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बढ़ती उम्र का स्वागत कीजिए

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श्रीमति वर्मा की आयु पैतीस-छत्तीस के आस-पास होगी, पति सरकारी विभाग में वरिष्ठ अधिकारी है। एक सत्रह वर्षीय पुत्र काॅलेज में पढ़ता है। तेरह चैदह वर्षीया पुत्री नवीं कक्षा में पढ़ती है, घर में सम्पन्नता है। किसी बात की कोई कमी नहीं है। बाहरी तौर पर वर्मा परिवार एक आदर्श परिवार प्रतीत होता है। किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है, श्रीमती वर्मा इस आयु में रक्तचाप व मानसिक तनाव जैसी बीमारियों से ग्रस्त हो चुकी है, निरन्तर बीमारी ने उनके स्वभाव को चिड़चिड़ा बना दिया है, जिसके कारण न केवल उनके पति बल्कि बच्चे तक तनावग्रस्त रहते है। घर में प्रायः एक मनहूस सी खामोशी छायी रहती है। यह समस्या केवल श्रीमती वर्मा की नहीं हैं, सैकड़ांे-हजारों स्त्रियां उम्र के इस मोड़ पर तनावग्रस्त होकर स्वयं को एकाकी महसूस करने लगती हैं।
वैसे तीस-पैंतीस साल की उम्र कोई बहुत ज्यादा नहीं होती, लेकिन भारतीय उप महाद्वीप के सन्दर्भ में, खास तौर पर स्त्रियों के लिए यह आयु अक्सर यौवन की उमंगों, सपनों और अरमानों की विदाई की बेला बनकर आती है, जबकि पाश्चात्य देशों में तो औरतों का असली यौन-जीवन ही इस आयु में शुरू होता है। वस्तुतः हमारे देश में लड़की की शादी आम-तौर पर अठारह से बीस इक्कीस वर्ष की आयु के बीच हो जाती है और छब्बीस-छत्तीस वर्ष की उम्र तक वह दो या तीन बच्चों की मां बन चुकी होती है। इस तरह बढ़ती जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी स्त्री उम्र के पैंतीसवें मोड़ तक आते-आते स्वयं को बिल्कुल चुका हुआ-सा महसूस करने लगती है। उसे लगता है, जैसे उसकी जिन्दगी का सुनहरा वक्त गुजर गया है और वह कभी वापस नहीं लौटेगा। एक कसैला अवसाद-भरा स्वाद शनैः-शनैः उसकी जिन्दगी में घुलने लगता है, और शारीरिक व मानसिक तौर पर उसके अंदर की औरत दरकने लगती है, टूटने लगती है।
यह सत्य है कि यौवन कभी चिरस्थायी नहीं होता, चिर-यौवन मात्र हमारी कल्पना है। जैसाकि महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी कविता में अप्सरा उर्वशी को संबोधित करते हुए कहा है ‘ हे उर्वशी, तुम न माता हो, न कन्या हो, न ही पत्नी हो, तुम केवल सुन्दरी, रूपसी, प्रेयसी चिरयौवना उर्वशी हो।‘ किन्तु आम औरत को तो माता, बहिन, पत्नी, पुत्री, बहू जैसी न जाने कितनी भूमिकाएं निभानी पड़ती है।
सवाल यौवन के चिरस्थायी रहने का नहीं है। प्रश्न यह है कि औरत अपनी जिन्दगी के ख्वाबों, अरमानों और मकसद को इस मोड़ पर आकर खत्म हुआ क्यों मान ले? ऐसी कोई वजह नहीं कि यदि मन में इच्छा-शक्ति हो तो शारीरिक और मानसिक रूप से चुस्त दुरूस्त न रहा जा सके। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि आप में जीवन के प्रति एक सकारात्मक सोच हो, जिन्दगी को अपने तरीके से जीने की ललक हो।
यह सही है कि घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियां और बच्चों के पालन पोषण के गुरूतर दायित्वों के चलते सचमुच गृहणी पर काफी बोझ आ जाता है और उसकी व्यस्तताएं बढ़ जाती हैं और इस चक्रव्यूह में महिलाएं इस कदर उलझ जाती है कि अपने स्वास्थ्य और बनाव श्रृंगार की तरफ से पूर्णतः लापरवाह हो जाती है। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। याद रखिए, घर-गृहस्थी और बच्चों के बाहर भी आप की एक दुनिया है, आपका एक अलग व्यक्तित्व है। उस नितान्त अंतरंग संसार की उपेक्षा आपको काफी मंहगी पड़ सकती है। आपको इस उम्र में अपने स्वास्थ्य व श्रंृगार के प्रति ध्यान देने की आवश्यकता यौवन-काल की अपेक्षा कहीं अधिक है। सामान्य स्वास्थ्य नियमों का पालन करके, नियमित व्यायाम और संतुलित आहार विहार की बदौलत आप न केवल खुद को चुस्त-दुरूस्त रख सकती हैं बल्कि अपने यौवन को बरकरार रखकर पति महोदय को अपने मोहपाश में रखकर वर्जित दिशाओं की ओर मुड़ने से रोक सकती हैं।
सेक्स-सम्बन्ध दाम्पत्य जीवन की रीढ़ होते है। सफल व सन्तुष्ट यौन पक्ष दाम्पत्य जीवन की आधी से अधिक सफलता को सुनिश्चित कर देते हैं। प्रौढ़ावस्था की शुरूआत का अर्थ यौन सम्बन्धों का अन्त नहीं है। वस्तुतः इस उम्र में यौन सम्बन्धों का महत्व व जायका और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि इतने बरसों तक साथ रहकर पति पत्नी यौन रूप से न केवल परिपक्व होते जाते हंै बल्कि उनका सौंदर्य-बोध व समर्पण-भाव की एक निष्ठता की ओर अग्रसर होता जाता है। सामान्यतः 35 वर्ष की आयु के बाद महिलाएं सेक्स को लेकर कुछ अलग किस्म की भ्रांतियां पालने लगती हैं। उन्हें लगता है, बच्चे बड़े हो रहे हैं और एसी स्थिति में वे अपने यौन-जीवन की पारी को लगभग समाप्त मान लेती है। यह स्थिति पति महोदय के सचमुच बहुत ही त्रासदायक होती है। पति को आपकी अतंरंगता की सबसे अधिक जरूरत इस उम्र में होती है। आपकी बेरूखी से पति मानसिक रूप से कुंठित होकर अपनी यौन संतुष्टि के अनुचित रास्ते अपना सकते हैं। अतः बेहतर होगा कि जीवन के इस पक्ष को संतुलित अवश्य कर लिया जाए किन्तु उपेक्षित कदापि नहीं किया जाए।
अक्सर प्रौढ़ता की ओर बढ़ती महिलाएं परनिंदा, फिजूल की गपशप और गृहस्थी की कलह जैसे विषयों में परम्परागत रूप से अत्यधिक रूचि लेने लगती हैं। देश, समाज, धर्म, राजनीति जैसे विषयों से वे कोई वास्ता नहीं रखती। देश में क्या हो रहा है? इस बात से अधिक चिंता उन्हें इस बात की रहती है कि पड़ोस में क्या हो रहा है? इस प्रकार अपनी ऊर्जा का अपव्यय करके वे सिवाय निराशा, हताशा व कुंठा के कुछ हासिल नहीं कर पातीं। दरअसल अपने दृष्टिकोण को रचनात्मक बनाईये और अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व विकसित करने का प्रयास कीजिए। यदि आप अपने घर व पड़ौस की चार दीवारी से बाहर निकल कर देखेंगी तो पाएंगी आपके आस-पास आशाओं, महात्वाकांक्षाओं और अवसरों से भरी एक बिल्कुल नई दुनिया मौजूद है। अपने दायरे को विस्तृत कीजिए। याद रखिए कि आप सिर्फ एक ग्रहणी से बढ़कर और कुछ भी हैं। आपका अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व व अस्तित्व है। यह जीवन आपने फिजूल की झक-झक के लिए नहीं पाया है। आपके जीवन का भी एक खास मकसद है। यह विचार धाराएं आपके सोच को सही व सकारात्मक दिशाएं देगी, तब आप जीने के उद्धेश्य को अधिक बेहतर ढंग सेसमझ सकेगी।
सामाजिक कार्यो में अपनी हिस्सेदारी को रेखांकित करके आप अपने महत्व को समझ सकेंगी। किसी महिला संगठन, क्लब या समाज सेवी-संस्था की सदस्यता ग्रहण कर उसकी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लीजिए। इससे आप बहुत सकून महसूस करेंगी।
इस उम्र में प्रायः महिलाएं अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो जाती हैं। खान-पान और रहन-सहन के प्रति उनकी उदासीनता शरीर को बेडौल बनाने में देर नहीं करती, स्थूलता की शुरूआत प्रारम्भ में तो महसूस नहीं होती, लेकिन धीरे-धीरे मोटापे के कारण रक्तचाप, हांफना, थकावट, दम फूलना, कमजोरी महसूस होना आदि बीमारियां घेर लेती हैं। अतः समय से पूर्व सचेत होना आवश्यक है। अपने जीवन को नियमित व संयमित बनाइए। सुबह की ताजी हवा में टहलने से बेहतर कोई दूसरा व्यायाम नहीं हो सकता। दिन-भर की स्फूर्ति और ताजगी के लिए प्रातःकालीन भ्रमण को अपनी दिनचर्या में शामिल कीजिए। पैंतीस की आयु के बाद खाने में अधिक चिकनाई और देर से हजम होने वाले खाद्य पदार्थो से परहेज करें। अपनी सेहत और सौंदर्य के प्रति जागरूक रहें।
उम्र के साथ परिवार का विघटन स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे सहजता से लें, बच्चे बड़े होकर अपने काम-धंधों में व्यस्त होंगे, लड़कियां विवाह के बाद अपना अलग घर-संसार बसाएंगी। इसमें अनोखा कुछ भी नहीं है। ऐसी स्थितियों के लिए स्वयं को तैयार कीजिए, यही वह अवसर है जब पत्नी पति से और अधिक अंतरंगता स्थापित कर अपने एकाकीपन को भरने के साथ ही प्रौढ़ हो रहे पति की शून्यता को भी अपने आंचल में समेट सकती है। आपके आत्मीयता-भरे अपनेपन को पाकर पति निहाल हो उठेंगे और आपको उनकी छोटी-छोटी खुशियों में एक सर्वथा नया आनंद मिलेगा। अपने जीवन साथी को कुंठाओ के चक्रव्यूह से बाहर निकाल कर सुखों से भरे एक नये संसार में ले जाइए।
बढ़ती उम्र का स्वागत सम्पूर्ण गरिमा के साथ कीजिए। कोई भी उम्र बुरी या भद्दी नहीं होती। हर उम्र का अपना एक अलग रंग और मिजाज होता है। प्रौढ़ावस्था का आरंभ भी उम्र का एक बेहद हसीन और खूबसूरत पड़ाव है। इससें कतराने के बजाए पूरी शिद्दत के साथ इसे जीने की कोशिश कीजिए।