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दाढ़ी— दिलचस्प इतिहास 1 | Beard

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Beard दाढ़ी – पौरुष का प्रतीक

वैसे तो दाढ़ी को पौरुष का प्रतीक माना जाता है और कई लोगों के चेहरे पर यह फबती भी खूब है  लेकिन हर युग में, हर देश में दाढ़ी के दुश्मन मौजूद रहे . जो यथा शक्ति दाढ़ी और दाढ़ी वालों का विरोध करते रहे । दाढ़ी रखने के शौकीनो को बहुत ज्यादतियों का शिकार होने के लिए मजबूर होना पड़ा । यहॉ तक कि उनकी दाढ़ियां भी कटवा दी गई ।

साहित्य में दाढ़ी Beard

जहाँ तक दाढ़ी के इतिहास का सवाल है, अंग्रेजी और फ्रेंच साहित्य में तो दाढ़ी पर अनेक किताबें लिखी गई किन्तु भारत मे दाढ़ी के बारे में लिखीं गई कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं है । भारत में दाढ़ी रखने का फेशन मुगलों ने चलाया, किन्तु औरंगजेब ने सबसे पहले दाढ़ी की लम्बाई निर्धारित की | औरंगजेब के काल में निर्धारित लम्बाई से अधिक दाढ़ी रखना अपराध समझा जाता था और ऐसे लोगो को दंडित किया जाता था  । यह देखने के लिए कि कोई नियम तो नहीं तोड़ता,  औरंगजेब ने अधिकारियों की नियुक्तियां भी कीl

Beard दाढी का रिवाज वैदिक काल से

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वैसे दाढी का रिवाज हमारे यहाँ वैदिक काल से ही है | ऋग्वेद में केशांत का उल्लेख मिलता है l व्यास ने सोलह संस्कारों की व्यवस्था दी, तो उसमें  केशांत या गोदान को भी शामिल किया गया । इसके बाद वानप्रस्थ आश्रम तक दाढ़ी का रिवाज नहीं था क्योकि उस युग में दाढ़ी शोक का प्रतीक मानी जाती थीं।

मुगल शासक दाढ़ी Beard वाले

अधिकांश मुगल शासक दाढ़ी वाले थे । इस बात का रिकार्ड मौजूद है कि पहली बार शाहाबाद में  हुमायूँ की दाढ़ी  पर उस्तरे का उपयोग किया गया । यह 6 मार्च, 1526 का दिन था । मुस्लिमों के लिये यह समरोहिक अवसर था वर्ना वे दाढ़ी बनाते ही नहीं थे l सम्राट अकबर ने 1592 ई० में जब दाढ़ी न रखने का निर्णय लिया, तभी से  दाढ़ी नहीं रखने का चलन आरम्भ हुआ l                                                                                                                           

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Beard दाढ़ी के दुश्मन शासक

रोम का प्रख्यात सिंपियों एफ्रिकेंस नामक सम्राट भी दाढ़ी से खफा था । उसने पूरे राज्य में किसी भी व्यक्ति के दाढ़ी बढ़ाने पर कानूनी प्रतिबंध लगा रखा था | कहा जाता है कि सिपियों के दाढ़ी से चिढ़ने की वजह यह थी कि उसका एक रसोइया दाढ़ी वाला था और इस वजह से अक्सर सम्राट के भोजन में दाढ़ी के  बाल निकला करते थे ।

इसी बात पर एक दफा भोजन करते वक्‍त इतना क्रोधित हुआ कि उसने फौरन रसोइये को बुलवाया और उसकी दाढ़ी में  आग लगवा दी । बाद में , उसे अपने देश से निकाल दिया । बस, तभी से सम्राट की दाढ़ी के प्रति द्वेष की भावना पैदा हो गई और यह आदेश उसने जारी करवा दिया कि कोई भी  दाढ़ी  नहीं रख सकेगा । उसे जो भीं दाढ़ी वाला नजर आता, वह फौरन उसकी दाढ़ी में आग लगवा देता ।

बाईबिल युग में तो महज दाढ़ी Beard की वजह से युद्ध हुआ

बाईबिल युग में तो महज दाढ़ी की वजह से युद्ध हुआ । हुआ दरअसल यह कि जूढ़िया के राजा दाउद के राजदूत राजा हन्नात के दरबार में पहुँचे । उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी । हन्नात  ने सोचा कि यह जासूस है, सो उन सबकी आधी दाढ़ी मुंडा दी | जब दाउद ने दाढ़ी का यह अपमान देखा,  तो उसे बुरा लगा और हन्नात पर आक्रमण कर दिया |

रूस के शासक पीटर ने 1705 ई. में यह घोषणा करवा दी कि रूस में जो भी व्यक्ति दाढ़ी बढ़ाएगा ,उसे टैक्स देना होगा । यह टैक्स तीस रूबल से सौ रूबल तक हो सकता था । पीटर के इस आदेश को पहले तो मजाक के रूप मे देखा गया । लेकिन जब सचमुच कर वसूली की जाने लगी, तो लोगों की समझ में वास्तविक स्थिति आई । फिर भी कट्टर दाढ़ी प्रेमी लोगों ने कर देना मंजूर किया । मगर दाढ़ी नहीं कटवाई ।

भारत के बंटवारे में अहं भूमिका निभाने वाले पाकिस्तान के निर्माता कायदे आजम जिन्ना दाढ़ी से घृणा करते थे । उनका कथन था कि यदि मेरा बस चले, तो मैं एक बार सभी दाढ़ी वालों की दाढियां मूंडवा दूं और फिर किसी को दाढ़ी न बढ़ाने दूं ।

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Beard दाढ़ी के खिलाफ एक आंदोलन

मध्ययुगीन यूरोप में तात्कालीन पादरियों और धर्माघिकारियों ने दाढ़ी के खिलाफ एक आंदोलन चलाया था । ग्यारहवीं शताब्दी में धर्म के ठेकेदारों ने सारे यूरोप में दाढ़ी रखने व बढ़ाने पर प्रतिबंध लगा दिया l  जो दाढ़ी रखता था, उसे धर्म से निकाल दिया जाता था व सामाजिक बहिष्कार किया जाता था ।

सन्‌ 1543 ई. में इंगलैंड में एक कानून बनाया गया,  जिसके तहत लंदन का कोई भी नागरिक दाढ़ी नहीं बढ़ा सकता था । यदि कोई नागरिक दाढ़ी बढ़ाता है, तो उसके नागरिक स्वतंत्रता के सभी अधिकार छीन लेने की व्यवस्था भी कानून में थी ।

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हर युग में दाढ़ी Beard का विरोध

इस प्रकार यह सुस्पष्ट है कि हर युग में दाढ़ी के विरोध में कई कदम उठाए गए और दाढ़ी शोषण व ज्यादती का शिकार रही । वैसे विश्व की कई महत्वपूर्ण हस्तियों ने दाढ़ी रखी- जार्ज बनार्ड शा, शिवाजी, कार्ल मार्क्स, रवीन्द्र नाथ टैगोर, टाल्सटाय, अब्राहम लिंकन, निराला, लेनिन आदि ऐसे ही नाम हैं  ।

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