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बांस: गुण कितने खास

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बांस एक बहुउपयोगी वनस्पति है, जो यूरोप और अर्टाकटिका को छोड़ संसार की सभी जगह पैदा होती है। दुनिया में बांस की तकरीबन एक हजार किस्में पाई जाती हैं। जापान, चीन, मलाया, इंडोनेशिया, भारत, मध्य एशिया, दक्षिण अमेरिका आदि बांस के मुख्य उत्पादक देश हैं।
ईसा के एक हजार वर्ष पूर्व लिखे गए एक चीनी शब्दकोष में बांस का जिक्र आया है, जो यह साबित करता है कि आज से कोई तीन हजार वर्ष पूर्व भी चीन में बांस की खेती व इसका उपयोग होता था। वैसे भी हमारे देश के कुछ प्रसिद्ध प्राचीन धर्म-ग्रंथों में बांस का उल्लेख आता है। इस तरह यह स्पष्ट है कि बांस मानव-सभ्यता का बहुत प्राचीन और प्रमुख अंग रहा है।
बांस मुख्यतया गर्म जलवायु एवं प्रचुर वर्षा वाले क्षेत्रों की पैदावार मानी जाती है। मूलतः घास प्रजाति से ही बांस संबंध रखता है। बांस की अधिकतम ऊंचाई सवा सौ फुट तक होती है। बांस की विभिन्न किस्मों के अनुसार इनकी मोटाई अंगुली की मोटाई से लेकर एक फुट व्यास तक होती है।
वैसे तो बांसों की कई जातियां होती हैं। एक ठोस किस्म का बांस, जिसे वनस्पति शास्त्र की भाषा में ‘डेन्डोक्लेयस स्ट्राइक्स‘ नाम से जाना जाता है, खेती के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसको सूखी बंजर जमीन पर भी आसानी से उगाया जा सकता है। सामान्यतः तीस इंच वार्षिक वर्षा बांस की पैदावार के लिए पर्याप्त होती है। इससे अधिक वर्षा भी इसे हानि नहीं पहुंचाती। बांस को खेतों की मेड़ों पर लगाया जा सकता है।
नर्सरी में तैयार किए गए एक वर्ष आयु के पौधों को एक फीट गहरा गड्डा खोदकर बरसात के समय रोप देना उपयुक्त रहता है। दो पौधों के दरमियान करीब 30 – 35 फीट की दूरी होना जरूरी है। इससे पौधों का भली प्रकार से विकास हो पाता है। सात-आठ वर्ष बाद बास की पहली पैदावार प्राप्त की जाती है। इसके बाद एक साल छोड़ कर दूसरे साल इनकी पैदावार ली जाती है। बांस के वृक्षों की आयु 60 से 90 वर्ष के बीच होती है। जब इसकी आयु समाप्त हो जाती है तो इस पर फूल आने लगते हैं।
आमतौर पर बांस के एक पेड़ से 5 से 20 तक बांस एक बार में प्राप्त किये जा सकते हैं। खास किस्मों के बांस में यह संख्या एक सौ तक भी पहुंच सकती है।
बांस का तना अपनी पूरी लंबाई तक निश्चित अंतरों पर संधियों या गांठों द्वारा जुड़ा रहता है। यह तना आमतौर पर खोखला रहता है और प्रत्येक जोड़ एक मजबूत पर्दे से ‘एयर-टाइट‘ बंद रहता है।
तेजी से बढ़ने वाले वृक्षों में बांस का नाम सबसे ऊपर आता है। सामान्यतः इसके बढ़़ने की गति डेढ़ फुट प्रतिदिन होती है। कुछ प्रजातियों के बांस तो चैबीस घंटों में चार फीट तक बढ़ जाते हैं। इतनी तीव्र गति से विकसित होना सचमुच आश्चर्यजनक है। कुछ लोगों का कहना है कि यदि बारीकी से निरीक्षण किया जाए तो बांस की बढ़ती हुई ऊंचाई हम अपनी आंखों से देखकर अनुभव कर सकते हैं।
बांस मानव-सभ्यता के लिए एक अत्यंत उपयोगी व लाभकारी वस्तु है। प्राचीन युग में तो मकान के छप्पर, दरवाजे, खिड़कियां आदि बांस के द्वारा ही निर्मित किए जाते थे। यहां तक कि बांस की टाटी बनाकर उसे दोनों तरफ से मिट्टी से लेपकर मकानों की हल्की व मजबूत दीवारें तक बनाई जाती थीं। भूकंप आने की संभावना वाले क्षेत्रों में आजकल बांस के बने हल्के-फुल्के मकानों का चलन फिर बढ़ता जा रहा है।
इसके अलावा दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं चटाइयां, टोकरियां, फैंन्सी फर्नीचर, बांसुरी, बच्चों के लिए खिलौने, कृषि-औजार, झाडू आदि के निर्माण में बांस ही प्रयुक्त होता है। ये वस्तुएं घरेलू उद्योग के रूप में निर्मित की जाती हैं। इस प्रकार बांस द्वारा अनेक लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।
इसके अलावा, कागज जैसी महत्वपूर्ण वस्तु के निर्माण में भी बांस की विशेष भूमिका है। हमारे देश में कागज बनाने के लिए तकरीबन 66 प्रतिशत बांस इस्तेमाल होता है। उच्चकोटि का कागज बनाने में जो पल्प (लुगदी) काम में लाई जाती है, उसमें 60 प्रतिशत से अधिक लुगदी बांस की ही होती है। इस प्रकार समूचा कागज-उद्योग बांस के ऊपर निर्भर है।
बांस के जंगल मनुष्य के लिए इतने उपयोगी होने के साथ-साथ पर्यावरण के रक्षक भी हैं। बांस के जंगल बाढ़ आदि होने से होने वाले भूमि कटाव को रोकते हैं। सरकार का ध्यान भी भूझरण रोकने में बांस के वन लगाए जाने की ओर गया है और उसने पहाड़ी क्षेत्रों व ढलानों पर बांस के वृक्ष बहुतायात से लगाने का फैसला किया है। निश्चय ही भूझरण को रोकने और वर्षा को आकर्षित करने की दृष्टि से भारी तादाद में बांस के जंगलों का लगाया जाना बेहद उपयोगी व फायदेमंद साबित होगा।
एक किस्म के बांस से अचार, मुरब्बा आदि स्वादिष्ट व्यंजन भी बनाए जाते हैं, जो खाने में स्वादिष्ट व सेहत की दृष्टि से काफी पौष्टिक होते हैं। ‘वंशलोचन‘ नामक बांस एक आयुर्वेदिक प्राणदायी औषधि के रूप में प्रयुक्त होता है। बांस की हरी कोंपलें स्वादिष्ट सब्जी के रूप में खाई जाती है। ताजा कटे बांस को गर्म करने पर जो भाप निकलती है, उसे रोगी को सुंघाया जाए तो पुराना बुखार आसानी से उतर जाता है।
इस प्रकार बांस एक अत्यंत उपयोगी वस्तु है। वस्तुतः यह मानव को प्रकृति का अनूठा और अद्वितीय उपहार है, जो जीवन के हर क्षेत्र में, हर कदम पर आदमी के काम आता है। यहां तक कि मृत्यु के बाद भी मनुष्य बांस की बनी अर्थी पर ही जाता है।