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ऐसे शुरू हुआ: अमराईयों का चलन

(aise shuroo hua: amaraeeyon ka chalan)
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पुराने समय की बात है। आमनाथ नामक एक महासिद्ध थे। वे अपनी शिष्यमंडली के साथ इधर-उधर घूमा करते थे। किसी एक जगह काफी समय तक ठहरते नहीं थे। भिक्षा मांग कर खाते और योगाभ्यास करते थे।
एक बार घूमते-घूमते वे सिरमौर राज्य के नाहन नगर में जा पहुंचे। स्नान-ध्यान के बाद उन्होंने अपने एक शिष्य को आदेश दिया कि वह राजा के यहां से भिक्षा मांग लाये। साथ ही शिष्य को उन्होंने विशेष रूप से यह भी समझाया कि वह भोजन सामग्री के साथ आम का अचार लाना न भूले।
राजमहल में पहुंच कर शिष्य ने आवाज लगायी। राजभंडारी बाहर आया। साधु को दरवाजे पर आया देख कर उसने प्रमाण किया और उसके बाद उसने उसे पर्याप्त भोजन सामग्री प्रदान की। किंतु शिष्य ने जब आम के अचार की मांग की तो राजभंडारी ने अपनी असमर्थता प्रकट की।
दरअसल कुछ वर्षो से सिरमौर में आम की फसल अच्छी नहीं हो रही थी। सर्वत्र आम का अकाल पड़ गया था। कुछ धनी-मानी लोग ही आम का अचार डालने में समर्थ थे, क्योंकि दूर-दराज से मंहगे आम मंगाने की हैसियत सिर्फ उन्हीं की थी।
आम के अचार को ले कर राज-भंडारी और शिष्य की बात अभी चल ही रही थी कि उधर से राजा आ निकले। जब उन्हें पता चला कि इन दिनों राजधानी में महासिद्ध आमनाथ जी अपने शिष्यों समेत ठहरे हुए हैं और भोजन के साथ आम का अचार चाहते हैं, तो उन्होंने राज भंडारी को संकेत दिया कि साधुओं की इच्छा पूरी कर दी जाये।
शिष्य, भोजन सामग्री के साथ आम का अचार ले कर पहुंचा। गुरू आमनाथ जी बहुत खुश हुए। सबने मिल कर प्रेम से भोजन किया। उस दिन से आम का अचार भिक्षा का एक अनिवार्य अंग बन गया।
इसी तरह चार दिन बीत गये। पांचवे दिन शिष्य, भिक्षा के लिए जब पहुंचा, तो राजभंडारी ने आम का अचार देने से मना कर दिया। शिष्य को यह अच्छा नहीं लगा। फिर भी वह विनम्र भाव से आम के अचार के लिए आग्रह करता रहा। राजभंडारी ने इस बार भी मना कर दिया।
बात राजा के कानों तक पहंुची। राजा तत्काल वहां आ पहुंचे और शिष्य को धमकाते हुए बोले कि अपने गुरू से जा कर कहना कि रोज-रोज आम का अचार नहीं मिलेगा। आम का अचार यदि इतना ही अच्छा लगता है, तो क्यों नहीं कहीं अमराई लगा कर बैठ जाते? निठल्ले घूमते रहने से क्या फायदा?
शिष्य को राजा की बात बुरी तो लगी, मगर उसने कुछ कहा नहीं और अपने डेरे पर लौट आया। भोजन के समय जब आम का अचार नहीं मिला, तो गुरू ने शिष्य से इसका कारण पूछा। इस पर शिष्य ने राजा की नाराजगी साफ-साफ शब्दों में बता दी। सुन कर क्षण भर के लिए तो योगी आमनाथ जी भौचक रह गये। फिर वे यह सोच कर संतुष्ट हुए कि राजा ठीक ही कहते हैं। निठल्ले रह कर किसी इच्छा की पूर्ति नहीं की जा सकती।
गुरू ने उस दिन से यह नियम बना लिया कि अब वे किसी एक जगह अधिक ठहरेंगे तो नहीं, मगर जहां-जहां भी जायेंगे, वहां-वहां आम के अधिक-से-अधिक पेड़ जरूर लगायेंगे
कहा जाता है कि भारत में अमराइयों का चलन तभी से चला आ रहा है।