pexels dewesh wadatkar 3923064 1 scaled

अनूटा न्याय

pexels dewesh wadatkar 3923064

बात जरा पुराने जमाने की है। एक बार दो व्यक्ति तीर्थयात्रा के लिए जा रहे
थे। रास्ते में सांझ हो गई। उन्हें भूख लग आई थी, इसलिए वह एक पेड़ की छांव में
बैठ गये। उन लोगों ने अपना-अपना खाना निकाल लिया। एक के पास तीन रोटियां
थी और दूसरे के पास पांच। वह भोजन शुरू करने ही वाले थे कि एक और व्यक्ति
वहां आ गया। दोनों ने उससे भी खाना खाने को कहा। वह राजी हो गया। तीनों ने
साथ मिलकर खाना खाया। भोजन खत्म होने पर उस व्यक्ति ने खुश होकर उन्हें
आठ रूपये दिये और कहा – ‘इन रूपयों को तुम आपस में बांट लेना।’ वह व्यक्ति
रूपये देकर चला गया।

इधर उन दोनों यात्रियों में पैसे को लेकर झगड़ा हो गया। जिस यात्री की
पांच रोटियां थी, वह चाहता था कि उसे आठ में से पांच रूपये मिले, जबकि तीन
रोटियों वाला यात्री आधे यानी चार रूपये चाहता था। आखिर जब वह आपस में कोई
फैसला नहीं कर सके तो दोनों ने उस राज्य के राजा के पास चलने का निश्चय
किया।

वहां का राजा अपने अनोखे और निष्पक्ष न्याय के लिए प्रसिद्ध था। राजा ने
सारी बात सुनने के बाद पूछा – ‘तीसरे यात्री ने कितनी रोटियां खाई?”

दोनों ने जवाब दिया – “यह तो नहीं बताया जा सकता क्योंकि हमने साथ
खाना खाया था और प्रत्येक रोटी के बराबर तीन टुकड़े कर लिये थे।”

राजा ने कहा – “ इसका मतलब यह हुआ कि तुम सबने बराबर बराबर
रोटियां खाईं?”

दोनों ने सहमत होते हुए कहा – “हां।”

तब राजा ने कहा – “प्रत्येक रोटी के तीन-तीन टुकड़े किये गये, इस तरह
कुल आठ रोटियों के चौबीस टुकड़े हुए है न?”

कुछ देर सोच विचार करने के बाद दोनों यात्रियों ने हामी भर दी।

तब राजा ने कहा – ” इससे यह बात साफ जाहिर है कि तीनों ने आठ-आठ
टुकड़े खाये। तीन रोटियों वाले यात्री ने अपनी रोटियों के कुल नौ टुकड़ों में से
कवल एक टुकड़ा उस यात्री को दिया, जबकि पांच रोटियों वाले व्यक्ति ने अपने
पन्द्रह टुकड़ों में से सात टुकड़े उस यात्री को दिये। इस प्रकार पांच रोटियों वाले
यात्री ने अधिक त्याग किया। आठ रूपयों में से सात रूपये पांच रोटियों वाले व्यक्ति
को मिलने चाहिए, जबकि तीन रोटियों वाले यात्री को केवल एक रूपया मिलना
चाहिए।

तीन रोटियों वाला यात्री इस तर्कपूर्ण न्याय का विरोध न कर सका और
चुपचाप एक रूपया लेकर टूटे मन, थके मन चल दिया।