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भूल का अहसास | Bhul ka ahasas

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भूल का अहसास | Bhul ka ahasas

 पिछले दो घंटों से राजेश  बिस्तर  पर  लेटा करवटें बदल रहा था l नींद उसकी  आंखों से कोसों दूर थी। मन पर बड़ा भारी बोझ महसूस हो रहा था। उसके मस्तिष्क में रह-रहकर वही घटना घूम रही थी।

हॉस्टल में क्रिकेट

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भूल का अहसास | Bhul ka ahasas

तीसरे पहर कुछ लड़कों का कार्यकम बना कि आज होस्टल में किकेट खेला जाए। देखते-देखते कोरीडोर फील्ड बन गया, दो इंटें विकेट, गेद बल्‍ला था ही। स्कोर गिनने का नया तरीका खोज लिया गया। गेंद छत या दीवार को छू ले तो एक एक रन, गेंद एक दीवार को छूकर जमीन पर टप्पा खाकर दूसरी दीवार को लगे तो दो रन और बिना टप्पा खाए लगे तो चार! खेलने वाले कुल आठ लड़के थे, इसलिए टीम बनाने का सवाल ही न था। पर्चियों के जरिये बारियां बंधी और खेल प्रारंभ हो गया।

खेल शुरू हुआ तो होस्टल हल्ले से गूंजने लगा। जो लड़के कमरों में पढ़ रहे थे,  उन्होंने पढ़ना बंद कर दिया और खेल देखने बाहर आ गए। इसके अलावा,  भला वे कर भी क्या सकते थे।

सुधीर को परेशानी

सुधीर के कमरे के सामने विकेट बनी थी। गेंद बार-बार आकर उसके दरवाजे पर लगती थी। गेंद लगने पर दरवाजा जोरों से भड़भड़ा उठता था। सुधीर ने बाहर निकलकर खिलाड़ियों को समझाया कि मैदान में खेलो। जब केवल समझाने से काम न चला तो उसने धमकी दे डाली- मैं वार्डन से शिकायत कर दूंगा!राजेश ने उसकी धमकी की खिल्ली  उड़ाई – अरे जा, जा, तेरे सरीखे शिकायती टट्टू बहुत देखे हैं!

सुधीर पहले भी कई बार इस प्रकार की धमकियां दे चुका था। कितु ये धमकियां कारगर कभी न होती थी। किन्तु आज यह केवल धमकी न थी। इसका तभी पता चला, जब वह कुछ ही मिनटों में वार्डन के साथ कोरीडोर में आ गया। दरअसल हुआ यह था कि दरवाजों की भड़भड़ाहट सुनकर तथा शोरगुल सुनकर स्वयं वार्डन महोदय ही इस ओर आ रहे थे।

जब वार्डन साहब मैदान में पधारे, तब राजेश की सेंचुरी बनने में एक चौके की कसर थी। इसी खुशी में वह शोर मचाता हुआ उछल रहा था।

वार्डन से शिकायत

वार्डन ने राजेश को रंगे हाथों पकड़ा। केवल उसी के हाथ में खेल में शामिल होने का पक्का प्रमाण था – यानी बल्‍ला। वार्डन साहब राजेश को डांटने लगे तो सबने उनकी हां में हां मिलानी शुरू कर दी – सर, यह होस्टल में हॉकी भी खेलता है।” “सर , यह पढ़ने नहीं देता।

सर, एक बार यह होस्टल से भागकर नाइट-शोदेखने गया था। ऐसा लगा कि सुधीर ने शिकायत खिलाड़ियों नहीं,  केवल राजेश की ही की थी।

असली मुसीबत तो तब शुरू होगी, जब वार्डन साहब इस घटना की रिपोर्ट घर पर भेजेंगे, और क्लास टीचर के पास भी। क्लास-टीचर भरी कक्षा में उसे अपमान भरी नसीहत देंगे। इतना ही नहीं, घर से भी डांट-भरा  फ़ोन  आएगा l  इतना हुआ और इतना होगा यह सब सुधीर के ही कारण।

दस बजे राजेश बत्ती बुझा कर लेटा था और अब समय बारह से ऊपर हो चला था। उसे नींद न आ रही थी। एक तो उसका दिमाग बदले की आग में जल रहा था, दूसरे पेट में चूहे दौड़ रहे थे। सवेरे से भूखा जो था।

लेटे-लेटे बदन दर्द करने लगा तो राजेश उठ खड़ा हुआ। कमरे से बाहर निकला | शायद होस्टल के सामने लान में बैठने से मन को कुछ सुकून मिले।

चौकीदार स्टूल पर बैठा-बैठा सो गया था। सारा होस्टल शांत पड़ा था। राजेश बाहर बगीचे में आकर बैठ गया। उसकी नजर यकायक होस्टल के बाहर खड़ी साइकिलों पर पड़ी। सुधीर की नई साइकिल सबसे अलग ही चमक रही थी। सुधीर के पापा अभी गए सप्ताह ही उसे यह नई साइकिल खरीद कर दे गए थे।

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 पिछले दो घंटों से राजेश  बिस्तर  पर  लेटा करवटें बदल रहा था l नींद उसकी  आंखों से कोसों दूर थी। मन पर बड़ा भारी बोझ महसूस हो रहा था। उसके मस्तिष्क में रह-रहकर वही घटना घूम रही थी।

हॉस्टल में क्रिकेट

तीसरे पहर कुछ लड़कों का कार्यकम बना कि आज होस्टल में किकेट खेला जाए। देखते-देखते कोरीडोर फील्ड बन गया, दो इंटें विकेट, गेद बल्‍ला था ही। स्कोर गिनने का नया तरीका खोज लिया गया। गेंद छत या दीवार को छू ले तो एक एक रन, गेंद एक दीवार को छूकर जमीन पर टप्पा खाकर दूसरी दीवार को लगे तो दो रन और बिना टप्पा खाए लगे तो चार! खेलने वाले कुल आठ लड़के थे, इसलिए टीम बनाने का सवाल ही न था। पर्चियों के जरिये बारियां बंधी और खेल प्रारंभ हो गया।

खेल शुरू हुआ तो होस्टल हल्ले से गूंजने लगा। जो लड़के कमरों में पढ़ रहे थे,  उन्होंने पढ़ना बंद कर दिया और खेल देखने बाहर आ गए। इसके अलावा,  भला वे कर भी क्या सकते थे।

सुधीर को परेशानी

सुधीर के कमरे के सामने विकेट बनी थी। गेंद बार-बार आकर उसके दरवाजे पर लगती थी। गेंद लगने पर दरवाजा जोरों से भड़भड़ा उठता था। सुधीर ने बाहर निकलकर खिलाड़ियों को समझाया कि मैदान में खेलो। जब केवल समझाने से काम न चला तो उसने धमकी दे डाली- “मैं वार्डन से शिकायत कर दूंगा!” राजेश ने उसकी धमकी की खिल्ली  उड़ाई – “अरे जा, जा, तेरे सरीखे शिकायती टट्टू बहुत देखे हैं!”

सुधीर पहले भी कई बार इस प्रकार की धमकियां दे चुका था। कितु ये धमकियां कारगर कभी न होती थी। किन्तु आज यह केवल धमकी न थी। इसका तभी पता चला, जब वह कुछ ही मिनटों में वार्डन के साथ कोरीडोर में आ गया। दरअसल हुआ यह था कि दरवाजों की भड़भड़ाहट सुनकर तथा शोरगुल सुनकर स्वयं वार्डन महोदय ही इस ओर आ रहे थे।

जब वार्डन साहब मैदान में पधारे, तब राजेश की सेंचुरी बनने में एक चौके की कसर थी। इसी खुशी में वह शोर मचाता हुआ उछल रहा था।

वार्डन से शिकायत

वार्डन ने राजेश को रंगे हाथों पकड़ा। केवल उसी के हाथ में खेल में शामिल होने का पक्का प्रमाण था – यानी बल्‍ला। वार्डन साहब राजेश को डांटने लगे तो सबने उनकी हां में हां मिलानी शुरू कर दी – “सर, यह होस्टल में हॉकी भी खेलता है।” “सर , यह पढ़ने नहीं देता।”

“सर, एक बार यह होस्टल से भागकर ‘नाइट-शो’ देखने गया था। ऐसा लगा कि सुधीर ने शिकायत खिलाड़ियों नहीं,  केवल राजेश की ही की थी।

असली मुसीबत तो तब शुरू होगी, जब वार्डन साहब इस घटना की रिपोर्ट घर पर भेजेंगे, और क्लास टीचर के पास भी। क्लास-टीचर भरी कक्षा में उसे अपमान भरी नसीहत देंगे। इतना ही नहीं, घर से भी डांट-भरा  फ़ोन  आएगा l  इतना हुआ और इतना होगा यह सब सुधीर के ही कारण।

राजेश ने लिया बदला

दस बजे राजेश बत्ती बुझा कर लेटा था और अब समय बारह से ऊपर हो चला था। उसे नींद न आ रही थी। एक तो उसका दिमाग बदले की आग में जल रहा था, दूसरे पेट में चूहे दौड़ रहे थे। सवेरे से भूखा जो था।

लेटे-लेटे बदन दर्द करने लगा तो राजेश उठ खड़ा हुआ। कमरे से बाहर निकला | शायद होस्टल के सामने लान में बैठने से मन को कुछ सुकून मिले।

राजेश  के मस्तिष्क में एक कुटिल विचार बिजली की तरह कौंध गया और उसके अधरों पर एक शरारती मुस्कान तैरने लगी। उसे एक पिन, सिर्फ एक पिन की आवश्यकता थी और वह उसके पास मौजूद था। बुशर्ट का ऊपर का बटन के टूट जाने के कारण उसने उस स्थान पर पिन लगा रखा था।

पिन निकाल कर उसने सुधीर की साइकिल के पिछले पहिए के टायर में दबा दिया। पिन बाहर खींचते ही तेज सूं-सूं की आवाज हुई और हवा बाहर निकलने लगी। राजेश ने अपना काम किया और चुपचाप अपने कमरे में लौट आया। वह मन ही मन यह सोचकर खुश हो रहा था कि सुबह जब सुधीर को पैदल साइकिल घसीटते हुए तीन किलोमीटर दूर शहर जाना पड़ेगा, तब बच्चू को पता चलेगा। होस्टल शहर से काफी दूर बना हुआ था और आस-पास साइकिल की कोई दुकान भी नहीं थी।साईकिल की चोरी

राजेश ने खुद को हल्का महसूस किया और वह अपने बिस्तर पर जा लेटा। लेटते ही उसे नींद आ गई। सुबह जब होस्टल में हो रहे शोरगुल के कारण जब उसकी नींद खुली तो उसने पाया कि पूरे होस्टल में हंगामा मचा हुआ है। वह आंखे मलता हुआ अपने कमरे से बाहर आया और उसने वहां गुजर रहे किसी छात्र से पूछा

क्या बात हो गई?  इतनी अफरा-तफरी क्‍यों मची हुई है?”

तुम्हे मालूम नहीं? रात को होस्टल में चोरी हो गई है। चोर होस्टल के बाहर पड़ी हुई साइकिलों में से तीन-चार साइकिलें चुरा कर ले गए। वार्डन साहब ने फोन करके पुलिस को बुलाया।छात्र ने जवाब दिया।

राजेश बुरी तरह चौंका और होस्टल के बाहर, जहां साइकिलें रखी जाती हैं, उस ओर चल दिया। वहां कई छात्र व वार्डन साहब मौजूद थे। राजेश ने देखा, उसकी साइकिल भी वहां नहीं थी। उसके अलावा तीन और लड़कों की साइकिलें चोरी गई थी। राजेश धक-सा रह गया।

बच गई सुधीर की साइकिल

सुधीर की नई साइकिल स्टैण्ड से कुछ ही दूर गिरी हुई पड़ी थी। उसे देखते ही राजेश समझ गया कि चोर सुधीर की साइकिल पंक्चर होने के कारण नहीं ले जा सके और उसे वहीं पटक गए।

अब राजेश को अपने किए पर आत्म ग्लानि  होने लगी। वह सोच रहा था कि उसने सुधीर का बुरा सोचकर उसने सुधीर की साइकिल में पंक्चर किया किन्तु यह पंक्‍चर भी उसके लिए भाग्यशाली साबित हुआ। इतने में उसे सुधीर आता दिखाई दिया। राजेश से रहा न गया। वह तुरंत सुधीर के पास पहुंचा और भरे गले से बोला

अरे, क्या हुआ? तुम रो रहे हो?” – सुधीर ने उसके कंधे थपथपाते हुए कह

राजेश ने रात वाली सारी घटना बता दी। सुधीर ने कहा — कोई बात नहीं। मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं। तुम्हारे कारण तो आज मेरी साइकिल चोरी हो जाने से बच गई। मैं तुम्हारा आभारी हूं।  तुम्हारे द्वारा किया पंक्चर मेरे वास्ते लकीसाबित हुआl “

कहना ना होगा कि इस घटना के बाद सुधीर और राजेश पक्‍के दोस्त बन गए।

शिक्षा

कभी किसी से इर्ष्या नहीं करनी चाहिए | अंततः यह हमारा ही नुकसान करेगी |

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