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चेतना का आध्यात्मिक स्वर:कीर्तन

Bal Kirtan 2

कीर्तन हमारी सदियों पुरानी आध्यात्म मूलक सांस्कृतिक चेतना का मुख्य स्वर है, जो किसी न किसी रूप से आज भी जीवित है। भागवत में उल्लेख आया हैः
‘‘कृते यत् ध्याय तो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः
द्वापारे परिचर्यायां कलौ तत् हरिकीर्तनात्।‘‘
(भागवत, 12 – 3 -52)
अर्थात तमाम बुराईयों के इस समय ‘कलियुग‘ में हरि-कीर्तन ही एक मात्र ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने सभी दुःखों से मुक्ति पा सकता है।
ईश्वर-भक्ति के जो नौ मार्ग बताए गए हैं, उनमें कीर्तन का दूसरा स्थान है। कीर्तन द्वारा ईश्वर-भक्ति की परंपरा पुराण-शास्त्रों में वर्णित मिलती है। यह तथ्य कीर्तन परंपरा-परंपरा की प्राचीनता को प्रमाणित करता है। धर्मशास्त्रों में मुनि नारद को कीर्तन-परम्परा का आद्य-प्रणेता बताया गया है।
कीर्तन सारे भारत में लोकप्रिय हैं, किन्तु आज जो हम हर गली-मोहल्ले में देर रात तक ऊंचे आवाज में घ्वनि विस्तारक यंत्रों की सहायता से शोरगुल और फिल्मी गीतों की भोंडी नकल से भरे आयोजन देखते हैं, वह किसी भी कोण से कीर्तन-परम्परा के अंग नहीं हैं, और न ही इन विकृत और वीभत्स आयोजनों की फूहड़ता को कीर्तन की सात्विकता के समकक्ष रखा जा सकता है। यह सही है कि इस लम्बी अवधि में कीर्तन-परम्परा बदलाव व परिवर्तनों के कई पड़ावों से गुजरी है, कहीं इसका स्वरूप परिष्कृत हुआ है तो कहीं बल्कि अधिकांशतः यह अनेक विसंगतियों की शिकार हुई है।
महाराष्ट्र में आज भी कीर्तन-परम्परा अपने मौलिक स्वरूप व शालीनता के साथ अस्तित्व में है। वहां के जन-मानस में कीर्तन इस सहजता के साथ समाविष्ट हो चुका है कि उसे एक अनिवार्योŸार आयाम से अलग कर के देखना कठिन है। शताब्दियों से चली आ रही यह धार्मिक परम्परा वहां के लोगों की जीवन-शैली में सांस्कृतिक व सामाजिक स्तर पर मान्यता प्राप्त कर चुकी है। वैसे तो वर्ष-भर वहां कीर्तन-समारोहों का आयोजन चलता रहता है किन्तु आषाढ़ शुक्ल दशमी से कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक चार मास की अवधि में तो जैसे पूरा महाराष्ट्र ही कीर्तनमय हो जाता है, मंदिरों में तो आयोजन होते ही हैं, गली मोहल्लों में हरि-कीर्तन के कर्णप्रिय स्वर सुनाई देने लगते हैं।
महाराष्ट्र की कीर्तन परम्परा हिन्दू शासकों के शासन-काल में तो निर्बाध रूप से चलती रही। उन्होंने सदैव कीर्तनकारों को राज्याश्रय व यथासंभव सहायता प्रदान की। मुगल-काल में कीर्तन-परंपरा की विराटता और निरन्तरता में व्यवधान पैदा हुआ। उस युग में छत्रपति शिवाजी ने कीर्तनकारों को प्रश्रय प्रदान किया। उस समय संत रामदास श्री समर्थ तथा संत तुकाराम अपने आध्यात्मिक प्रकाश से कीर्तन परम्परा को नये अर्थ व आयाम प्रदान कर रहे थे। ज्ञात इतिहास में सात सौ वर्ष पूर्व संत नामदेव नामक संत ने कीर्तन विधा को सारे देश में लोकप्रिय बनाने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। महाराष्ट्र में जन्मे संत नामदेव ने प्रभु-स्तुति को सुमधुर भजनों व कीर्तन के द्वारा अपने मधुर कंठ द्वारा पूरे राष्ट्र में बिखेरा। पेशवाओं के शासन-काल में कीर्तन-विधा की कीर्ति व आशातीत वृद्धि हुई।
प्राचीन कीर्तन-परम्परा आगे चलकर दो सम्प्रदायों में विभाजित हो गई, पहली नारदीय तथा दूसरी वारकरी, नारदीय सम्प्रदाय की कीर्तन परम्परा में रामचन्द्र को आराध्य माना जाता है जबकि वारकरी कीर्तन परम्परा के कीर्तनकार विट्ठल के उपासक होते हैं। वारकरी सम्प्रदाय ‘रघुपित राघव राजाराम‘ भजन कभी नहीं गाते। इसके अतिरिक्त नारदीय कीर्तन में चरित्र व दृष्टान्त को पर्याप्त महत्व दिया जाता है।
कीर्तन-कला सीखने के लिए विधिवत प्रशिक्षण लेना पड़ता है। चतुरंगी कीर्तन का कठोर अभ्यास, धार्मिक उद्धरण व सुभाषितों को कंठस्थ करना, संगीत का गहन ज्ञान, वाक चार्तुय आदि गुणों में एक कीर्तनकार को पारंगत होना परम आवश्यक है। कीर्तनकार को उदार, सदाचारी, शालीन, मृदुभाषी, धर्मशास्त्रों का ज्ञाता और कुशाग्र बुद्धि होना चाहिए। काशी में विनायक बुआ भागवत ने संस्कृत भाषा में लिखे ग्रन्थ ‘कीर्तनाचार्यकम्‘ में एक आदर्श कीर्तनकार के गुणों और विशेषताओं पर विस्तृत प्रकाश डाला है। नृत्य, अभिनय कला, गायन व वादन-कला में एक कीर्तनकार को प्रवीण व दक्ष होना चाहिए।
मुम्बई और सम्पूर्ण महाराष्ट्र में कीर्तन-संस्कति आज भी एक लोक-परम्परा की तरह जीवित है। चार्तुमास व गणेशोत्सव के मौके पर कीर्तन मंडली की रौनक बहुत बढ़ जाती है, सभी मंदिरों को लाल पीले ताजा पुष्पों से सुसज्जित किया जाता है, मंदिरों के अहाते में बैठने की अलग-अलग व्यवस्था रहती है। सूचना पट्ट पर कीर्तन ओर कीर्तनकारों के सम्बन्ध में विस्तृत सूचना लिखी होती है, ऐसे आयोजनों में सम्मिलित होने से पूर्व वहां के शिष्टाचार व मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक होता है। समस्त श्रोताओं को जूते बाहर उतार कर जाना होता है, सामान्यतः सिर पर टोपी धारण करके कीर्तन में जाना चाहिए। कीर्तन के बीच से उठकर आना कीर्तनकार का अपमान समझा जाता है। जयकार में श्रोताओं द्वारा कीर्तनकार का साथ देना इस विधा का अनिवार्य अंग है।
मुम्बई के गोराराम मंदिर तथा कालाराम मंदिर के ट्रस्ट द्वारा एक शताब्दी से भी अधिक समय पूर्व चार्तुमास में कीर्तन की परम्परा शुरू की गई थी। विख्यात स्वाधीनता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक कीर्तन के प्रबल व प्रखर समर्थक थे। उन्होंने एक बार कहा था कि यदि मैं पत्रकारिता के पेशे न आया होता तो निश्चय ही कीर्तनकार बना होता।
बम्बई और पूना में कीर्तन कला का प्रशिक्षण देने हेतु कीर्तन पाठशालाएं हैं, जहां प्रशिक्षाणार्थियों को कीर्तन कला के साथ धार्मिक व सामाजिक विषयों, संस्कृत भाषा ज्ञान और संगीत आदि में भी पारंगत किया जाता है। पांच वर्षीय पाठ्यक्रम पूर्ण होने पर विद्यार्थी को ‘कीर्तनालंकार‘ की उपाधि से विभूषित किया जाता है। कई स्थानों पर कीर्तन के कार्य को वंशानुगत आधार पर किया जाता है।
पाॅप म्यूजिक, डिस्को म्यूजिक और गजलों के इस आधुनिक दौर में लोगों का कीर्तन जैसी सनातन विधा के प्रति आकर्षण कम होता जा रहा है। एक मशहूर कीर्तनकार मधुसुदन बुवा कवीश्वर का कहना है कि पुराने युग में लोगो में भावुकता थी, आधुनिक युग में बुद्धि का विकास हो रहा है, तार्किकता बढ़ रही है, उस तर्क का शास्त्रीय दृष्टि से ही निराकरण करना चाहिए। उनका कहना है कि आज कीर्तनकारों को राज्याश्रय प्राप्त नहीं है। उन्हे आर्थिक सुरक्षा भी हासिल नहीं है। कीर्तनकारों को उनके कार्य का उचित व पर्याप्त पारिश्रमिक भी नहीं मिलता। इस कारण भी इस विधा के जानकारों का मोहभंग हो रहा है।
यदि यह कुछ चलता रहा तो कहीं ऐसा न हो कि भारतीय आध्यात्म की यह प्राचीन परम्परा कहीं लुप्त न हो जाए। कीर्तन-परम्परा को जीवित रखने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जाने चाहिए।