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police in India | भारत में पुलिस

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पुलिस का होना आवश्यक

कोई भी शासन प्रणाली पुलिस के बिना नहीं चल सकती। महात्मा गांधी भी यह मानते थे कि अहिंसक राज्य में भी पुलिस का होना आवश्यक है। पुलिस विभिन्‍न स्वरूपों में हर युग और हर काल खण्ड में विद्यमान रही है। चाहे मौर्यकाल हो या मध्यकालीन सल्तनतें अथवा वर्तमान युग का आधुनिक और जटिल प्रशासन, पुलिस की आवश्यकता और उसके आचरण के कारण पैदा होने वाली समस्याएं हर युग में महसूस की जाती रही हैं।

भारत में पुलिस संस्था की स्थापना के चालीस वर्ष के बाद उसके काम-काज के तौर तरीकों और उसकी उपयोगिता की समीक्षा के लिए एक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने सन्‌ 1903 में अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष दिया था कि भारतीय पुलिस को आम जनता सामान्यतः अपना शत्रु समझती है। आज एक सौ पच्चीस वर्षों बाद भी इस तस्वीर में कोई खास फर्क नहीं आया है।

आम जनता और पुलिस के बीच विश्वास के रिश्ते क्यों नही पनपे ?

एक सदी से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी आज तक आम जनता और पुलिस के बीच विश्वास के रिश्ते क्यों नही पनप पाए ? अन्य पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी जनता के मन में पुलिस को अपना दोस्त और रक्षक समझने की भावना पैदा क्‍यों नहीं हो पाई ?

लोग पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने या संकट में उससे मदद मांगने में हिचकिचाते क्यों हैं ? देश के विभिन्‍न भागों में आए दिन पुलिस अत्याचार के किस्से क्यों सामने आते हैं ? क्या सचमुच सारा दोष पुलिस का है ? क्‍या हमारे कानून और पुलिस को मिली सुविधाएं पर्याप्त हैं? इस ज्वलंत सामाजिक और प्रशासनिक समस्या का हल आखिर क्या है ?

आजादी से पहले पुलिस जनता नहीं, बल्कि सरकार की हमदर्द

पुलिस से जुड़े ऐसे अनेक सवाल हैं, जो आज हमारी पूरी व्यवस्था के सामने मुंह बाए खड़े है। सबसे पहला और अहम्‌ सवाल है – पुलिस और जनता के बीच बढ़ती जा रही अविश्वास की भावना का। दरअसल यह प्रश्न पुलिस की छवि से जुड़ा हुआ है।

आजादी से पहले पुलिस संस्था पूर्ण रूप से अंग्रेजी साम्राज्य के हितों की पोषक थीं। उस समय पुलिस का काम अंग्रेज राज की सुरक्षा, राजस्व वसूली और जन आन्दोलनों को बर्बरतापूर्वक कुचलना हुआ करता था।

यही कारण है कि आजादी से पहले पुलिस को जनता का नहीं, बल्कि सरकार का  हमदर्द माना जाता था। उस समय पुलिस के प्रति जो अविश्वास की भावना थी, उसकी झलक आज भी आम  जनता के मन में दिखाई देती है।

आजादी के बाद भी पुलिस की छवि नहीं बदली

विडम्बना तो यह है कि आजादी के बाद जनता के मन से पुलिस की इस छवि को बदलने के लिए न तो प्रशासन ने कोई पहल की और न ही पुलिस ने। ब्रिटिश हुकूमत की ही तरह देशी हुक्मरानों ने भी उसकी पुरानी मानसिकता के तहत पुलिस का इस्तेमाल महज अपनी सुरक्षा और अपनी निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया। शांति स्थापना और अपराध नियंत्रण जैसे कार्य पुलिस की प्राथमिकताओं में काफी नीचे ही बने रहे।

आजादी हासिल करने के 75 बरस के बाद आज भी पुलिस को कभी भी गंभीरतापूर्वक यह नहीं समझाया गया कि वह  जनता की स्वामी अथवा शासक नहीं, बल्कि सेवक है। उसका काम जनता को परेशान करना नहीं, बल्कि उसकी हिफाजत और संकट के समय उसकी सहायता करना है।

पुलिस से ही उच्च नैतिक आदर्शो की अपेक्षा क्यों ?

वैसे यह भी हकीकत है कि समाज में जब हर कहीं आदर्श जीवन मूल्यों का पतन हो रहा हो तो आप पुलिस से ही उच्च नैतिक आदर्शो की अपेक्षा कैसे कर सकते है ? पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो के पूर्व  निदेशक सुब्रमण्यम का कहना है कि पुलिस में सुयोग्य नेतृत्व का अभाव और गिरते सामाजिक मूल्यों का प्रभाव ही पुलिस संस्था के पतनोन्मुखी होने के प्रमुख कारण हैं।

पुलिस के कर्मचारियों को जिस वातावरण और जिस प्रकार के लोगों के बीच रहना पड़ता है, वह न तो पवित्र है और न ही आदर्श। हर समय उनका संपर्क चोरों, बदमाशों और शातिर  अपराधियों से ही रहता है और इसका प्रभाव पुलिस जनों के आचरण पर पड़े बिना नहीं रह सकता है। जीवन के हर क्षेत्र में गिरावट और अवमूल्यन का दौर जारी है और पुलिस भी इसका अपवाद नहीं है।

समाचार पत्रों में आए दिन पुलिस में फैले भ्रष्टाचार और पुलिसकर्मियों की गलत हरकतों की खबरे बड़ी सुर्खियों के साथ छपती हैं। इससे जनता के मन में पुलिस की छवि और भी बिगड़ती है। दरअसल आजकल अखबारों में सनसनीखेज खबरों के प्रकाशन को प्राथमिकता दी जाती हैं। उन खबरों से समाज पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के बारे में कोई नहीं सोचता।

पुलिस द्धारा किसी चोर को पकड़ लेना कोई बड़ी बात नहीं है  क्योंकि ऐसा करके तो पुलिस ने अपना काम किया, लेकिन किसी भी पुलिसकर्मी द्वारा किया छोटे से छोटे अपराध॑ भी अखबारों के लिए बड़ी खबर बन जाता है।

भारतीय पुलिस को ‘सुसंगठित अपराधकर्मियों का गिरोह’ ?

न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.एन.मुल्ला ने एक ‘बार भारतीय पुलिस को सुसंगठित अपराधकर्मियों का गिरोह’ बताया था। पुलिस स्टेशन में महिलाओं के साथ बलात्कार, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, निर्दोष लोगों पर घोर अमानवीय अत्याचार और आम जनता को परेशान करना पुलिस के लिए रोजमर्रा की बात है। यातनाओं और यंत्रणाओं के नये-नये तरीके ईजाद करना हमारी पुलिस का प्रिय शगल हैl

यह निर्विवाद तथ्य है कि आजादी के बाद लोगों में अपराध-वृति बढ़ी है। देश में अपराधों की वार्षिक वृद्धि दर 45 प्रतिशत के लगभग है, लेकिन पुलिस द्वारा पकड़े जाने वाले अपराधियों का अनुपात लगातार गिरता  जा रहा है। सरकारी आंकड़ो के अनुसार 72 प्रतिशत मामलों में अपराधी पकडे नहीं जाते है। आज आम लोगों में असुरक्षा की भावना घर कर चुकी है।

रेल या बस में सफर करना निरापद नहीं रहा। सरेआम हत्याएं हो रही हैं, बैंक लूटे जा रहे हैं और जब-तब बम-विस्फोट की घटनाएं भी सुनने में आती रहती है। आतंकवाद का घिनौना चेहरा हमारी पूरी व्यवस्था के लिए एक गम्भीर चुनौती बन चुका है।

अकेली पुलिस ही जिम्मेदार नहीं

वैसे अपराधों की संख्या में दिनो-दिन हो रही इस बढ़ोतरी के लिए अकेली पुलिस ही जिम्मेदार नहीं है। यह भी एक हकीकत है कि पुलिस के वर्तमान सीमित साधनों और जांच की आदिम व्यवस्था शातिर अपराधियों के अत्याधुनिक तरीकों के सामने बौनी साबित हो रही है। फिर सवाल अपराधों की निरन्तर बढ़ती जा रही संख्या का भी है।

पुलिस बल को पर्याप्त तथा आधुनिक साधनों से लैस किए जाने की जरूरत है और इससे औजी ज्यादा पुलिस बल के आकार में वृद्धि करना बहुत जरूरी है। पुलिस का मनोबल बनाएं रखने के लिए यह जरूरी है कि उसे वह समस्त साधन और सुविधाएं मुहैया कराई जाएं, जिनसे वह पूरे मन से अपराधियों से लोहा ले सके।

पुलिस पर अपराध नियंत्रण, जांच, यातायात नियंत्रण, कानून और व्यवस्था बनाए रखने, राजनीतिक सूचना को एकत्र करने और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा का दायित्व है। यदि पुलिस विमाग अपने दायित्वों का भली प्रकार से निर्वाह करे तो अपराधों की संख्या में एक हद तक कमी आ सकती है।

वैसे  पुलिस  आयोग के सुझाव के अनुरूप कानून व व्यवस्था और अपराध नियंत्रण एवं जांच के कार्यो को अलग-अलग किया जाना पुलिस की कार्य कुशलता सुधारने की दिशा में एक उचित कदम होगा।

एक लोकतांत्रिक समाज में, जहाँ नागरिक धीरे-धीरे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रहे हैं, जहां समाज  में समानता पर आधारित आर्थिक और सामाजिक मूल्यों के लिए संघर्ष हो, वहां समाज के विभिन्‍न वर्गों मैं टकराव होना स्वाभाविक प्रकिया हैं।

इस टकराव में पुलिस आम तौर पर प्रशासन और शोषक वर्ग का साथ देती आई है। यही कारण है कि आम जनता को पुलिस में कहीं अपना हमदर्द चेहरा नजर नहीं आया।

सारी विसंगतियों और विकृतियों के लिए केवल पुलिस को ही दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं होगा। पुलिस की भी अपनी कई मजबूरियां हैं। अपराधकर्मी दिनो-दिन आधुनिक साधनों से लैस होते जा रहे हैं, जबकि पुलिस के पास आधुनिक साधनों का सर्वथा अभाव  है। अधिकांश थाना भवन और चौकियां बहुत पुरानी हैं और जर्जर हालत में हैं।

इसी तरह से पुलिसकर्मियों की आवास व्यवस्था भी कई स्थानों पर दयनीय है। उनकी  सेवा शर्ते  अत्यन्त कठोर हैं। करीब 70 प्रतिशत सिपाही बिना पदोन्नति प्राप्त किए सिपाही के रूप में ही सेवा-निवृत हो जाते  है। आवास की समस्या के कारण सामान्यतः पुलिसजनों को अपने परिवार से अलग रहना पड़ता हैं।

पुलिस कर्मियों को संकुचित वातावरण में निर्वाह करना पड़ता है

पुलिस कर्मियों को संकुचित वातावरण में निर्वाह करना पड़ता हैं। ड्यूटी के घंटों की कोई सीमा नहीं रहती। आम आदमी की तरह उन्हें भी महंगाई और कम वेतन की परेशानियों को झेलना पड़ता है। सिपाही आज  भी कई विभागों के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से कम वेतन पाता है। जहां तक कार्य का प्रश्न है तो उसकी लगभग पूरी कार्यक्षमता को निचोड़ लिया जाता हैं|

ऐसी स्थिति में सिपाही का चिड़चिड़ेपन पर उतर कर क्रूर  व्यवहार करना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से कतई अस्वाभाविक नहीं है। पुलिस आयोग ने अपने प्रतिवेदन में पुलिस कर्मियों को आवास की बेहतर सुविधा प्रदान कराने, उनकी शिकायतों का निवारण करने, सेवा शर्तो में सुधार आदि उपायों की सिफारिश की थी। इस दिशा में शीघ्र कदम उठाए जाने चाहिए।

वास्तव में आज पुलिस के समूचे ढांचे और कार्यप्रणाली में आमूल परिवर्तन जरूरी हो गया है। इस बुनियादी समस्या को सुलझाने के लिए समाज और प्रशासन के प्रबुद्ध प्रतिनिधियों को सघन विचार करना होगा।  सभी के मिले-जुले प्रयासों से ही पुलिस की बिगड़ी छवि को सुधारा जा सकेगा और साथ ही पुलिस कर्मियों की  समस्याओं को भी दूर  किया जा सकेगा।

भारत में पुलिस की शुरुआत कब हुई?

भारत के वर्तमान पुलिस विभागों की स्थापना 1843 में हुई जब सर चार्ल्स नेपियर ने औपनिवेशिक आयरिश कांस्टेबुलरी की तर्ज पर सिंध में एक पुलिस प्रणाली की स्थापना की।

भारत में पुलिस प्रशासन की संरचना क्या है?

सहायक पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्य करते हुए अपने वरीय अधिकारी पुलिस अधीक्षक, वरीय पुलिस अधीक्षक, उप पुलिस महानिरीक्षक के प्रति जवाबदेही होती है। … पुलिस महानिदेशक राज्य पुलिस बल का मुखिया होता है। साथ ही आई.पी.एस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर भारत सरकार के खुफिया विभाग इंटेलिजेन्स ब्यूरो (आई. बी) और सी.

भारत की पुलिस व्यवस्था किसकी देन है

भारत के वर्तमान पुलिस विभागों की स्थापना 1843 में हुई जब सर चार्ल्स नेपियर ने औपनिवेशिक आयरिश कांस्टेबुलरी की तर्ज पर सिंध में एक पुलिस प्रणाली की स्थापना की।

बिहार में पुलिस बल की संख्या कितनी है?

बिहार में 1 लाख लोगों की सुरक्षा के लिए सिर्फ 70 पुलिसकर्मी हैं। यहां कुल 70 हजार पुलिसकर्मी हैं। यानी, 1571 लोगों की सुरक्षा के लिए सिर्फ एक जवान है। जबकि, 3600 वीआईपी की सुरक्षा में 13 हजार जवान तैनात हैं।

भारत में कुल कितने पुलिस स्टेशन है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2015 में ऐसी लिस्ट निकलवाने की शुरुआत हुई थी। टॉप 10 की रेस में देशभर के 15,579 पुलिस स्टेशन थे।

भारत में पुलिस का जनक कौन है?

वारेन हेस्टिंग्ज़ और लार्ड कार्नवालिस

पुलिस कमीशन की स्थापना कब की गई?

राष्ट्रीय पुलिस आयोग भारत में 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद पुलिस सुधार के लिये अनुशंसा करने के लिये १५ नवम्बर १९७७ को गठित एक आयोग था। श्री धरम वीर इसके अध्यक्ष थे। इस आयोग ने रिपोर्ट देने की शुरुआत 1981 से की। फरवरी १९७९ और मई १९८१ के बीच इसने कुल आठ रपटें दीं।

पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति कौन करता है?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की कमेटी के माध्यम से ही होगी।

2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल महिला पुलिस कर्मियों की संख्या कितनी है?

2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 17,22,786 पुलिस कर्मियों में से महिला पुलिस कर्मियों की संख्या मात्र 1,05,325 यानि केवल 6.11 फीसदी है.

मॉडल पुलिस एक्ट 2006 क्या है?

विदित हो कि गृह मंत्रालय ने 20 सितंबर, 2005 को विधि विशेषज्ञ सोली सोराबजी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसने 30 अक्तूबर 2006 को मॉडल पुलिस एक्ट, 2006 का प्रारूप केंद्र सरकार को सौंपा।

पुलिस का इतिहास

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भारतीय पुलिस व्यवस्था

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