही में यह गुण होता है कि वह इस बेक्टिरिया को पुनः सक्रिय बना देता है, जिससे पाचन सही तरह से चलने लगता है।
दही को बहुत प्राचीन काल से भारत में बाल धोने के लिए भी उपयोग में लिया जाता रहा है। इससे केश धोने से केश मुलायम, घने, काले व लम्बे होते है। बालों की जड़ों तक दही रगड़ कर नहाना चाहिए।
दही की ठंडी मलाई पलकों पर लेप करने से गर्मी व जलन कम होने लगेगी। कब्जियत से छुटकारा पाने के लिए दही की छाछ रोजाना नियमित रूप से चुटकी-भर अजवाइन डालकर पिएं।
वजन कम होने की शिकायत होने पर दही में छुआरा, खोपरा, किशमिश, बादाम, पिस्ता, चिरोंजी आदि मिलाकर नियमित सेवन करें। शीघ्र ही वजन में वृद्धि होगी।
दही की इतनी उपयोगिता को देखते हुए आज ही दही का नियमित सेवन प्रारंभ कर दें।