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दिलचस्प मुकदमे पशु-पक्षियों पर | Lawsuit animal birds Information in hindi

दुनिया की न्याय प्रणाली के इतिहास में कई रोचक और हैरतअंगेज किस्से
भरे पड़े हैं। सभ्यता के कमिक विकास के साथ जैसे-जैसे आदमी शिक्षित होता गया,
ही न्याय का नैसर्गिक स्वरूप भौतिकता की ओर झुकने लगा। आइये हम आपको दिलचस्प ऐसे मुकदमे के बारे में जानकारी देते है !

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Lawsuit animal birds Information in hindi

पशु पक्षी भी दंड के अधिकारी

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पशु पक्षी भी दंड के अधिकारी

कानून का उल्लंघन करने वालों पर युकदमा चलाकर उसे दंडित करने की
वैधानिक व्यवस्था आानव-समाज के पास उपलब्ध है, लेकिन यदि मुजर्मि आदमी न
होकर पशु-पक्षी हो तो? बाइबिल के अनुसार, अपराध करने पर जानवर भी दंड के
भागी हैं। इक्जाडस ने लिखा है, ‘यदि बैल किसी व्यक्ति की जान लेने के इरादे से
सींग मारे तो उसे पत्थरों से मार डालना चाहिए ।’

मनुष्य ने अपने न्‍्याय-द्षेत्र को विस्तृत करते हुए कई बार जानवरों पर मुकदमे
चलाए हैं, बकायदा सुनवाई के बाद उन्हें सजा भी दी है। इन दिलचस्प मुकदमों का
रोचक विवरण इस आलेख का विषय है।

इल्लियों पर मुकदमा

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इल्लियों पर मुकदमा

सन 1659 में इटली की एक अदालत में इल्लियों पर अनाधिकृत प्रवेश और को नुकसान पहुंचाने का इल्जाम लगाते डैए मुकदमा दायर किया गया। अदालत ने बकायदा पांच जिलों की इल्लियों के नाम सम्मन जारी किए। सम्मन की प्रतियां पेंडों पर चस्पा की गईं। इल्लियों से अपनी सफाई में कुछ कहने हेतु तारीख मुकर्रर की गई । इल्लियों को अदालत में नहीं आना था, सो नहीं आईं। उनके खिलाफ एक तरफा कार्यवाही अमल में लाई जाकर आदेश दिया गया कि वह मनुष्यों
की सम्पत्ति को चुकसान पहुंचाने से बाज आएं।

चूहों के खिलाफ मुक़दमा

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चूहों के खिलाफ मुक़दमा

चूहों के खिलाफ सन 1519 में एक किसान ने अपनी फसल को भारी क्षति पहुंचाने का दावा किया। चूहों की ओर से अदालत द्वारा एक वकील की नियुक्ति की गई, जिसने अपनी बहस के दौरान स्वीकार किया कि चूहों ने किसान की फसल नष्ट अह सत्य है किंतु साथ ही चूहों ने उसकी जमीन में असंख्य छेद बनाकर उसकी जमीन को अधिक उपजाऊ बनाने में भी मदद की। अतएव चूहों के साथ उदार रूख अपनाया जाए।

न्यायालय ने चूहों की ओर से प्रस्तुत तर्कों से असहमत होते हुए वादी किसान के खेत से चूहों के निष्कासन की डिकी पारित की। साथ ही न्यायालय ने आदेश दिया कि निष्कासन के समय चूहों की सुरक्षा का समुचित ध्यान रखा जाए। गर्भवती चूहिया के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें एक माह की अवधि तक उसी जगह रहने की मोहलत दी गयी।

मुर्गी को जिंदा जलाये जाने की सजा

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मुर्गी को जिंदा जलाये जाने की सजा

सन 1947 में बेसल के न्यायालय में एक विचित्र मुकदमा पेश किया गया। यह
मुकदमा एक मुर्गी के खिलाफ था तथा इसमें उस पर बांझ होने व अंडे नहीं देने का
इल्जाम आयद किया गया था। पूरी गंभीरता के साथ मुकदमे की सुनवाई करने बाद
न्यायाधीश महोदय ने ‘अपराध’ को संदेह से परे प्रमाणित पाया और सजा के तौर पर
अपराधी मुर्गी को जिंदा जला दिए जाने का आदेश दिया।

सूअर को सजा

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सूअर को सजा

यूरोप के सेवाइनी शहर की अदालत में सन 1547 ई0 में एक मादा सूअर और
उसके छह बच्चों को एक शिशु की हत्या के आरोप में पेश किया गया। अभियुक्तों
की ओर से उनके वकीलों ने जोरदार पैरवी की, जिसके परिणाम स्वरूप अदालत ने
छह बच्चों को बाइज्जत बरी कर दिया। सिर्फ उनकी मां मादा सूअर को दोषी
मानकर सजा सुनाई गई।

किंतु तीन सप्ताह बाद ही सूअर के बच्चों के मालिक ने
उन्हें दुबारा अदालत में पेश करते हुए निवेदन किया कि वह इन बच्चों के लिए
भविष्य में अच्छे व्यवहार का आश्वासन नहीं दे सकता क्‍योंकि अपराध-प्रवृति इन्हें
अपनी मां से विरासत में मिली है। इस पर न्यायालय ने इन बच्चों को ता जिंदगी
पुलिस हिरासत में रखने का आदेश दिया।

चूहों को बिल्लियों से खतरा

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चूहों को बिल्लियों से खतरा

बार्घी लोप्यू चैसेनी अपने समय में फ्रंस का एक विख्यात वकील था। सन
1551में चूहों के खिलाफ जौ की फसल नष्ट कर देने का आरोप लगाते हुए मुकदमा
दाखिल किया गया। चूहे अदालत में नहीं आए। उनकी ओर से तर्क पेश करते हुए
बार्थी लोप्यू ने दलील दी कि सम्मन गैर-कानूनी है, जिले के समस्त चूहों के नाम
सम्मन जारी किया जाना चाहिए था। अदालत ने दलील मंजूर करते हुए नए सम्मन
जारी किए।

अब बार्थी लोप्यू ने चूहों के हक में एक नया कानूनी नुक्ता निकाला।
अपनी बहस के दौरान उसने तर्क दिया कि चूंकि वादी-पक्ष द्वारा नियुक्त बिल्लियां
उनके मुवक्किल चूहों को आतंकित कर रही हैं। अतः अदालत इस बात की पक्की
गारंटी दे कि वे बिल्लियां अदालत के मार्ग में चूहों पर हमला नहीं करेंगे, ऐसी
व्यवस्था होने पर चूहे अदालत में हाजिर हो सकते हैं। अदालत भला यह गांरटी कैसे
दे सकती थी? अंततः मुकदमा खारिज हो गया। इस मुकदमें ने बार्थी लोप्यू को बहुत
शोहरत दिलावाई।

दीमक पर भी चला मुकदमा

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दीमक पर भी चला मुकदमा

करीब नब्बे साल पहले ब्राजील के परान्हों नामक जगह के साधुओं ने अदालत
में दरख्वास्त की कि दीमकें उनके भोजन को हजम कर जाती हैं, अतः उन्हें सजा दी
जावे। दीमकों के नाम सम्मन जारी हुए। उनकी ओर से वकील की नियुक्ति हुई।
उनके वकील ने जोरदार बहस करते हुए कहा कि धरती पर असली हक दीमकों का
है, उनके नैसर्गिक कार्य में व्यवधान डालना साधुओं को शोभा नहीं देता।

लम्बे समय तक तर्क-वितर्क सुनने के बाद न्यायाधीश सुपाधा ने निर्णय दिया। फैसला
अभियुक्तगण दीमकों की बाबी के पास जाकर सुनौया गया, जिसमें दोनों पक्षों को
एक दूसरे से सद्व्यवहार करने का परामर्श देते हुए कहा गया था कि दीमकें साधुओं
को न सताएं और न साधु दीमकों को हैरान करें।

पशुओं पर मुकदमे मनोरंजन का क्रूरतम रूप

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पशुओं पर मुकदमे मनोरंजन का क्रूरतम रूप

जानवरों पर चलाए जाने वाले ये मुकदमे अत्यधिक खर्चीले और समय बिगाड़ने
वाले होते थे। जानवरों पर मुकदमें चलाए जाने का कोई तर्कसंगत कारण नजर नहीं
आता। इन्हें महज मनोरंजन के लिए चलाए जाने वाले मुकदमे माना जाए तो कहना
होगा कि सचमुच यह मनोरंजन का कूरतम रूप था।