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भविष्यवाणी

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किसी समय में घाघ नाम के बड़े ज्योतिषी थे। उनका जन्म राजस्थान में हुआ था। लेकिन जितनी विद्या उनके पास थी, उतना वहां उनका आदर नहीं था। वह पोथी-पत्री वाले ज्योतिषी नहीं थे। वह तो शकुन और पशु-पक्षियों की चाल-ढाल देखकर बता देते थे कि वर्षा होगी या नहीं, उसी के आधार पर वह देश में अकाल या सुकाल की भविष्यवाणी भी कर देते थे। उन दिनों मौसम की जानकारी देने वाले यंत्र तो थे नहीं। इसलिए इस विद्या का बड़ा महत्व था। फिर भी घाघ को अपनी जन्म-भूमि में वह मान-सम्मान नहीं मिला, जो इतने बड़े ज्योतिषी को मिलना चाहिए था।

इससे दुखी होकर उन्होंने अपनी जन्म-भूमि को छोड़ दिया और धार नगरी चले गये। वहां राजा भोज राज करते थे। वह बड़े उदार थे। गुणी लोगों के प्रति श्रद्धा रखते थे। उन्होंने घाघ का स्वागत किया और उन्हे ‘राज-ज्योतिषी‘ का पद देकर अपने यहां रख लिया।
राजा भोज के दरबार में और भी बहुत से ज्योतिषी थे। उन्होंने देखा कि बाहर से एक आदमी आकर राजा का कृपा-पात्र बन गया है, तो उनके हृदय में बड़ी ईष्र्या उत्पन्न हुई। लेकिन राजा के डर से वे कुछ कह या कर नहीं सके।
एक बार की बात है कि धार नगरी में और उसके दूर-पास तक वर्षा नहीं हुई। लगा, अकाल पड़ेगा। राजा को यह देखकर बड़ी चिंता हुई। उन्होंने अपने राज्य के सारे ज्योतिषियों को बुलाया और उनसे पूछा कि पानी पड़ेगा या नहीं?
सब ज्योतिषियों ने मिलकर विचार किया और राजा से कहा, ‘‘राजन, इस वर्ष वर्षा का योग नहीं है, तीन वर्ष तक राज्य में भयंकर अकाल पड़ने की आशंका है।‘‘
राजा को काटो तो खून नहीं। पानी न पड़ने से तीन साल का अकाल सब कुछ तबाह कर देगा। पर वह करें क्या? पानी का पड़ना, न पड़ना उनके हाथ में तो था नहीं, बड़ी हैरानी की निगाह से राजा ने घाघ की ओर देखा, पूछा, ‘‘पंडित जी आपकी क्या राय है?‘‘
घाघ ने अपना हिसाब लगाया था। उसके अनुसार वर्षा का योग था। पर उन्होंने सोचा कि इतने बड़े-बड़े ज्योतिषी एक स्वर में कह रहे हैं कि वर्षा नहीं होगी, तो उन्हें अपनी बात एकदम से नहीं कह देनी चाहिए। एक बार फिर हिसाब लगाकर देख लेना चाहिए। साथ ही, जंगल में पशु-पक्षियों की चाल-ढाल भी देख आनी चाहिए। बहुत से पशु-पक्षी ऐसे होते हैं, जिन्हें वर्षा होने का पहले से आभास हो जाता है और उससे उनकी चाल-ढाल और उनकी बोली में अंतर आ जाता है। यह सोचकर घाघ ने एक दिन की मोहलत ले ली।
इसके बाद घाघ जंगल में चले गये। घूमते-घूमते उन्हें एक गधा दिखाई दिया। उसके कान नीचे की ओर लटके हुए थे। घाघ ने सोचा कि यह वर्षा की अलामत है, उनका हिसाब सही है।
यह सोचते हुए वह आगे बढ़े, तो उन्होंने देखा कि चींटियों का बहुत बड़ा दल अपने मुंह में अन्न के कण दबाये तेजी से अपने बिलों की ओर बढ़ रहा है, आगे बढ़े तो देखते क्या हैं कि चिड़िया धूल में नहा रही है। फिर उन्होंने देखा कि चीलों का झुंड एक गोला बना कर आकाश की ओर बढ़ता जा रहा है।
घाघ को अपने गणित पर पहले से ही विश्वास था। अब वह विश्वास और पक्का हो गया। पर दूसरे ज्योतिषियों ने इतने जोर से वर्षा न होने और अकाल पड़ने की बात कही थी कि घाघ के मन में थोड़ा संशय पैदा हो गया था। उन्होंने सोचा, अभी कुछ और जांच कर लेनी चाहिए।
दो चार कदम आगे बढ़ने पर उन्हें एक नाला मिला। उसके इस पार एक लड़की कुछ पशुओं को चरा रही थी और उस पार एक आदमी सूअरों को चरा रहा था। अचानक लड़की चिल्लाकर बोली – ‘‘बाबा सूअरों को लेकर जल्दी इस तरफ आ जाओ, बड़े जोर से पानी आने वाला है। फिर सूअर नाला पार नहीं कर सकेंगे।‘‘ बाबा सूअरो को लेकर इस पार आ गये। उन्होंने लड़की से पूछा, ‘‘बेटी, तुझे कैसे मालूम हुआ कि बारिश आने वाली है?‘‘
लड़की ने कहा, ‘‘बाबा, नाले में टिटहरी ने अंडे दे रखे है। वह घबराई हुई अंडो को उठाकर दूसरी जगह ले जा रही है। देखो, वह कितनी आवाज कर रही है। इससे साफ मालूम होता है कि उसे भान हो गया है कि पानी आने वाला है।‘‘
अब घाघ को अपने हिसाब पर तनिक भी संदेह नहीं रह गया। वह अपने नगर लौट आये और राजा से मिले। राजा ने सारे ज्योतिषी इकट्ठे किये। उन सबके सामने घाघ ने कहा, ‘‘राजन, आप चिंता न करें। वर्षा होगी….और अवश्य होगी।‘‘
राजा ने कहा, ‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो? आसमान साफ है न बादल है न बिजली है। तब पानी कहां से आएगा?‘‘
घाघ ने पूरे विश्वास के साथ उत्तर दिया, ‘‘मैं कहता हॅूं कि वर्षा होगी और मूसलाधार होगी।‘‘
इतना कह कर घाघ अपने ठिकाने पर चले आये और खा-पीकर बिस्तर पर लेट गये। रात हो आयी। घाघ की निगाह आकाश पर टिकी थी। थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा, इधर-उधर से बादल घिरने लगे। घाघ की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। थोड़ी-थोड़ी बंूदे भी पड़ने लगीं और कुछ ही समय में इतने जोर का पानी पड़ा कि जमीन पर नदी बहने लगी।
धरती की प्यास बुझ गयी। राजा का डर दूर हो गया। दादुर बोलने लगे, पपीहे ‘पिऊं-पिऊं‘ करने लगे। चारो ओर आनंद की लहर दौड़ गयी।
राजा ने पुलकित होकर सभा बुलाई। घाघ को भी बुलाया गया। घाघ ने सभा को संबोधित करते कहा, ‘‘याद रखिये, हमारे पशु-पक्षी ऐसे यंत्र हैं, जो कभी झुंठे नहीं हो सकते। उन्हें ठीक से जानने-पहचानने की जरूरत है। उनकी बोली हम भले ही न समझें, लेकिन उनके हाव-भाव, उनकी चाल-ढाल, बहुत कुछ कह देती है।‘‘
राजा ने घाघ को सबसे बड़ी उपाधि से सम्मानित किया।
घाघ को जो लड़की नाले पर मिली थी। उसका नाम भेड्डरी था। घाघ ने बाद में भेड्डरी से विवाह कर लिया। ये वही घाघ और भेड्डरी हैं, जिनके ऋतु-संबधी दोहे और सूक्तियां आज भी जन सामान्य में सर्वाधिक विश्वसनीय और प्रमाणिक मानी जाती हैं।