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दाम्पत्य सम्बन्ध उम्र के ढलान पर |Couple relationship age slope

बिखरता दाम्पत्य सबंध

हमारे पड़ोसी सक्सेना जी की आयु चालीस के लगभग है, उनकी श्रीमती जी पैंतीस के आसपास है । घर में तेरह- चौदह साल का एक बेटा और दस साल की एक लड़की है। सक्सेना दंपति का दांपत्य जीवन उम्र के इस मोड़ पर आकर बिखर गया -सा लगता है। पति पत्नी में दिन रात चिव चिक चलती रहती है।

दफ्तर से थके हारे सक्सेना जी घर में दाखिल भी नहीं हो पाते हैं और श्रीमती जी शुरू हो जाती हैं। बाद में अक्सर महाभारत छिड़ जाती है। आज सेआठ-दस वर्ष पहले यह स्थिति नहीं थी ।दोनों बड़े प्रेम से रहते थे और एक सुखी दांपत्य जीवन का आनंद ले रहे थे। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ-साथ ही परस्पर आकर्षण कम होता चला गया।

दरअसल यह स्थिति सिर्फ सक्सेना दंपति की ही नहीं है, बल्कि हजारों ऐसे पुरुष और महिलाएं हैं, जो उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते यह समझ लेते हैं कि उनके वैवाहिक जीवन का यही हश्र होना था। बस …यहीं आकर दांपत्य रिश्ते दर क जाते हैं ।

महिलाएं एक दो बच्चे पैदा होने के बाद 30 -32 वर्ष की आयु में पहुंचते-पहुंचते खुद के और अपने पति के विषय में सोचने के बदले अपनी गृहस्थी और बच्चों के लिए चिंताएं करने लगती हैं ।मूलत: पश्चिमी देशों में महिलाओं का वास्तविक दांपत्य जीवन 30 वर्ष की आयु के बाद शुरू होता है; जबकि भारत में यह उम्र वैवाहिक सुखों की विदाई की बेला बनकर आती है।

मादकता का उतरता बुखार

शादी के बाद का यह एक छोटा -सा और अरसा अटूट प्रेम, मादकता और अंतरंगता से भरा हुआ होता है । महकी हुई मादकता का नशा धीरे-धीरे करके न जाने कब टूट जाता है। सपनों और उमंगों की परवाज से लौटने पर जब पांव जीवन की ठोस और कठोर जमीन पर पड़ते हैं तो आदमी खुद को हर तरफ से समस्याओं और संघर्षों से घिरा हुआ पाता है।

जिंदगी की नंगी सच्चाइयां सामने आने लगती हैं। घर का खर्च , बच्चों की पढ़ाई- लिखाई ,कपड़े लत्ते , सगे -संबंधी शादी -ब्याह, सामाजिक संबंध आदि सैकड़ों विषयों में आदमी इस कदर उलझ कर रह जाता है कि उसका दांपत्य जीवन एकदम उपेक्षित हो जाता है ।बढ़ती जिम्मेदारियां और आर्थिक संकट उसे कभी चैन से नहीं रहने देते। पति पत्नी दोनों एक दूसरे के लिए न तो समय निकाल पाते हैं , न ही एक दूसरे के प्रति अपने दायित्वों का भली-भांति निर्वाह कर पाते हैं।

तनाव के कारण

वास्तविकता यह है कि युवावस्था के बजाय पति-पत्नी को एक-दूसरे की आवश्यकता बढ़ती हुई उम्र में अधिक होती है। हमारी सामाजिक व्यवस्था में पुरुषों की जिम्मेदारी 40 वर्ष की आयु के बाद काफी बढ़ जाती है ।बच्चों की उच्च शिक्षा का खर्च ,आवासीय मकान का निर्माण, जवान होते बच्चों की शादियां आदि कई ऐसे उत्तरदायित्व हैं ,

जिन्हें पूरा करने के लिए आदमी को अतिरिक्त श्रम करना होता है और वह अनेकानेक समस्याओं को लेकर चिंतित तथा तनाव -ग्रस्त रहता है। ऐसी सूरत में वह पत्नी से सहयोग पूर्ण रूख अपेक्षा करता है।

पत्नी का सहयोग पूर्ण व्यवहार जरुरी

ऐसे नाजुक दौर में अगर पत्नी का व्यवहार उदासीनता या उपेक्षा का रहा तो पति को बहुत खीझ होती है और निरंतर ऐसे व्यवहार से दांपत्य संबंध कुंठित हो जाने का खतरा काफी रहता है।

ढलती उम्र में आपसी अंतरंगता और अधिक बढ़नी चाहिए। संबंधों में सरसता बनी रहनी चाहिए। पति तथा पत्नी दोनों के वास्ते यह जरूरी है कि वे एक दूसरे की भावनाओं का समुचित सम्मान करें ।इस उम्र में कभी-कभी व्यक्ति खुद को बहुत अकेला महसूस करने लगता है। वह चाहता है कि कोई उसके साथ बैठकर उसके दिल की बात सुने ।किसी की हमदर्दी और स्नेह की जरूरत वह बड़ी शिद्दत के साथ महसूस करता है । इसके लिए भला पत्नी से अधिक उपयुक्त और कौन हो सकता है? पति पत्नी एक दूसरे में रुचि बनाए रखें तो जिंदगी के झंझावातों में भी दांपत्य- जीवन की सरसता और माधुर्य कायम रह सकता है।

दाम्पत्य जीवन में यौन

सेक्स सिर्फ जवानी के आनंद की चीज नहीं है। यह जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह एक प्रकार की शारीरिक भूख है जिसका सप्त किया जाना अनिवार्य है इस मामले में अक्सर महिलाएं एक आयु के बाद उदासीन हो जाती हैं। अपने रहन- सहन, बनाव-श्रृंगार, पहरावे आदि के प्रति वह लगभग उदासीन -सी हो जाती है। पत्नी की अपने प्रति यह लापरवाही पुरुष को कसौटी है। प्रौढ़ावस्था में आकर सौंदर्य- बोध खत्म नहीं हो जाता बल्कि यह और अधिक परिपक्व हो जाता है। सेक्स के प्रति अनिच्छा से
के भाव पुरुष को दूसरे वर्जित दिशाओं की ओर मुड़ने को विवश करते हैं।

कुछ मनोवैज्ञानिकों का तो यहां तक कहना है कि व्यक्ति का वास्तविक यौन -जीवन प्रौढ़ावस्था से ही शुरू होता है, जब तक पति -पत्नी एक दूसरे को अधिक गहराई से समझ चुके होते हैं । अतः यौन संबंधों के प्रति लापरवाह हो जाना न केवल अनुचित है बल्कि काफी हद तक घातक भी है ।

इस आयु में महिलाओं को अपने शारीरिक सौंदर्य को बनाए रखने के वास्ते विशेष ध्यान देना चाहिए ।दैनिक दिनचर्या और भोजन को संतुलित रखना चाहिए। नियमित रूप से व्यायाम करने से भी दैहिक आकर्षण लंबे समय तक बना रहता है ।अपने व्यक्तित्व के अनुरूप वेशभूषा भी आप के आकर्षण में अभिवृद्धि ही करेगी। इसके साथ ही ,महिलाओं को मानसिक रूप से भी अपने पति के साथ आत्मीय रिश्ते बनाए रखने चाहिए।

याद रखिए, पति के कारण ही हर स्त्री को समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है। पति का मौजूद होना पति के पत्नी के वास्ते एक समूचा सुरक्षा पर्यावरण है , इसके बदले पति पत्नी से अंतरंगता और प्यार चाहता है तो इसमें अनुचित कुछ भी नहीं है।

पति पत्नी का रिश्ता शाश्वत

पति पत्नी का रिश्ता एक शाश्वत संबंध है। जब स्त्री सारे संबंधों को जीवन पर्यंत निभा सकती है तो जीवन के इस नाजुक मोड़ पर आकर पति की उपेक्षा क्यों? सुखी दांपत्य जीवन के लिए अनिवार्य शर्त यह है कि शुरुआत से लेकर उम्र के आखिरी पड़ाव तक पति पत्नी एक दूसरे के पूरक बने रहें और एक दूसरे के सुख दुख में साझेदार बनें।