धर्मशालाएं

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धर्मशालाएं सैंकड़ों वर्षों गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा का अंग

धर्मशालाएं सैंकड़ों वर्षों से हमारी समृद्ध एवं गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा का अंग रही हैं। प्राचीन काल में धर्मशालाएं पर्यटकों के ठहरने का एक मात्र स्थान हुआ करती थीं। भारत में धर्मशाला की ऐतिहासिक परम्परा काफी पुरानी है। उस युग में इनका निर्माण सम्राटों द्वारा करवाया जाता था। पहले जब आवागमन के साधन सुलभ नहीं थे, यात्रियों के समूह लंबी-लंबी यात्राओं पर निकलते थे।

इनकी यात्रा की अवधि महीनों से लेकर सालों तक होती थी। अपनी इस लंबी यात्रा के दौरान धर्मशालाएं ही उनके लिए सर्वाधिक सुविधाजनक और सुरक्षित शरण-स्थल हुआ करती थीं। इन धर्मशालाओं का प्रबंध सरकारी स्तर पर किया जाता था एवम यात्रियों को नाम मात्र के शुल्क पर सभी सुविधाएं करवाई जाती थीं। भारत की इस अभिनवसंस्था को उस जमाने में विश्व-भर में बहुत प्रसिद्ध हुई थी । भारत में शासकीय स्तर पर धर्मशाला परम्परा ब्रिटिश शासन की शुरूआत तक जारी रही।

इसके पश्चात धर्मशालाओं के निर्माण, रख-रखाव और व्यवस्थापन का कार्य वैयक्तिक और सामाजिक होता गया। पिछले दो सौ सालों से धर्मशालाओं के निर्माण में धनाढूय व्यापारी वर्ग ही सबसे प्रमुख है। इसके अतिरिक्त विभिन्नओ जातियों के संगठन भी अपने स्तर पर धर्मशालाओं का निर्माण करवाते हैं तथा उनकी व्यवस्था आदि की जिम्मेदारी संभालते हैं।विगत कुछ वर्षों से धर्मशालाएं अपनी समूची समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा के बावजूद मुल्क की आम जिंदगी से अपनी भूमिका खोती जा रही हैं।

पतन के कगार पर खड़ी – धर्मशालाएं

आज धर्मशालाओं की स्थिति देखते हुए ऐसा महसूस होता है कि जन-जीवन की यह महत्वपूर्ण संस्था अपने पतन की कगार पर खड़ी है। कभी कभी भय लगता है कि कहीं धर्मशालाएं भी अन्य सांस्कृतिक धरोहरों की भांति इतिहास की वस्तु बन कर न जाएं।धर्मशालाओं के अस्तित्व पर सबसे बड़ा हमला हाल ही के वर्षों में विकसित हुई ‘होटल संस्कृति’ की ओर से हुआ है।

इस पांच सितारा संस्कृति ने आज न केवल आवासीय व्यवस्था को आघात पहुंचाया है, बल्कि यह धर्मशाला जैसी मूलभूत सुविधा को भी पूरी तरह ध्वस्त करने पर आमादा है। होटल की यह अभिजात्य संस्कृति इतनी अधिक विकसित हो चुकी है कि उसके मुकाबले सात्विक, सस्ती तथा औसत सुविधाएं उपलब्ध कराने वाली धर्मशालाएं अपना आकर्षण और अस्मिता खोती जा रही हैं।

दरअसल आज होटल अपने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराने को तत्पर रहते हैं।टेलीफोन, टी0वी0० तरण ताल से लेकर कालगर्ल तक सुविधा, भव्य वातावरण, मनमोहक सेवा व्यवस्था, मन पसंद भोजन आदि ऐसी आकर्षक सुविधाएं हैं, जो व्यक्ति अपनी आर्थिक सीमाओं के परे जाकर भी प्राप्त करने को लालायित रहता है, दूसरी तरफ आर्थिक दृष्टिकोण से लाभदायक होने के बावजूद व्यक्ति धर्मशालाओं के नीरस, और दमघोंटू वातावरण से दू रहना पसंद करता है।आज देश भर में अधिकांश धर्मशालाएं जर्जर और खस्ता स्थिति में हैं।

पैंतालीस हजार धर्मशालाओं में से तीन चौथाई से ज्यादा खस्ता हालत में

देश की लगभग पैंतालीस हजार धर्मशालाओं में से तीन चौथाई से ज्यादा खस्ता हालत में हैं, इनमें से तो कई तो किसी भी समय गिर पड़ने की स्थिति में हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक 70 प्रतिशत धर्मशालाओं में न तो पर्याप्त प्रकाश व पेयजल का प्रबंध है और न बिजली की समुचित व्यवस्था जहां तक व्यवस्था का प्रश्न है, स्थिति सचमुच दयनीय है

धर्मशालाओं की वर्तमानस्थिति के लिए कई कारण उत्तरदायी हैं। देश की अधिकांश धर्मशालाओं का निर्माण सेठों द्वारा करवाया गया है, इसलिए धर्मशालाओं का स्तर सेठों के आर्थिक उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है। प्रायः जिन व्यक्तियों को धर्मशाला के प्रबंधन और रख-रखाव के लिए नियुक्त किया जाता है, वही धर्मशाला का इस्तेमाल अपने निजी लाभ के लिए करना शुरू कर देते हैं, ऐसी स्थिति में धर्मशालाओं की यात्रियों के लिए उपयोगिता कम हो जाती है।

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि धर्मशालाएं चूंकि लाभ कमाने के लिए नहीं बनाई जाती। अतः इन पर किया खर्च प्रायः अनुत्पादक खर्च माना जाता है। इस मानसिकता के कारण ज्यादातर व्यक्ति धर्मशाला के विकास में पैसा लगाना पसंद नहीं करते। परिणाम स्वरूप वर्षों तक रख रखाव व मरम्मत के अभाव में धर्मशाला भवन जर्जर होते जाते हैं।प्रबंधन व्यवस्था की खामियां भी धर्मशाला की उपेक्षा के लिए उत्तरदायी हैं। आमतौर पर धर्मशाला के निर्माता का कोई विश्वासपात्र व्यक्ति ही, धर्मशाला के मैनेजर की हैसियत से सारी व्यवस्था देखता है। चूंकि वह धर्मशाला का सर्वेसर्वा होता है।

अत: वह अपनी सुविधा और मनमाने ढंग से धर्मशाला की सारी व्यवस्था चलाता है, उसके लिए यात्रियों की सुविधा का कोई मूल्य नहीं होता।यह बात नहीं है कि धर्मशालाओं की उपयोगिता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। अब भी तकरीबन हर शहर में धर्मशालाएं आपको भरी हुई मिलेंगी। मुख्यतया गरीब तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिए धर्मशालाएं अभी भी ठहरने के सर्वाधिक उपयुक्त साधन के रूप में मानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त मध्यमवर्गीय व्यापारी, सेल्समेन, एजेन्ट्स आदि भी धर्मशालाओं का इस्तेमाल करते हैं|

धर्मशालाओं में कमरा आवंटित करने की प्रक्रिया

धर्मशालाओं में ठहरने की द्विआयामी व्यवस्था होती है। प्रथमत: आपको एक कमरा आवंटित किया जा सकता है। यदि कमरा उपलब्ध न हो अथवा आप कमरा न लेना चाहें तो आपको नाम-मात्र के शुल्क पर एक अलमारी दे दी जाती है तथा आपके सोने की व्यवस्था बरामदे में की जाती है। धर्मशालाओं में आपको होटलों की तरह जब चाहे आने जाने की सुविधा नहीं होती यदि आप निश्चित समय के बाद वापस लौट कर आते हैं. तो आपको धर्मशाला में प्रवेश देना या न देना मैंनेजर की ‘कृपा-दृष्टि’ पर निर्भर करेगा।

इसी प्रकार प्रत्येक धर्मशाला के नियमों का पालन यात्री का कर्तव्य होता है धर्मशालाओं की स्थिति सुधारने और इनके विकास हेतु शासकीय स्तर पर कई बार विचार विमर्श किया गया, लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं निकले। सन 1997 में पर्यटन विभाग ने धर्मशालाओं के गिरते स्तर पर एक व्यापक सर्वेक्षण करवाया था। जिसके परिणाम बेहद निराशाजनक निकले।

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“आवास विकास समिति” नाम से एक स्वायत्त संस्था का गठन

सन 1979 में केंद्र सरकार ने इस विषय पर विचार हेतु एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया, उस समिति ने व्यापक जांच पड़ताल के बाद समस्तराज्य सरकारों को एक परिपत्र जारी कर धर्मशालाओं के विकास में सकियता से कार्य करने के निर्देश दिए थे किंतु राज्य सरकारों द्वारा इस ओर कोई दिलचस्पी जाहिर नहीं की गई। उसी दौरान “आवास विकास समिति” नामक से एक स्वायत्त संस्था का गठन किया गया, जिसने बारह पर्यटन स्थलों पर 36 धर्मशालाओं के निर्माण का सुझाव दिया था। “यात्रिक” नाम की इन धर्मशालाओं की श्रृंखला में पहली धर्मशाला दिल्ली बननी थी।

लेकिन अब तक यह योजना मूर्त रूप नहीं ले सकी है। वैसे भी सरकारी स्तर पर धर्मशालाओं के विकास और पुनरूत्थान की बात करना निरी आशावादिता ही होगी क्योंकि यह सरकारी प्राथमिकताओं में बहुत नीचे है।वर्तमान परिस्थितियों में धर्मशालाओं की शताब्दियों पुरानी शानदार सांस्कृतिक परम्परा खतरे में दिखाई देती है। जब तक स्वयं सेवी संगठनों तथा अन्य सामाजिक संस्थाओं द्वारा इस दिशा में व्यापक सार्थक प्रयास नहीं किए जाते, तब तक यह कहना मुश्किल होगा कि धर्मशालाएं निकट भविष्य में अपनी खोई हुई पहचान व अस्मिता को पुन: प्राप्त कर सकेंगी।

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https://www.youtube.com/watch?v=tMLN1vkqle8