images 9

कैसा हो आपके शिशु का आहार

images 8

बच्चों को चार या छह माह से पूर्व ठोस आहार देना ठीक नहीं। क्योंकि इससे पूर्व बच्चे चूसने के अंदाज में ही अपनी जीभ घुमाते हैं और निगलने की प्रक्रिया से वे अनभिज्ञ रहते हैं। फिर चार महीने से पहले जीभ पर उनका नियत्रंण भी नहीं आता।
एक और कारण यह भी है कि बच्चे का पाचन-तंत्र इन दिनों तेजी से विकसित होता है। चार महीने से पूर्व यह पाचन-तंत्र भोजन और अन्य बाहरी प्रोटीन के प्रति संवेदनशील होता है। जब बच्चा कुछ बड़ा हो जाता है तो उसमें अधिक प्रतिरोधी क्षमता का विकास हो जाता है। कई बार बहुत जल्दी भोजन की शुरूआत करने से उसको एलर्जी भी हो सकती है। अगर छह महीने के बाद ठोस आहार दिया जाए तो उसमें एलर्जी की संभावना काफी कम हो जाती है।
आप कैसे मालूम करेंगे कि बच्चा ठोस आहार लेने के लिए अब तैयार हो चुका है: जब मां को महसूस होने लगे कि उसका बच्चा भूखा है और अधिक खाने की मांग कर रहा है। वैसे विकास के इस दौर में बच्चे को ज्यादा दूध दीजिए। चार महीने तक दूध पिलाने के बाद डाक्टर की सलाह पर ही उसे ठोस आहार देना शुरू कीजिए।
अगर शुरू में बच्चा भोजन को थूकता है तो समझिये कि वह पूर्ण ठोस आहार लेने को तैयार नहीं है। कई बार कोशिश कीजिए। अगर काफी प्रयासों के बावजूद भी बच्चे को ठोस आहार खिलाने में आप सफल नहीं होतीं तो कुछ सप्ताह के लिए इसे रोक दीजिए।
प्रारंभ में आपको कैसा आहार देना है?: डाॅक्टर से पूछकर ऐसा आहार बच्चे को दीजिए, जिसमें काफी मात्रा में लौह-तत्व हों, क्योंकि छह से नौ महीने से पहले डाॅक्टर विशेष रूप से चावल, दाल संबंधी आहार का ही सुझाव देते हैं। गेहूं से बने आहार बहुत छोटे बच्चे को देना ठीक नहीं, क्योंकि इससे पेट की संवेदनशीलता के कारण कोई समस्या पैदा हो सकती है। बच्चे के प्रारंभिक छह महीने बहुत-ही महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि मस्तिष्क का अधिकतम विकास इसी समय होता है और अगर बच्चा इस समय पेट की गड़बड़ी की किसी बीमारी से त्रस्त है तो इससे उसके दिमाग का विकास भी प्रभावित हो सकता है। यद्यपि ऐसा बहुत कम होता है, फिर भी इस बारे में सावधानी बरतनी बहुत जरूरी है।
बच्चे का प्रारंभिक भोजन कैसा हो?: शुरू में बच्चे को जो ठोस आहार दिया जाये वह दाल के पानी के साथ अच्छी तरह मैश करके, छानकर दें। शुरू में उसे एक चम्मच ही दें। यह मात्रा आपको काफी कम लग सकती है, लेकिन इस बारे में चिंता मत कीजिए, क्योंकि आपके बच्चों को अधिकांश पोषक तत्व दूध से मिल रहे हैं। आहार की शुरूआत तो सिर्फ सिखलाने के लिए ही दी जा रही है। इसीलिए बच्चे का भोजन उसकी बोतल में भरने की बजाय उसे चम्मच से ही खिलाईये। खाने का अर्थ सिर्फ इतना ही नहीं है कि भोजन को मुख में रख लिया जाये। इससे उनके अंदर सीखने की क्रिया का विकास भी होता है। अलग रंग, अलग स्वाद, तथा अलग गंध के भोजन को चम्मच से उठाना और उसे मुख तक ले जाने में बच्चों को काफी कुछ सीखने को मिलता है।
शुरू के हलके भोजन के बाद बच्चे को फलों का रस, सब्जियों का सूप भी दिया जा सकता है। थोड़े-थोड़े दिनों बाद बच्चों के भोजन में बदलाव करें तो एक बार में उसे एक ही तरह का भोजन दें ताकि अगर कोई प्रतिक्रिया हो तो आप पता लगा सकें कि किस भोजन के कारण ऐसा हुआ?
बच्चों में एलर्जी के बारे में: बच्चों में वास्तविक एलर्जी तो बहुत कम होती है। जिसे हम एलर्जी कहते हैं वह पाचन तंत्र की अपरिपक्वता के कारण या संयोग से भी हो सकती है।एलर्जी की समस्या अधिकांश छोटे बच्चों को ही होती है।
बच्चे को बहुत छोटी उम्र से अंडा मत दीजिए। ‘हाई फाइबर फूड‘ भी बच्चे को देना उचित नहीं, जब तक कि वह एक साल का न हो जाये। एक साल से छोटे बच्चे को शहद देना भी ठीक नहीं। क्योंकि इसमें उपस्थित तत्व बच्चा पचा नहीं पाता। बच्चे की छोटी अवस्था में प्रतिरोधी क्षमता ठीक से विकसित नहीं होती। जहां तक संभव हो, बच्चे को ताजा भोजन ही दीजिए। डिब्बा बंद भोजन का प्रयोग तब करें, जब कोई और विकल्प न हो। बच्चों को भूलकर भी मंूगफली मत दीजिए, क्योंकि इससे उनका गला फंस सकता है।
बच्चे के संतुलित आहार का फैसला कैसे करें?ः जबकि बच्चा अधिकांश पोषक-तत्व दूध से ले रहा है तो उसके संतुलित भोजन के बारे में चिंतित मत होइये। बच्चे को ठोस आहार देने का उद्देेश्य है उसमें नया स्वाद, पहचान तथा गंध का विकास करना। फिर भी बच्चे को बहुत ज्यादा नमक भोजन में मत दीजिए। भोजन बनाने में वसा का प्रयोग कम करें। भोजन में अतिरिक्त शक्कर और नमक मत डालिए। जहां तक सम्भव हो बच्चे को अलग-अलग तरह का भोजन खिलाइये।
किन बातों की ओर ध्यान देना है?: आप लगातार इस बात पर ध्यान दीजिए कि बच्चे का वजन बढ़ रहा है या नहीं। नियमित रूप से स्वास्थ्य केन्द्र में बच्चे का वजन लीजिए। बच्चे को खिलाते समय इस बात का ध्यान रखिए कि जो आपने खिलाया है वह उसने अच्छी तरह खाया है। कहीं उसके गले में फंसा तो नहीं है। बच्चे के लिए भोजन तैयार करने से पहले सफाई का विशेष ध्यान रखिए। भोजन पूर्ण रूप से कीटाणु रहित होना चाहिए क्योंकि एक साल से पहले बच्चों का पाचन-तंत्र पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता है। अगर भोजन में सफाई पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
दाढ़ के दांतों के विकास के लिए यह महत्वपूर्ण है कि ठोस भोजन के प्रति बच्चे में रूचि हो। आठवें महीने में बच्चे चबाना शुरू कर देते हैं। अतः आप बच्चे को मूली, गाजर पकड़ा सकती हैं। अगर बच्चा चबाना नहीं सीखता तो उसे बोलने में परेशानी हो सकती है या वह देर से बोलना शुरू करेगा।
अगर बच्चे ज्यादा मात्रा में फलों का रस पी लेते हैं तो उनका पेट भर जाता है और फिर वे ठोस आहार लेना पसंद नहीं करते हंै। इस कारण उन्हें ठोस आहार से मिलने वाले पोषक तत्व नहीं मिल पाते।
बच्चे आलसी स्वभाव के होते हैं। खाने से ज्यादा उन्हें पीने में सुविधा होती है। बहुत ज्यादा फलों का रस पेट खराब कर सकता है। छोटे बच्चों को फलों के रस में पानी मिलाकर ही पिलाइए, इससे उनकी कैलोरी में कटौती हो जाएगी। बच्चों को ताजे फलों का रस ही निकालकर दीजिए।
क्या बच्चों पर खाने के लिए जोर डालना ठीक है?: बच्चे पर भोजन के लिए जोर मत डालिए। बच्चे अपनी भोजन संबंधी आवश्यकता को आपसे ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं। अगर आप द्वारा खिलाये भोजन को बच्चा नहीं खा रहा है तो यह सोचकर परेशान मत होइये कि आपका बच्चा भूखा है। आपके बच्चे की भूख को दूध शांत कर रहा है। आपके खिलाने का उद्देश्य है कि बच्चा स्वाद पहचाने। अगर बच्चा खाना थूकता है तो एकदम से उसे खिलाना बंद मत करिए। उसके स्वाद का विकास होने में कुछ समय लगेगा। एक मुख्य बात याद रखने योग्य यह है कि भोजन का समय मां और बच्चे दोनो के लिए ही खुशी का अवसर होना चाहिए। उसमें जोर-जबरदस्ती न करें, जिससे बच्चा भयभीत रहे।