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चोरी का दंड

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चोरी का दंड – Chori ka dand – Story

गंगा के किनारे दो आश्रम थे। दोनो ही आश्रमों में विद्यार्थी दूर-दूर से पढ़ने आते थे। एक के स्वामी थे शंख और दूसरे के लिखित। दोनों भाई ही थे। शंख बड़े थे और लिखित छोटे। दोनों ही भाई धर्माचार्यो के रूप में भी बहुत प्रसिद्ध थे।
एक दिन की बात है लिखित अपने बड़े भाई के आश्रम पहुंचे वह कहीं गये हुए थे। कुछ देर लिखित उनकी कुटिया के द्वार पर ही उनकी प्रतीक्षा करते रहे, फिर बगीचे की तरफ निकल गये। टहलते-टहलते उनकी नजर पके हुए सुंदर-सुंदर फलों पर पड़ी। उनका मन मचल गया। उन्होंने हाथ बढ़ाकर कुछ फल तोड़ लिये।
वह उन्हें खाने ही वाले थे कि शंख आ गये। यह देखकर उन्होंने छोटे भाई से पूछा, “क्या भूख ज्यादा लगी है? ये फल तुम्हें कहां से मिले?”
लिखित ने आगे बढ़कर पहले उनके पांव छुए, फिर बोले, “ये फल आपके आश्रम के ही हैं……..भूख तो नहीं थी, पर इन्हें देखकर जी ललचा गया….”
इतना सुनते ही शंख गंभीर हो गये। बोले, “भाई, यह तो चोरी हुई। मुझसे बिना पूछे मेरे आश्रम के फलों को तोड़ने का साहस तुम्हे कैसे हुआ?”
लिखित गर्दन झुकाये मौन खड़े थे।
शंख बोले, “तुम अभी राजा के पास जाओ और कहो कि मैने चोरी की है, मैं चोर हूं, मुझे दंड दीजिए!‘‘ यह कहकर वह कुटिया की ओर चल दिये। लिखित वहीं खड़े के खड़े रह गये। उनका मन पश्चाताप से भर उठा था।
लिखित राजा के पास पहुंचे। दरबार लगा हुआ था। महाराज किसी संगीन मामले पर फैसला सुना रहे थे। द्वारपाल ने आचार्य लिखित के आने का समाचार महाराज तक पहुंचाया। यह समाचार पाते ही महाराज ने अपने मंत्रियों सहित पैदल चलकर उनकी अगवानी की और पूछा, ‘‘आदरणीय, कैसे आना हुआ? कहिए क्या आज्ञा है?”
उŸार में लिखित ने सारी घटना बयान कर डाली और दंड के लिए महाराज से प्रार्थना करते हुए बोले, “महाराज, देरी न करें क्योंकि मैंने चोरी जैसा काम किया है….”
यह सुनकर सभी दंग रह गये। महाराज ने उन्हें बहुत समझाया कि यह कोई ऐसा अपराध नहीं है, जिस पर आप इतने गंभीर हो गये हैं। लेकिन लिखित थे कि अपनी बात अड़े ही रहे।
इस पर राजा ने अपने सहयोगियों से सलाह-मशविरा के लिए थोड़ा समय मांगा। लेकिन लिखित बोले, “राजन! आपके निर्णय में देर हुई तो न्याय नहीं हो सकेगा। हो सकता है कि आपके मंत्रियों को मुझ पर दया आ जाए…… या वृद्धजन कहें कि यह ऐसा अपराध नहीं है, जिस पर दंड देना जरूरी हो।”
लिखित का यह उŸार सुनकर सारी सभा स्तब्ध रह गयी…..चूंकि फल उनके हाथों ने तोड़े थे। इसलिए राजा ने उनके हाथ कटवा दिये, परंतु लिखित एकदम मौन थे। उनके चेहरे पर शिकन तक न थी।
अब लिखित अपने बड़े भैया के पास पहुंचे। उनके पैरों में गिर गये और बोले, ‘‘मुझ दंड प्राप्त, पापी भाई को क्षमा करें।”
छोटे भाई का हाल देख कर बड़े भाई की आखें भर आयीं। उन्होंने आगे बढ़कर लिखित को गले लगा लिया और बोले, “भाई, मैने क्रोध के वशीभूत होकर तुम्हें राजा के पास नहीं भेजा था, बल्कि तुमसे चोरी जैसा घृणित काम हो गया था, जिसका प्रायश्चित जरूरी था। राजदंड से वह हो गया, अब तुम्हारे चरित्र पर कोई दाग नहीं है…. अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे कुल पर चोरी का कंलक लग जाता….”
“अब आज्ञा दीजिए….”
“जाओ भाई, नदी पर जाओ और नहाकर अपने पूर्वजों को जंलाजलि दो और उनकी नाराजगी दूर करो।”
यह सुनकर लिखित को बड़ा आश्चर्य हुआ- बिना हाथों के वह जलाजंलि कैसे दे? फिर भी बड़े भाई की आज्ञा मानकर वह नदी तट पर पहुंचे। उन्होंने एक डुबकी लगायी। पर जैसे ही वह बाहर निकले तो उनकी आंखें हैरत से फैल गयीं…. उनके दोनों हाथ सही-सलामत थे।

वह नदी से बाहर निकले और दौड़े-दौड़े भाई के पास पहुंचे। वह भी यह देखकर बहुत खुश हुए और बोले, “आदमी कितना ही तप करे, लेकिन आचरण अगर शुद्ध नहीं हो तो सब बेकार है!”
यह सुनकर लिखित ने झुककर उनके पांव छू लिये।