pexels van dos santos 4142511 scaled

काॅमिक्स की रंगीन दुनिया में खोए बच्चे!


बचपन उम्र का वह निहायत खूबसूरत हिस्सा है, जिसे हर कोई बार-बार और हमेशा-हमेशा पाना चाहेगा। तितलियों के पीछे भागने की मासूम दीवानगी हो या गुब्बारे में बैठकर आसमान में सैर करने का दिलचस्प खयाल, बच्चों का मनोविज्ञान हमेशा ही बड़ा जटिल होता है। उनके वास्ते सारी चीजों की परिभाषाएं ही बिल्कुल अलग होती हैं, सारे तर्क और तमाम वर्जनाओं से बिल्कुल परे……राक्षस और देवताओं का संघर्ष, जंगल में शेर, हाथी, खरगोश आदि जानवरों के संवाद, उड़नपरी की जादुई अंगूठी सरीखे किस्से उनके बालपन पर बहुत ही रंगीन और मायावी दुनिया का इन्द्रजाल-सा रच देते हैं।
काॅमिक्स अथवा चित्रकथाएं बच्चों के सांस्कृतिक विकास और उनकी कल्पनाशीलता को परिपक्व करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संभवतः दुनिया का कोई ऐसा हिस्सा नहीं है, जहां काॅमिक्स न पहुंची हों। आज काॅमिक्स ने बाल-साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण व लोकप्रिय विधा के रूप में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया है। यह कहना शायद ज्यादा ठीक होगा कि काॅमिक्स ही बाल-साहित्य का पर्याय बनते जा रहे हैं। आज सारे बाजार विभिन्न किस्मों के रंग-बिरंगे काॅमिक्सों या चित्रकथाओं से अटे पड़े हैं। काॅमिक्स-स्ट्रिप हर अखबार, पत्रिका का अनिवार्य अंग बन चुकी हंै। बच्चों के लिए काॅमिक्स मिठाई, आईसक्रीम और खिलौनों की तरह एक मनपंसद चीज बन चुकी हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रूजवेल्ट से ‘न्यूयार्क टाईम्स‘ के संवाददाता ने प्रश्न किया- ‘आप फुरसत के समय क्या पढ़ते हैं?‘ रूजवेल्ट ने तत्काल एक शब्द में कह दिया ‘काॅमिक्स!‘
काॅमिक्स आज दुनिया का एक महत्वपूर्ण उद्योग बन चुके हैं। अरबों डालर की पूंजी इसमें लगी हुई है। बच्चों के अलावा, काॅमिक्स के शौकीन आपको हर आयु-वर्ग में आसानी से मिल जाएंगे।
आखिर काॅमिक्सों की इस आकाश छूती लोकप्रियता के कारण क्या है। इस सम्बन्ध में प्रख्यात रंगकर्मी सत्यदेव दुबे का कहना है- ‘ बचपन से ही हमारे दिमाग में संस्कारो, उपदेशों और किस्से-कहानियों द्वारा एक बात स्थायी रूप से स्थापित की जाती है कि सत्य की जीत अनिवार्य है। मगर जब यथार्थ की जिंदगी में हर कदम पर हम सत्य को अपमानित होते देखते हैं, तब हर व्यक्ति एक ‘मास्टर सोल्यूशन‘ चाहता है और ‘सुपर नेचुरल पावर‘ से भी वह जुड़ा होता है। ऐसे समय में काॅमिक्स के पात्रों से, खासकर नायक से, अपने आपको जोड़कर हम काॅमिक्स पढ़ते हैं और एक खयाली दुनिया में ‘विजय‘ जैसी कोई चीज हम महसूस करते हैं और इसी विजय-भाव का अहसास हमें काॅमिक्स पढ़ने को प्रेरित करता है।‘
यह एक सिद्ध तथ्य है कि शब्दों की अपेक्षा चित्र बच्चों को कहीं अधिक आकृष्ट करते हैं। काॅमिक्स पढ़ते बच्चे फ्रेम-दर-फे्रम घटनाओं को अपनी आंखों के सामने घटता महसूस करते हैं। सटीक रेखांकन, समुचित रंग-संयोजन और नये-खुले संवाद काॅमिक्स के प्रभाव व आकर्षण को नपे-तुले और अधिक बढ़ा देते हैं। बच्चों का कल्पनाशील मन काॅमिक्स पढ़कर निश्चय ही कुछ सोचने पर विवश होता है। उनमें जिज्ञासा और कौतूहल की भावना पैदा होती है, जो उनके मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
इस तेज रफ्तार जिंदगी में हर व्यक्ति हर काम ‘शार्ट-कट‘ से करना पंसद करता है। किसी के पास इतना समय नहीं कि मोटी-मोटी साहित्यिक पुस्तके पढ़े या उपन्यासों में डूबा रहे। ऐसे में, लोगों को ऐसा विकल्प उपलब्ध कराते हैं कि वह चंद मिनटों में काॅमिक्स पढ़कर हल्का-फुल्का मनोरंजन कर सकता है। न अधिक समय खर्च करने की जरूरत और न ही दिमाग पर जोर डालने की जहमत। काॅमिक्स के इस गुण ने उसकी लोकप्रियता बढ़ाने में बहुत मदद की।
काॅमिक्स भारत के लिए मूलतः पश्चिम से आयातित विधा है। यूरोप और अमेरिका को काॅमिक्स का उद्गम-स्थल माना जाता है और आज भी विश्व में सर्वाधिक काॅमिक्स अमेरिका में प्रकाशित होते हैं। प्रारंभ में भारत में अमेरिकी और यूरोपीय काॅमिक्सों के अनुवाद प्रचलित हुए। जब यह काॅमिक्स यहां आशातीत लोकप्रियता हासिल करने लगे, तब क्रमशः भारत में काॅमिक्स की परंपरा विकसित हुई। बच्चों के हल्के-फुल्के मनोरंजन के उद्वेश्य को लेकर शुरू ही से काॅमिक्स की यह परंपरा न जाने कब अनगिनत विसंगतियों ओर विकृतियों का शिकार हो गई।
काॅमिक्सों का प्रकाशन प्रकाशकों के लिए बहुत फायदे का सौदा बन चुका है। काॅमिक्सों की बढ़ती हुई लोकप्रियता ने इस कार्य का पूर्णतः व्यावसायीकरण कर दिया है। आज प्रकाशक और लेखक मात्र अपने मुनाफे के लिए काॅमिक्सों को पतन की हद तक विकृत करने पर उतारू हो गए हैं। भूत-प्रेत, जादू-टोने, विकृत कल्पनाएं तथा अशिष्ट भाषा आज काॅमिक्सों के विषय हो गए हैं। अधिकांश कामिक्स पाठकों को हिंसा, अत्याचार और उलजलूल कथानकों में उलझा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। कहीं-कहीं तो ये काॅमिक्स बच्चों के पथ-भ्रष्ट हो जाने का खतरा भी पैदा कर रहे हैं।
सार्थक बाल साहित्य का उद्वेश्य मात्र मनोरंजन नहीं होना चाहिए बल्कि सहज बुद्धि का विकास और ज्ञानवर्द्धन उसकी मूल वृति होना चाहिए। यह निहायत अफसोस की बात है कि हमारे काॅमिक्स सामान्यतः बच्चों को सही मार्गदर्शन और दिशा-बोध देने में विफल हो रहे हैं।
अक्सर काॅमिक्सों पर हिंसा की मनोवृति को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। काॅमिक्स के पेरोकार इस संबंध में कहते हैं कि दरअसल काॅमिक्सों में हिंसा नहीं बल्कि एक्शन और थ्रिल होता है। काॅमिक्सों में तो हिंसा पर सामान्य आदमी की विजय प्रदर्शित की जाती है। एक्शन, एडवेंचर और संस्पेंस काॅमिक्स के मूल तत्व हैं। इसके विपरीत काॅमिक्स विरोधियों का तर्क है कि बच्चों के संस्कारों में हिंसा व मारधाड़ का जहर घोलने की दिशा में काॅमिक्स सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। उनकी यहां तक मान्यता है कि यह मीठा जहर देश की नई पीढ़ी को मानसिक रूप से विकलांग बनाकर छोड़ेगा।
यदि हम काॅमिक्स की गुणवत्ता की बात छोड़कर इस माध्यम की व्यापक पहुंच पर विचार करें तो पाएगें कि काॅमिक्स लाखों करोड़ो पाठकों के रूप में अत्यन्त विराट केनवास रखती हैं। आबादी के इतने बड़े हिस्से, खासतौर पर बच्चों के बीच लोकप्रिय इस माध्यम का सदुपयोग किया जाना निश्चय ही एक बड़े सांस्कृतिक परिवर्तन का औजार बन सकता है। काॅमिक्सों के माध्यम से नई पीढ़ी में देश-प्रेम, राष्ट्रीयता, सामाजिकता और शिक्षा के संस्कार सहजता से अभिरोपित किए जा सकते हैं। अमर चित्र कथा तथा डायमंड पाॅकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित कुछ काॅमिक्सों द्वारा इस तरह के प्रयास हुए भी हैं।
वस्तुतः हमारा संघर्ष काॅमिक्सों से नहीं, उनके विकृत और निरर्थक स्वरूप से है, जो बाल-वर्ग के मानसिक विवेक और संवेदनशीलता को क्रमशः कुंठित कर रहा है। काॅमिक्सों का यह मीठा जहर बच्चों की रगों में धीरे-धीरे घुल कर उनके मानसिक स्वास्थ्य को हानि पहंुचा रहा है, उन्हें दिग्भ्रमित कर रहा है। बाल मनोविज्ञान एक बहुत नाजुक और संवेदनशील विषय है। प्रायः ज्यादातर काॅमिक्स बच्चों की मनोभावनाओं से खिलवाड़ कर उन्हें एक कपोल कल्पित दुनिया मे ले जाते हैं, उस दुनिया की असंभव परिकल्पनाएं यर्थाथवादी दुनिया की वास्तविकताओं से बिल्कुल अलग होती हैं। बच्चे के जिज्ञासु बाल-मन के लिए हकीकत और कल्पना में भेद कर पाना और सामंजस्य कर पाना मुश्किल हो जाता है। ऐसी परिस्थितियां बच्चे को पलायनवादी बनाती हैं। वास्तविक दुनिया के संघर्षो से वह मुंह चुराकर किसी चमत्कार अथवा किसी सुपरमैन के आगमन की निर्रथक प्रतीक्षा करने लगता है।
काॅमिक्सों के प्रकाशन की एक सामान्य आचार संहिता तैयार की जानी चाहिए, ताकि बच्चों को उच्चकोटि के सार्थक कामिक्स और चित्रकथाएं उपलब्ध हो सकें। अमेरिका में एक न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक ‘काॅमिक्स कोड आथरिटी‘ की नियुक्ति की गई । इस आथरिटी द्वारा 41 सूत्रीय आचार संहिता निर्मित की गई है, जिसका पालन हर काॅमिक्स प्रकाशक के लिए अनिवार्य है। भारत में भी इस प्रकार की व्यवस्था की जाकर काॅमिक्सों के स्तर को गिरने से बचाया जा सकता है।
आज जब काॅमिक्सों की लोकप्रियता सातवें आसमान को छू रही है, उसका उपयोग सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव के लिए रचनात्मक दिशा में किया जाना चाहिए। अपनी लाख बुराईयों के बावजूद यह माध्यम निर्विवाद रूप से जन सामान्य और बच्चों में बेहद लोकप्रिय है। इस माध्यम को निरर्थक कह कर खारिज कर देना न तो मुनासिब है और न ही मुमकीन!
  