pexels photo 2396220

आदत न बनाइये काॅफी को

pexels photo 2396220


काॅफी पर हुए गहन वैज्ञानिक अनुसंधानों ने इसमें मौजूद ‘ कैफीन ‘ को सेहत के लिहाज से बहुत हानिकारक घोषित किया है। इन निष्कर्षो ने शोधकर्ताओं, चिकित्सकों और काॅफी के शौकीन लोगों को एक विचित्र दुविधापूर्ण स्थिति में डाल दिया है।
जहां तक काॅफी की खोज का ताल्लुक है, एक अरबी लोक-कथा के अनुसार इसकी खोज तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व अबीसीनिया के एक ईसाई पादरी द्वारा की गई। एक रोज बगीचे में घूमते हुए उसने देखा कि भेड़-बकरियां एक पौधे की पŸिायों को खा कर उन्मुक्त होकर उछल कूद कर रही हंै। उस जिज्ञासु पादरी ने इस वनस्पति के बीज एकत्र किए और एक पेय पदार्थ तैयार किया। इसका सेवन जब पादरी ने अपने शिष्यों के साथ किया तो उन सबको एक अनोखी स्फूर्ति और ताजगी का अहसास हुआ। धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। जब ज्ञात हुआ कि यह मादक पदार्थ है तो रूढ़िवादी लोगों ने इसका विरोध किया, लेकिन तब तक काॅफी का प्रचलन बहुत बढ़ चुका था।
यह भी कहा जाता है कि अफ्रीकी देश इथोपिया में बेर की भांति काॅफी के फलों को भून कर और पीस कर एक पेय पदार्थ तैयार किया जाता था, जिसे ‘ कपका ‘ कहा जाता था। यह काॅफी ही थी। इथोपिया से काॅफी मुसलमान तीर्थ यात्रियों के माध्यम से यमन और अरब देशों में पहुंची। अरब देशों में यह ‘ कहण ‘ के नाम से जानी गई। एक प्रख्यात अरबी दार्शनिक अविसेन्ना ( सन् 1040 ) काॅफी के बहुत बड़े प्रशंसक थे। बारहवीं सदी के आते काॅफी का प्रचलन तकरीबन सभी मुस्लिम देशों में स्वागत सत्कार के प्रतीक के रूप में होने लगा था। जगह-जगह ‘ कहवा घर ‘ ( काॅफी हाउस ) खुलने लगे। ‘ कहवा घर ‘ उस युग में बौद्धिकता और वैचारिक बहसों के अड्डे बनने लगे थे। कट्टरवादी लोगों ने इन कहवा घरों को धर्म विरूद्ध बताते हुए जेहाद का एलान कर दिया और अन्ततः सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक काहिरा व मक्का के कहवा घरों को या तो बंद करवा दिया गया या नष्ट कर दिया गया।
काॅफी सत्रहवीं शताब्दी के दूसरे दशक तक यूरोपीय देशों में पहुंच चुकी थी। इंग्लेैंड में काॅफी के चलन के बाद 23 नवम्बर 1657 में तुर्की के एक व्यापारी ने पहली बार लंदन की ग्रब-स्ट्रीट में पहला काॅफी हाऊस खोला। इसकी बढ़ती लोकप्रियता ने काॅफी का प्रचार प्रसार इटली, फ्रान्स आदि अन्य यूरापीय देशों मे बड़ी तेजी के साथ किया।
भारत में काॅफी का प्रवेश सत्रहवीं शताब्दी में हुआ। दक्षिणी भारत के एक मुस्लिम संत बूदन बाबा जब हज करके लौटे तो अपने साथ काॅफी के सात बीज लेकर आए, जिन्हें उन्होंने कर्नाटक के पहाड़ी क्षेत्रों में बो दिया। आज भी ये पहाड़ी क्षेत्र ‘ बाबा बुदन गिरि ‘ के नाम से मशहूर है। इसके बाद केकन नामक एक अंग्रेज ने दक्षिणी भारत के पर्वतीय इलाकों मे काॅफी के बाग लगाए। इस प्रकार धीरे-धीरे काॅफी का विस्तार सम्पूर्ण भारत में हुआ।
काॅफी ने कभी चाय जैसी व्यापक लोकप्रियता प्राप्त नहीं की, इसका मुख्य कारण चाय की अपेक्षा इसका मंहगा होना है। बहुत अर्से तक काॅफी दैनिक पेय के स्थान पर चिकित्सकीय प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल की जाती रही। चाय की अपेक्षा कम लोकप्रिय होने के बावजूद पिछले कुछ दशको में इसके प्रयोग में कल्पनातीत वृद्धि हुई है। हमारे देश में पचास हजार से भी अधिक काॅफी बागान हैं, जिनमें ढाई लाख मजदूर कार्यरत है। विश्व के कुल काफी उत्पादन में भारत का योगदान 1.2 प्रतिशत है। भारत में काॅफी की खपत प्रति व्यक्ति 70 ग्राम प्रतिवर्ष है।
काॅफी का बीज आकार में बड़ा तथा एक ओर से गोल, दूसरी ओर से चपटा होता है। रंग के लिहाज से यह हल्दी के सदृश्य होता है। स्वाद में काॅफी मृदु गंध युक्त, तीखी तथा कसैली होती है। जहां तक औषधिय रूप में इसके सेवन का प्रश्न है, यह कफ नाशक, उŸोजक तथा शरीर के नाड़ी संस्थान को शक्ति प्रदान करने वाली वस्तु मानी जाती है। मूत्र से यूरिक एसिड के निष्कासन मे भी काफी उपयोगी है। लेकिन काॅफी से होने वाले लाभ उसके सेवन की उचित मात्रा पर निर्भर करते है। चालीस से सŸार ग्रेन से अधिक काॅफी का सेवन हमेशा हानिकारक रहता है।
आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों ने काॅफी के निरन्तर प्रयोग से होने वाली अकल्पनीय हानियों का गहन अध्ययन करने के बाद जो निष्कर्ष दिए है, वह सचमुच चैकाने तथा दहला देने वाले है। सिर-दर्द, अनिद्रा, हृदय की अनियमित धड़कन, यौन सम्बन्धी रोग , अल्सर आदि तो काॅफी-सेवन के आम दुष्परिणाम है ही, साथ ही अत्यधिक मात्रा में काॅफी सेवन से शरीर में कैफीन की जो मात्रा प्रविष्ट होती है, उससे कैंसर जैसा लाइलाज रोग भी हो सकता है। सन् 1981 में ‘ न्यू इंग्लैंड जर्नल आॅफ मेडिसिन ‘ में प्रकाशित एक शोध पत्र में कैफीन को गुर्दो, आमाशय और पिŸााशय के कैंसर के लिए जिम्मेदार माना गया है।
काॅफी को सेहत के लिए नुकसान देह बनाने वाला मूल तत्व कैफीन है, ‘मिथाइएंथाइन‘ नामक यह उŸोजक रसायन काॅफी के अलावा कोका, चाय और कोला में भी पाया जाता है, लेकिन इसकी सर्वाधिक मात्रा काॅफी मेें ही होती है। कैफीन की ज्यादा मात्रा का सीधा अर्थ है विष। सन् 1980 से पहले तक कैफीन को इतना खतरनाक नही माना जाता था। लेकिन बाद में हुए वैज्ञानिक विश्लेषणों ने कैफीन को एक अत्यधिक घातक जहर साबित किया। पांच से दस ग्राम कैफीन किसी भी स्वस्थ व्यक्ति की जान लेने के लिए पर्याप्त है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि व्यक्ति 75 कप काॅफी एक साथ लगातार पी ले तो उसकी तत्काल मृत्यु हो सकती है।
दरअसल तम्बाकू में पाए जाने वाले हानिकारक पदार्थ की तरह ‘ कैफीन ‘ भी काॅफी में पाया जाने वाला उŸोजक और नुकसान देह पदार्थ है, जो मानव शरीर में पहुंचकर अनेक रोगों को जन्म देता है, काॅफी के नियमित और अत्यधिक सेवन से शरीर में दुर्बलता, जी मिचलाना उच्च रक्त-चाप, अपच, अनिद्रा, पक्षाधात, सिरदर्द आदि कई बीमारियां हो सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि कैफीन की एक बूंद इंजेक्शन द्वारा मानव मस्तिष्क में पहुंचा दी जाए तो भंयकर दौरे पड़ने शुरू हो जाते है। मस्तिष्क और हृदय अपना कार्य करना बंद कर सकते हैं।
दिल के मरीजांे के लिए भी काॅफी का सेवन उचित नहीं है, इससे धड़कन तेज हो जाती है तथा रक्तचाप बढ़ जाता है। अधिक काॅफी का सेवन करने वाले व्यक्तियों को दिल का दौरा पड़ने की संभावना ज्यादा रहती हैं। काॅफी पाचन संस्थान को भी प्रभावित करती है। इसके सेवन से अमाशय में हाईड्रोक्लोरिक एसिड जमा हो जाता है जिसके कारण पेट में घाव और अल्सर हो जाते हैं।
गर्भवती महिलाओं के लिए काॅफी का सेवन घातक है, इसके दुष्परिणाम उनकी भावी संतान तक को भुगतने पड़ते है। सन् 1980 में अमेरिका के खाद्य एवम् औषधि प्रशासन विभाग द्वारा गर्भवती महिलाओं पर काॅफी के प्रभावांे का परीक्षण करने के लिए विभिन्न प्रयोग किए। इन प्रयोगों में गर्भवती मादा चूहो के अमाशय में ट्यूब द्वारा कैफीन की मात्रा पहुंचाई गई बाद मंे जन्मे शिशु में कई विकृतियां पाई गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि काॅफी में मौजूद कैफीन की मात्रा गर्भस्थ शिशु की हड्डियों के विकास में अवरोध पैदा करती है। काॅफी के सेवन से गर्भपात का भी खतरा रहता है।
काॅफी से होने वाले कुप्रभावो पर अभी भी व्यापक अनुसंधान जारी है। इससे होने वाले व्यापक शारीरिक नुकसानो को देखते हुए बेहतर तो यही होगा कि इसे आदत नहीं बनाया जाए।
  