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सफरनामा छाते का

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मानव ने हमेशा, हर स्तर पर प्रकृति की चुनौतियों का मुकाबला करने के प्रयास किए हैं। चिलचिलाती धूप हो या मूसलाधार बारिश, आदमी ने इनसे बचने के लिए छाते का आविष्कार किया। छाता आज एक अत्यन्त सामान्य उपकरण और सामान्य इस्तेमाल की वस्तु समझा जाता है। छाते के वर्तमान स्वरूप तक पहुंचने की यह विकास यात्रा हजारों वर्षों पुरानी है।
छाते का प्रचलन कब और कैसे शुरू हुआ, यह ठीक-ठीक बता पाना तो मुमकिन नहीं है, किन्तु प्राचीन हिन्दू तथा बौद्ध संस्कृति में ‘छत्र‘ के रूप में इसके प्रमाण मिलते हैं। भारतीय आदिग्रंथ वेद एवं पुराणों में भी कई स्थानों पर छत्र शब्द का प्रयोग मिलता है, जो छतरी अथवा छाते का ही पर्याय है। समस्त जैन ग्रंथों, तीर्थकरों के चित्रों और मूर्तियों में ‘छत्र‘ पाया जाता है। इसके अतिरिक्त भगवान बुद्ध की प्राचीन प्रतिमाओं में भी छत्र मिलता है। वस्तुतः छत्र छाते का ही प्रारंभिक स्वरूप था।
धार्मिक अनुष्ठानों के अतिरिक्त राजकीय कार्यो में भी छत्र का विशेष महत्व था। प्राचीन काल के सम्राटों के छत्र बेशकीमती होते थे। इनमें बहुमूल्य रत्न जड़े होते थे। राजकीय प्रतिष्ठा ओर सम्मान का प्रतीक समझे जाने वाले इन छत्रों का प्रयोग भारत के अलावा चीन, तुर्की, यूनान, फारस आदि देशों में भी किया जाता था। मिस्त्र और यूनान के पांच हजार वर्ष पुराने भवनों में छाते से मिलते जुलते चित्र पाये गये हैं, जो बारिश और धूप से बचाव के लिए सम्राटों द्वारा उपयोग में लाये जाते थे। रोम में छाते को केवल महिलाओं के उपयोग की वस्तु समझा जाता था।
धार्मिक और राजकीय स्तर से हटकर देखें तो जन-सामान्य में ‘छाते‘ की सर्वप्रथम परिकल्पना एक बड़े आकार के हैट के रूप में रही होगी। चीनी पुस्तकों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि वहां महिलाएं हजारों वर्ष पूर्व एक बहुत बड़े घेरे वाले हैट का इस्तेमाल धूप से बचाव के लिए करती थीं।
छाते के आधुनिक स्वरूप का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। इंग्लैण्ड, फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों में तो मात्र दो शताब्दियों पूर्व छाते का प्रचलन प्रारंभ हुआ। कपड़े के छाते का चलन कब प्रारंभ हुआ, इसके सम्बन्ध में स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है, किन्तु सन् 1770 के आस-पास एक फ्रेंच लेखक मेकडोनाल्ड ने अपनी स्पेन-यात्रा के संस्मरणों में रेशमी कपड़े के बने छातों का उल्लेख किया है। प्रारंभ में यूरोपीय देशों में छातों का उपयोग केवल शाही परिवार के लोग व अमीर वर्ग के लोग ही कर सकते थे। इंग्लैण्ड में सबसे पहले जोन्स नामक एक व्यक्ति जब बाजार में छाता लगाकर निकला, तो लोगों ने उसे अजीब दृष्टि से देखा। उसका उपहास उड़ाया गया। बच्चों ने तो उसे पत्थर भी फेंके। लेकिन धीरे-धीरे छाते का चलन आम होता गया। इंग्लैण्ड में पहले छातों में बेंत की तीलियां लगाई जाती थी, बाद में लोहे की तीलियों का इस्तेमाल किया जाने लगा।
सन् 1772 में भारत का एक धनी व्यापारी वाल्टीमोर के बंदरगाह पर छाता खोले उतरा तो वहां भगदड़ मच गयी। वहां के लोगों ने पहले कभी छाता नहीं देखा था। पूरे वातावरण में दहशत फैल गयी। लोग इधर-उधर भागने लगे। बच्चे और औरते भयभीत होकर चीखने लगे। स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिस की सहायता लेनी पड़ी।
फ्रांस में कपड़े के समेटे जा सकने वाले छाते का प्रचलन काफी पहले हो चुका था। लेकिन छाते को 18वीं शताब्दी से पूर्व तक जन-सामान्य में पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित नहीं हो सकी। इसे मात्र फैशन और वैभव का प्रतीक माना जाता था। हालांकि उस समय भी अनगिनत रंगों और डिजाइनों के छाते महिलाओं के लिए उपलब्ध थे।
सत्रहवीं शताब्दी से पूर्व छातों में भारी धातु की छड़ का इस्तेमाल किया जाता था। सन् 1840 में सर्वप्रथम हेनरी हालैंड ने इसमें स्टील की छड़ का उपयोग किया। सन् 1874 में पहली इंग्लैण्ड में गोलाकार इस्पात की कमानियों वाले कपड़े के छाते का पेटेंट करवाया गया।
विकास की क्रमिक प्रक्रिया के दौरान छाते में कई छोटे-मोटे परिवर्तन निरंतर होते रहे। आज सामान्यतः छाता काले रंग के जलरोधी कपड़े से बनाया जाता है। इसमें एक लंबी डंडी पर मुड़ने वाली कमानियों का छत्र लगा होता है, जिस पर कपड़ा मढ़ा जाता है। इस काले कपड़े को जलरोधी बनाने के लिए इस पर मोम का लेप किया जाता है। भारत में छाता बनाने का पहला कारखाना सन 1902 में मुंबई में स्थापित हुआ । इस समय हमारे देश में 750 से भी अधिक छाता बनाने के कारखाने हैं, जिनका वार्षिक उत्पादन दो करोड़ छातों से भी अधिक है। भारत द्वारा बड़े पैमाने पर छातों का विदेशों को निर्यात किया जा रहा है।
छातों का यह सफर अब कई पड़ावों से गुजर कर एक ऐसे मुकाम पर आ पहुंचा है, जहां सैकड़ों किस्मों के एक से एक उम्दा छाते उपलब्ध हैं। छाता जगत का सबसे आधुनिक आयाम है, एयर कंडीशन छाता। पश्चिमी देशों में लोकप्रिय हो रहे इस छाते में एक छोटी-सी बेटरी चालित मशीन लगी होती है, जो छाते के हर तरफ ठंडी हवा फेंकती है। पंख वाले छाते भी बाजार में उपलब्ध हैं। वैज्ञानिक अब सौर छाता बनाने में जुटे हैं। सौर ऊर्जा से चलने वाला यह छाता आपको कड़कती सर्दी में गर्माहट देगा।