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लहसुन के गुण

( Benefits of garlic )

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संभवत: लहसुन ही एक मात्र ऐसी उपज है, जिसके सम्बन्ध में अनगिनत किवदंतियां,
मान्यताएं और अंध-विश्वास सदियों से प्रचलित रहे हैं। हमारे प्रौराणिक ग्रन्थों में इसे ‘सागर मंथन
से सम्बद्ध बताया गया है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से जब चौदह रत्नों में से एक ‘अमृत’ हासिल हुआ तो देव व दानवों में इसे लेकर
विवाद उत्पन्न हो गया। तब ब्रह्मा ने देवताओं और दानवों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाकर
अमृत बांटना शुरू किया। उस समय राहू नामक का राक्षस ने अपना रूप बदलकर देवताओं की
पंक्ति में बैठकर अमृत-पान कर लिया। इस पर विष्णु ने अपने सुदर्शन चक से उसकी गर्दन काट
दी, परन्तु तब तक अमृत उसके हलक में पहुंच चुका था। अतः अमृत की कूछ बूंदे धरती पर बिखर
गई। उन्हीं अमृत की बूंदों से धरती पर जिस पौधे की उत्पत्ति हुई, वह लहसुन का पौधा था। ऐसी
मान्यता है कि इसी कारण लहसुन में अमृत के सभी गुण विद्यमान हैं, किन्तु वह अमृत चूंकि दानव के कंठ तक पहुंच गया था, इस कारण उसमें तामसिक लक्षण भी पाए जाते हैं।

“भाव प्रकाश, ‘चरक संहिता, ‘सुश्रुत संहिता’, “कश्यप संहिता’ आदि अति प्राचीन आयुर्वेदिक
ग्रन्थों में लहसुन की रोग-नाशक क्षमता और स्वास्थ्यवर्द्धक होने का उल्लेख मिलता है।

प्राचीन मिम्र की सभ्यताओं में लहसुन को अपवित्र तथा वर्जित माना जाता था तथा इसका
सेवन करने वालों को महिमाययी मातृदेवी के मन्दिर ‘सी बेले में प्रवेश नहीं करने दिया जाता था,
जबकि ग्रीक सभ्यता में लहसुन को महत्वपूर्ण स्थान हासिल था। वहां के निवासियों की मान्यता थी
कि उत्तम और अच्छे खिलाडी के लिए लहसुन का नियमित सेवन अनिवार्य है। वहां इसे ‘हेकारे
देवी’ से संबंधित माना जाता था।

प्राचीन रोमन साम्राज्य में आम आदमी लहसुन का सेवन एक शक्ति-वर्द्धक पदार्थ के रूप में
करता था। वहां गुलामों, श्रमिको और सिपाहियों को सरकारी तौर पर लहसुन का वितरण किया
जाता था किन्तु उच्च तथा अभिजात्य वर्ग के लोग लहसुन को पसंद नहीं करते थे तथा इसे घटिया
खाद्य पदार्थ के रूप में देखते थे।

यह तथ्य लहुसन की ऐतिहासिकता को रेखांकित करता है कि दुनिया की पहली हड़ताल
लहसुन की मांग को लेकर की गई। ईसा से तीन हजार वर्ष पूर्व मिस्र के प्रसिद्ध पिरामिड ‘चिआप्स’
का निर्माण कर रहे मजदूरों को जब अचानक लहसुन की आपूर्ति बंद कर दी गई तो मजदूरों ने
लहसुन के बिना काम करना बंद कर दिया। अन्ततः लहसुन की आपूर्ति दुबारा शुरू किए जाने पर
ही ‘हड़ताल’ खत्म हुई।

पौराणिक कथाओं में प्रसंग आता है कि इन्द्रदेव ने ऋषियों की बांझ पत्नियों को संतानोत्पति
के लिए लहसुन का सेवन करने का परामर्श दिया।

प्राचीन बेबीलोन सभ्यता में लहसुन को रोग-नाशक खाद्य पदार्थ के रूप में मान्यता प्राप्त
थी। रोम व यूनान की अति प्राचीन संस्कृति में लहसुन को पूजा के योग्य वस्तु माना जाता था तथा
इसका आहार व औषधि के रूप में उपयोग होता था।

मध्यकालीन युग के अंध-विश्वासों भरे दौर में तो लहसुन की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ गई।
भूत-प्रेत व पिशाचों से सुरक्षा के लिए लहसुन का इस्तेमाल रक्षा-कवच के तौर पर किया जाता।
उस समय यह मान्यता प्रचलित थी कि लहसुन पास रखने से या लहसुन का ताबीज पहनने से
अनिष्टकारी शक्तियां नुकसान नहीं पहुंचा सकती।

विश्व युद्ध के समय जब आज की तरह एंटीबायटिक औषधियां उपलब्ध नहीं थी, उस दौर
में लहसुन से एक रामबाण औषधि की तरह लोगों की जीवन-रक्षा की गई। इसके प्रयोग से गहरे
घाव शीघ्र ठीक हो जाते तथा युद्ध क्षेत्र में छूत की बीमारी फैलने का खतरा नहीं रहता।

सन्‌ 665 में जब प्लेग की महामारी फैली और हजारों लोग मरने लगे, तब यह देखकर
लोग आश्चर्य चकित रह गए कि एक गांव के एक मकान में रहने वाले पूरे परिवार के किसी भी
सदस्य पर प्लेग का कोई असर नहीं हुआ। मालूमात करने पर ज्ञात हुआ कि जहां वह परिवार
निवास करता था, वह मकान किसी समय लहसुन का एक बहुत बड़ा गोदाम रह चुका था। बाद में
इस मकान का नाम ‘गाड्स प्राविडेन्ट हाउस’ रख दिया गया।

यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है कि सर्वप्रथम लहसुन कहां पैदा हुआ, किन्तु
विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिणी यूरोप तथा मध्य पूर्व एशिया को लहसुन का जन्म-स्थान माना जाता
है। लहसुन एक कंद या गांठ है जो धरती के अन्दर पैदा होता है। आज संसार के प्रायः सभी भागों
में इसकी खेती होती है।

लहसुन में प्रचुर मात्रा में औषधिय गुण पाए जाते हैं। रासायनिक संचरना की दृष्टि से
लहसुन ने निम्न तत्वों का समावेश होता है –

82 प्रतिशत नमी, 28 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 7.3 प्रतिशत प्रोटीन, 0.8 प्रतिशत रेशा तथा 0.4
प्रतिशत चिकनाई | प्रति सौ ग्राम लहसुन में 340 मि.ग्राम फास्फोरस, 30 मि.ग्राम कैल्शियम तथा 4
मि.ग्राम लोहा व गंधक होता है। प्रति सौ ग्राम लहसुन से हमें 445 कैलोरी उर्जा प्राप्त होती है।

लहसुन में बादामी रंग का एक उड़नशील तेल पाया जाता है, जो क्षय रोग, वात-विकार
आदि रोगों के उपचार हेतु अत्यन्त प्रभावकांरी रहता है। आयुर्वेद में लहसुन के सेवन को पाचक,
धातु-वर्द्धक, रक्‍त-वर्द्धश, हड्डियों को सुदृढ़ता प्रदान करने वाला, नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला,
आरोग्य-वर्द्धस तथा आयु-वर्द्धक माना गया है

इसके अतिरिक्त यह दमा, खांसी, सिर दर्द, जोड़ों का दर्द, हृदय की दुर्बलता, तपेदिक तथा
कृष्टरोग जैसी अनेक व्याधियों को नष्ट करता है।

940 में नोबेल पुरस्कार विजेता एक वैज्ञानिक ने यह सिद्ध किया कि लहसुन में मौजूद
“एलिन’ नामक तत्व रोगाणुओं को नष्ट करने की अपूर्व क्षमता रखता है। आधघ्रननिक खोजों ने सिद्ध कर दिया कि लहसुन एक सर्वोत्तम प्राकृतिक एंटी सैप्टिक औषधि है।

अपने इतने अधिक औषधीय गुणों के अलावा लहसुन हृदय सम्बन्धी रोगो में एक अत्यन्त
प्रभावशाली औषधि है। हाल के वर्षो में हुए व्यापक अनुसंधानो से यह तथ्य सामने आया है कि
लहसुन में एक ऐसा कियाशील तत्व समाहित है, जो रक्‍्त-धमनियों में वसा के जमाव को कारगर
ढंग से रोकता है। धमनियों का वसा, जिसे ‘कोलस्ट्रोल’ कहा जाता है, के जमाव के कारण धमनियों
का सिकुडना ही हृदय रोगों तथा वृद्धावस्था के लक्षणों का मुख्य कारण है। लहसुन के सेवन से
रक्‍त–धमनियों में कोलस्ट्रोल का जमाव नहीं हो पाता। लहसुन में मौजूद कियाशील तत्व धमनियों के रक्‍्त-संचरण की प्रकिया को दुरुस्त करते हैं, जिससे हृदय की कार्य क्षमता में वृद्धि होती है।
आज डाक्टर दिल तथा रक्तचाप के मरीजों को नियमित रूप से लहसुन का सेवन करने का परामर्श
देते हैं। कोलोन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैस टायटर ने लम्बे अनुसंधानो के बाद निष्कर्ष निकाला है कि लहसुन हृदय रोगियो के लिए एक रामबाण औषधि है। खतरनाक जीवाणुओं को नष्ट करने साथ ही यह क्षय रोग और डिप्थीरिया जैसी बीमारियों के रोगाणुओं को नष्ट करने में पेनिसिलिन सेकहीं बेहतर है साथ ही इसके सेवन के कोई साइड इफेक्ट भी नही है।प्राकृतिक चिकित्सकों के अनुसार, भोजन के बाद एक या दो कली कच्चा लहसुन खाने से
बदहजमी, अपच, पेट दर्द गैस आदि शिकायतें दूर हो जाती हैं। दांत व दाढ़ के दर्द में लहसुन के
रस को गर्म करके उसका फाहा लगाने से दर्द ठीक हो जाता है। कान व “नाक-दर्द में सरसों के
तेल तथा लहसुन के रस को मिलाकर गर्म कर लें तथा दो-तीन बूंदे नाक या कान में टपकाएं।गर्म पानी में लहसुन का रस मिलाकर घाव धोने से जख्म शीघ्र भर जाता है।लहसुन का नियमित सेवन आपको अनजाने में ही न जाने कितनी बीमारियों से निजात
दिलवा सकता है। औषधि के अलावा इसका उपयोग सिरका, सांस, किचप, अचार, ब्रेड, पापड़ आदि
के निर्माण में किया जाता है।

भारत में लहसुन की पर्याप्त पैदावार होती है। यहां से श्रीलंका, अफीका, यूरोपीय देशों,
दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देशों को लहसुन का निर्यात किया जाता है।

लहसुन की इस प्रचुर गुण सम्पन्नता के कारण ही महात्मा गांधी इसे ‘गरीबो की कस्तूरी’
कहते थे तथा महर्षि चरक इसके अपरिमित गुणों के कारण कहते थे कि लहसुन तो सोने से भी महँगी होनी चाहिए