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बच्चा विद्यालय क्यों नहीं जाना चाहता?

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प्रदीप अपने चार वर्षीय पुत्र बबलू को लेकर बहुत परेशान थे। उनकी समस्या यह थी कि बबलू विद्यालय नहीं जाना चाहता था। उन्होंने उसे विद्यालय भेजने के लिए सभी स्तर पर प्रयास कर लिए। प्यार से समझा-बुझाकर, खिलौनों का प्रलोभन देकर, यहां तक कि डांट-डपट और पिटाई सरीखे हथियारों का इस्तेमाल करके भी देख लिया। किन्तु अपेक्षित परिणाम नहीं निकला।
प्रदीप ने अपनी समस्या मुझे बताई। मैंने प्रदीप को सुझाव दिया, फिलहाल आप अपने बेटे पर विद्यालय जाने के लिए दबाव न डालें, उसे प्यार से मानसिक स्तर पर समझाइए तथा धीरे-धीरे उन वजहों का पता लगाने का प्रयास कीजिए, जिनसे उसके बाल-मन में स्कूल के प्रति एक अज्ञात खौफ-सा समा गया है।
प्रदीप ने मेरी राय पर अमल करके उन कारणों की खोज की, तो पाया कि बबलू के विद्यालय में एक अध्यापक अत्यंत क्रोधी स्वभाव के हैं तथा बात-बेबात बच्चों की पिटाई करते रहते हैं। उन्होंने एक-दो बार बबलू को भी पीटा और बबलू के मन में उन अध्यापक महोदय के प्रति एक अनजाना-सा भय समा गया। उसे हर बार लगता था। चाहे उसकी गलती हो या न हो, अमुक अध्यापक उसे जरूर पीटेंगे।
प्रदीप ने व्यक्तिगत रूप से उन अध्यापक महोदय से भेंट कर उन्हें बबलू की परेशानी से अवगत कराया। फिर प्रदीप उन्हें लेकर घर आए और खुद अध्यापक ने प्यार से बबलू को समझाया और आश्वस्त किया कि उसे नहीं पीटा जाएगा। अब बबलू खुशी-खुशी विद्यालय जाता है। वह अध्यापक महोदय भी उसे खासतौर पर प्यास से बतियाते हैं।
यह तो एक मिसाल हुई। अक्सर यह सुनने को मिलता है, ‘क्या बताएं हमारा बच्चा तो कभी खुशी से विद्यालय जाना ही नहीं चाहता है।‘ आजकल आधुनिक समाज में ढाई-तीन साल के बच्चे को विद्यालय में दाखिल कराने की परंपरा-सी चल गयी है। दरअसल यह उम्र पढ़ाई या विद्यालय के कार्य का बोझ उठाने की नहीं है।
इस उम्र में बच्चा अपने घर और आस-पास के परिवेश को समझने तथा नयी-नयी चीजों की पहचान स्थापित करने का प्रयास कर रहा होता है। इस उम्र में उसे स्कूल भेजना एक प्रकार की निर्ममता तो है ही, साथ ही उसकी सेहत की दृष्टि से भी यह अनुचित ही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, तीन-चार साल के बच्चे को लिखना सिखाने से उसकी कोमल आंखों पर अनावश्यक बोझ पड़ता है तथा उसके स्थायी दृष्टि-दोष का शिकार होने की आशंका बनी रहती है। इसके अलावा, उसकी अंगुलियों की मांसपेशियां भी पेंसिल पकड़ने के लिए अनुपयुक्त रहती हैं। मानसिक स्तर पर भी वह लिखने पढ़ने के काबिल नहीं होता है।
सभी विकसित देशों अमेरिका, इंग्लैण्ड, रूस, जर्मनी आदि में छह वर्ष से कम आयु के बच्चों को लिखना नहीं सिखाया जाता, सिर्फ बोलना और अधिक से अधिक अक्षरों की पहचान कराई जाती है।
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यही बच्चो के लिए पर्याप्त भी है। इसके पीछे यह मनोवैज्ञानिक तर्क है कि जब बच्चा ठीक से अक्षरों को पहचानना सीख लेगा, तो छह वर्ष की आयु में वह आसानी से बिना अधिक सिखाये, लिखना भी सीख लेगा। इसलिए बच्चों को कम आयु में विद्यालय में प्रवेश दिलवाना, उनके साथ मानसिक क्रूरता तो है ही, साथ ही उनके शारीरिक विकास में भी ऐसा करना अवरोध पैदा करता है।
उचित उम्र के बच्चे को विद्यालय भेजने से पूर्व अभिभावकों की जिम्मेदारी बहुत नाजुक है। अधिकांश माता-पिता बच्चो को विद्यालय में दाखिल कराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।
विद्यालय में प्रवेश पाकर बच्चा जीवन संग्राम की शुरूआत करता है। अब तक उसे अपने घर में परिवारजनों के बीच रहना होता था, जहां वह अपने को सुरक्षित महसूस करता था। जब बच्चा पहली बार अपने माता-पिता और घर से दूर नितांत अजनबी लोगों और वातावरण के साथ रहने के लिए अपने नन्हें कदम बाहर रखता है, तो उसके बाल-मन में हो रहे अंर्तद्वन्द और उसकी मानसिक स्थिति की कल्पना कीजिए। बच्चा स्वयं को अकेला, असुरक्षित और अजनबियों से घिरा हुआ महसूस न करे, इसके लिए अभिभावकों का दायित्व है कि बच्चे को विद्यालय भेजने से पूर्व उसके मन में विद्यालय जाने के प्रति सहज भाव से रूचि जागृत करें, उसे विद्यालय के नये वातावरण से परिचित कराएं।
इसके लिए जरूरी है कि बच्चे को विद्यालय में दाखिल कराने से पूर्व ही उसे आत्मनिर्भरता की दृष्टि से दिन-भर में एक -दो घंटे अपने से अलग रखें। धीरे-धीरे इस अवधि को बढ़ाएं। इससे यह लाभ होगा कि वह आपके बिना भी खुश होकर समय व्यतीत करने का अभ्यस्त हो जाएगा और उसकी यह आदत उसके विद्यालय जाने के समय उपयोगी सिद्ध होगी। साथ ही, समय-समय पर उसका परिचय अजनबी लोगों से कराते रहिये। उसे मुहल्ले के बच्चों के साथ खेलने-कूदने दें, ताकि वह अन्य लोगों के बीच सामंजस्य स्थापित करने और जीवन की रोजमर्रा की बातों को स्वयं ग्रहण करने में समर्थ हो सकें। विद्यालय अध्यापकों के बारे में बच्चों के दिमाग में कभी भी डर पैदा करने की नासमझी न कीजिए। जैसे अनेक माताएं बच्चों की शरारत से तंग आकर उनसे कहती रहती हैं, ‘तुम अपनी शैतानियों से बाज नही आओगे, तो मैं तुम्हें विद्यालय में भर्ती करवा दूंगी। जब मास्टर जी पिटाई करेंगे तो तुम सारी शैतानी भूल जाओगे।‘ बच्चे के अपरिपक्व व संवेदनशील मस्तिष्क पर इन बातों का बड़ा गहरा और प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वह अनजाने में मन ही मन विद्यालय और मास्टर जी के प्रति एक अज्ञात भय की धारणा बना लेता है और विद्यालय जाने से कतराने लगता है। विद्यालय को वह कोई यातनागृह न समझ बैठे, इसके लिए जरूरी है कि अभिभावक उसके सामने विद्यालय की डरावनी और खौफ पैदा वाली छवि भी प्रस्तुत न करें। इसके सामने विद्यालय को एक आदर्श और आवश्यक संस्था के रूप में प्रस्तुत कीजिए। विद्यालय जाने के शुरूआत के दिनों में अगर बच्चा विद्यालय में अकेला बैठने से घबराता है, तो माताएं उसे यह विश्वास जरूर दिलाएं कि वह विद्यालय में ही है और उसे कक्षा में भेज दें। स्कूल में छुट्टी होने के बाद शुरू के दिनों में आप बच्चे को लेने विद्यालय पहुंचें, तो वह बहुत प्रफुल्लित होगा। विद्यालय से लौटकर आने पर बच्चे को कभी ऐसा महसूस न होने दें कि वह किसी कैद से छूटकर आया है, बल्कि उसे उत्साहित कीजिए कि उसने विद्यालय जाकर बहुत अच्छा काम किया है। उसकी प्रशंसा कीजिए, भविष्य में विद्यालय के कार्य-कलापों में और अधिक रूचि लेने के लिए उसे पे्ररित करें।

अभिभावकों का यह दायित्व है कि अपने बच्चे की पढ़ाई-लिखाई के संबंध में वे नियमित रूप से उसके विद्यालय में जाकर उसके शिक्षकों से मिलते रहें। इससे आपको बच्चे की प्रगति के बारे में, व उसकी समस्याओं के बारे में जानकारी मिलती रहेगी। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में व्यक्ति के पास अपने परिवार और बच्चों के लिए समय का अभाव-सा रहता है। लेकिन अभिभावकों का महत्वपूर्ण दायित्व है कि वे अपने बच्चों के लिए समय निकालकर उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ें। उसके विद्यालय, दोस्तों, अध्यापकों आदि के बारे में रूचि लेकर बात कर यह जानने का प्रयास करें कि वह विद्यालय में किसी चीज से असंतुष्ट तो नहीं है। यदि ऐसा है, तो उसकी समस्या दूर करें।
विद्यालय भेजते समय बच्चों को यथा-संभव साफ-सुथरे कपड़े पहनाइये, साथ ही, उसके बस्ते में सभी आवश्यक वस्तुएं तथा स्केल, पेंसिल, रबर, काॅपी आदि रखना न भूलें। यह भी याद रखें कि स्कूल जाने से पूर्व वह अपना होम-वर्क पूरा कर ले। बच्चे यदि कभी स्कूल न जाने की जिद कर लें, तो सख्ती से काम न लें। साल में तीन-चार दिन स्कूल न जाने से यों भी खास अंतर नहीं पड़ता। बच्चे की सारी समस्याओं का उनके मानसिक स्तर और दृष्टिकोण से देखकर उनका मनोवैज्ञानिक समाधान करने का प्रयास करें।