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बेचारा गधा

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आदमी ने आज तक जिस पशु की सबसे ज्यादा फजीहत की है, वह है बेचारा गधा! अकारण, बिना किसी ठोस आधार के गधे को मूर्खता और जड़ता का शाश्वत प्रतीक मान लिया गया है। आदमी की मुसलसल बेइंसाफी और ज्यादतियों के शिकार इस बेचारे गधे को कभी अपनी मेहनत, सब्र और वफादारी का सिला नहीं मिला। आज भी यदि अमेरिका की डेमोके्रटिक पार्टी के चुनाव चिन्ह के रूप में प्राप्त सम्मान को छोड़ दिया जाए तो इसके खाते मंे सिवाए उपेक्षा, तिरस्कार और उपहास के कुछ नहीं बचता ।
गधा हमेशा से ऐसा नहीं था। प्राचीन काल में इसकी भी बड़ी इज्जत और शोहरत थी, और तो और यह देवताओं की सवारी तक के रूप मेें काम आता था। आज भले ही गधे की सवारी को अपमानजनक माना जाता हो, लेकिन एक जमाना रहा है गधों का भी, जब भगवान शंकर की बारात में सम्मिलित होने वाले अनेकों देवताओ ने गधे को अपना वाहन बनाया था। ‘पार्वती-मंगल‘ में उल्लेख मिलता है:-
‘ मुदित सकल सिवदूत, भूत गन गाजहि।‘
सूकर महिष स्वान, खर वाइन सा जहिं ।। ‘
शताब्दीयों पूर्व ‘नियोलिपिक एज‘ में मिस्त्र में गधों को अत्यधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। घोड़ो के मुकाबले गधों को अत्यधिक महत्व दिया जाता था तथा धनी व प्रतिष्ठित व्यक्ति गधे की सवारी करने में शान समझते थे। अनेको मुस्लिम सौदागर तिजारत के वास्ते गधो पर बैठ कर मीलों लम्बे सफर पर जाते थे। तब गधों की मजबूती और वफादारी पर बहुत भरोसा किया जाता था। उत्तर अफ्रीका और यूरोप के आर्थिक विकास में गधो ने अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यातायात के साधनो के अभाव के उस युग में गधांे ने अपनी सेवाएं दी। उस जमाने के गधे अत्यधिक ऊंचे, चैड़े तथा बलिष्ठ हुआ करते थे, तब एक अच्छे गधे की कीमत आज के लगभग पचास हजार रूपयों के बराबर होती थी।
गधा मूूलतः घोड़े व जेब्रा के कुल का स्तनपायी प्राणी है। ऐसा माना जाता है कि अपने अभ्युदय काल के प्रारम्भ में गधा एक बहुत बड़ा तथा बलिष्ठ प्राणी था। कुछ विशेषज्ञों के मतानुसार प्रारम्भ में गधे का आकार-प्रकार हाथी के बराबर था। लेकिन भोजन सम्बन्धी समस्या, प्राकृतिक सन्तुलन, निरन्तर उपेक्षा आदि कारणों से उसका आकार धीरे-धीरे घटने लगा। आज एक औसत गधे की ऊंचाई करीब साढे़ चार फीट होती है। गधे की औसत आयु तीस वर्ष के लगभग होती है। वैसे अपवादस्वरूप कई गधे चालीस से पचास वर्ष तक भी जीवित रहते देखे गए हैं। यह प्राणी मूलतः शाकाहारी है तथा घास, पत्तियां, झाड़ियांे आदि पर निर्भर रहना पंसद करता है।
सेवा-भाव, वफादारी, सहनशीलता, धैर्य, शांतिप्रियता आदि इस प्राणी के जन्मजात गुण हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आदमी ने इसके इन गुणों की सदैव उपेक्षा कर प्रताड़ित और अपमानित करने में कोई कोर-कसर नही रख छोड़ी है। इसे ‘ बैशाख नंदन ‘ की उपाधि से विभूषित करते हुए मनुष्य ने इस मिथ्या धारणा को प्रचारित किया कि वैशाख माह में जब कहीं घास नजर नहीं आती, उस समय गधे यह सोच कर मोटे होते हैं कि उन्हांेने सारी घास चर डाली है।
इस उपेक्षित प्राणी की कई प्रजातियां हैं। अफ्रीका के जंगलो में अबीसीयन और नूबीयन प्रजाति के जंगली गधे पाए जाते हैं। नूबीयन जाति के गधों का रंग हल्का नीला होता है तथा इसकी पीठ पर गहरी धारियां होती है। तिब्बत के बर्फीले क्षेत्रों में क्यांग प्रजाति का गधा पाया जाता है। इसके शरीर पर घने बाल होते है। इस प्रजाति के गधों में एक प्रकार की सामाजिकता की भावना होती है। 40 से 60 तक झुंडो में रहने वाले इन गधों का एक मुखिया होता है, जिसके निर्देशन में दूसरे गधे काम करते हैं। मुखिया का मुख्य कार्य अपने साथियो को संभावित संकट से सचेत करना रहता है।
मंगोलियाई जंगली गधे साईबेरिया, मंचूरिया, तथा मंगोलिया के पश्चिमी भागो में पाए जाते हैं। इनका आकार अपेक्षाकृत छोटा होता है तथा यह हल्के रंग के होते है। सुप्रसिद्ध अमेरिकी प्रकृति-विज्ञानी राय चैपमैन एंड्यूज के अनुसार मंगोलियाई जंगली गधे गोबी के मरूस्थल में हजार-हजार तक के समूह में रहते हंै। बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही इनका प्रजनन काल प्रारम्भ हो जाता है। तब यह गधे धीरे-धीरे समूह से अलग होने लगते हैं। यह साठ किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ सकते हैं। गधों को लेकर मनुष्य जाति मे कई प्रकार के अन्ध विश्वास तथा भ्रान्तियां प्रचलित हैं । मिस्त्र में गधे को अज्ञान का प्रतीक माना जाता है। लेकिन प्राचीनकाल में मिस्त्र के निवासी गधे को अत्यधिक सम्मान देते थे। वह गधों की हजामत बनाकर और स्नान करवाकर साफ सुथरा रखते थे। रोमन लोग रास्ते में गधे के मिलने को अपशकुन समझ कर यात्रा स्थगित कर देते थे। जापानी लोग गधे को श्रम का प्रतीक मानते थे। ब्रिटेन में गधी के दूध से स्नान करने को यौवन ओर सौन्दर्य के लिए लाभदायक माना जाता था।
भारत में गधों का व्यापार काफी बड़े पैमाने पर होता है। कई स्थानों पर गधो की खरीद फरोख्त हेतु बडे़-बड़े मेले लगते है। राजस्थान में जयपुर से 10 किलोमीटर दूर भावगढ़ बंध्या नामक गांव में दशहरे के बाद प्रतिवर्ष एक विशाल गधा मेला लगता है, जिसमें लद्दाख, काश्मीर, नागौर, अलीगढ़, काठियावाड़, नेपाल, अफगानिस्तान आदि जगहों से गधे बिकने आते है, इसके अतिरिक्त हरियाणा के रोहतक जिले के कस्बे बेरी में भी प्रतिवर्ष चैत्र तथा आसोज माह की शुक्ला सप्तमी एवम् अष्टमी के दिन विशाल मेला लगता है, जिसमें विभिन्न किस्मों के खच्चर और गधे सारे भारत से बिक्री के लिए लाए जाते है। श्रेष्ठ नस्लो के गधे बीस-बीस हजार रूपयो तक में बिकते है। इसी प्रकार कोटा ( राज0 ) के सोरसन गांव में भी महाशिवरात्रि के अवसर पर ब्रह्मा माताजी के मंदिर पर एक विशाल गधा मेला लगता है। कोई पांच शताब्दियों पुराने इस मेले में केवल गधों की खरीद फरोख्त होती है।