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देवदासी

देह-शोषण की लम्बी दास्तान

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महिलाएं किसी भी सभ्य समाज की धुरी होती हंै, लेकिन भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को देख कर लगता है कि यह धुरी दिन ब दिन कमजोर होती जा रही है, पुरूष प्रधान समाज ने अपनी सारी परम्पराएं और प्रथाएं स्त्रियों के शोषण हेतु निर्मित की हैं, बाल विवाह, सती-प्रथा या विधवा का सामाजिक जीवन हो हर मुकाम पर शोषण की शिकार महिलाएं ही हंै।
स्त्री के देह-शोषण की एक ऐसी ही अमानवीय परम्परा का नाम है ‘ देवदासी प्रथा ‘। वर्तमान में इस परम्परा का स्वरूप देवदासी को मात्र धर्म द्वारा अनुमोदित वेश्या का दर्जा दिलाने का रह गया है। भारत में देवदासी-प्रथा के प्रचलन का इतिहास बहुत पुराना है। आर्यो के भारत आने से पहले ही यह प्रथा जारी थी। एक धारणा के अनुसार, जब मूर्ति-पूजा के विकास के साथ मंदिरांे का निर्माण प्रारम्भ हुआ, तब उपासना की विधियों में तंत्र-मंत्र के प्रभाव में अभिवृद्धि हुई धर्म को जब राज्याश्रय प्राप्त हुआ तो वैभव-प्रदर्शन से परिपूर्ण भव्य-विराट पूजा- अर्चना के आयोजन होने लगे, ऐसे आयोजनो की भव्यता को बढ़ाने हेतु नृत्य और गायन में पारंगत सुन्दर नवयौवनाओं का उपयोग किया जाने लगा, अनुमान है कि यहीं से देवदासी-परम्परा की शुरूआत हुई होगी। तीसरी शताब्दी के पूर्वाद्ध में यह प्रथा अधिक जोरों से प्रचलन में आई। लेकिन उस समय तक इसका स्वरूप विशुद्ध धार्मिक था। पल्लव व चोल वंश के शासकों के शासन काल में यह प्रथा काफी फली फूली उस समय देव-दासियों को नृत्य कला, संगीत-कला आदि का प्रामाणिक प्रतिनिधि माना जाकर उन्हंे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
एडगर थस्र्टन ने अपनी पुस्तक ‘ कास्टस् एंड ट्राईन्स इन सदरन इंडिया ‘ में भारत में देवदासी-प्रथा पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि ग्यारहवीं सदी में चोल वंश के राजराजा चोल के शासन काल में तंजौर के राजेश्वर मंदिर में 400 देवदासियां थीं। इसी प्रकार गुजरात के सोमनाथ मंदिर में 500 देवदासियां होने के प्रमाण मिलते हैं। प्रारम्भ में देवदासियों के क्रिया कलापों का स्वरूप विशुद्ध धार्मिक आयोजन तथा नृत्य व संगीत द्वारा मंदिरों में सेवा अर्चना करने तक सीमित था।
विजय नगर शासन-काल के दौरान देवदासी प्रथा के महत्व का अवमूल्यन होना प्रारम्भ हुआ, धीरे-धीरे उनका कार्य मंदिर में देवी की सेवा करना भर नहीं रह गया बल्कि राजाओं और सामन्तों की काम वासना को शांत करना भी हो गया। इस नैतिक पतन में देवदासी क्रमशः सरकारी मुलाजिम, पुजारी, पैसे वाले लोगों के भोग-विलास की वस्तु बनती गई और आज स्थिति यह है कि देव दासियां एक प्रकार से धार्मिक मान्यता प्राप्त वेश्याओं की घिनौनी जिन्दगी व्यतीत कर रही हैं।
भारत में देवदासी-प्रथा मुख्यतः कर्नाटक में बारवाड़, बीजापुर, महाराष्ट्र के कोल्हापुर तथा उŸार भारत के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। अन्य सामाजिक कुप्रथाओं की भांति यह प्रथा भी समाज के कमजोर और दलित वर्गो में ही अधिक व्याप्त है। देवदासी प्रथा का मुख्य केन्द्र कर्नाटक राज्य के सौदंती ( बेलगांव ) कस्बे में एक पहाड़ी पर स्थित देवी यल्लम्मा का मंदिर है। प्रतिवर्ष माघ माह की पूर्णिमा को यहां एक विराट मेला लगता है। इस मेले में हर साल करीब चार पांच हजार अबोध बालिकाआंे को देवी को समर्पित कर ‘ देवदासी ‘ बना दिया जाता है। एक अनुमान के अनुसार आजादी के बाद पिछले चालीस सालों में करीब तीन लाख बालिकाएं देवदासी बनाई जा चुकी हैं।
अपनी पुत्रियों को देवी यल्लमा के चरणों में समर्पित कर देवदासी बना दिए जाने का प्रमुख कारण है – मनौती अथवा मिन्नत, जैसे घर में किसी की बीमारी ठीक होने, किसी संकट के टलने पर लोग मनौती पूरी करने के लिए अपनी कन्या को देवदासी बना देते है। इसी प्रकार पुत्र-हीन दम्पŸिा पुत्र प्राप्ति की मिन्नत पूरी होने पर अपनी पुत्री को देवी को समर्पित कर देते हैं। इसके अतिरिक्त किसी के सिर के बाल चिपक जाने, जिसे ‘ जटा बनना ‘ कहा जाता है, को भी मा यलम्मा का निमंत्रण मानकर उसे देवदासी बना दिया जाता है।
कन्या को देवी यल्लमा के चरणों में समर्पित करते समय जो रस्में पूरी की जाती हैं, वह सारी वैवाहिक रस्मों से मिलती जुलती होती है। समर्पण वाले दिन देवदासी बनने वाली कन्या को मंदिर से तीन मील दूर स्थित ‘ जोगुला बणी ‘ नामक कुए के जल से स्नान करवाया जाता है। उसे निर्वस्त्र अवस्था में नीम की पŸिायों की एक माला पहनाई जाती है और उसी स्थिति में एक जुलूस के साथ पैदल मंदिर तक लाया जाता है, मंदिर पहुंचने पर बालिका को दोबारा नहलाया जाता है और मंदिर की परिक्रमा करवाई जाती है। इसके पश्चात् पुजारी द्वारा पूजा व आरती की जाती है। फिर पुजारी उस कन्या का विवाह देवी के साथ सम्पन्न करवाता है एवम् कन्या को मंगल-सूत्र प्रदान करता है। यह मंगल-सूत्र इस बात का प्रतीक होता है कि उस बालिका का विवाह देवी के साथ हो चुका है और अब उसे किसी पुरूष से विवाह करने का अधिकार नही रहा है।
देवदासियों की सामाजिक जिंदगी अत्यन्त दयनीय होती है। विवाह के अधिकार से वंचित होने के बाद भी यह किसी एक पुरूष के साथ अधिकतम दो वर्ष की अवधि तक रह सकती हैं, लेकिन इस दौरान पैदा हुए बच्चे अवैध ही माने जाते हैं। अधिकांश देवदासिया महानगरों में दलाल के माध्यम से वेश्यावृति कर अपना जीवन यापन करती है। यौवन के अवसान के बाद इनके समक्ष दाल रोटी की समस्या हमेशा मुंह बाए खड़ी रहती है। इसलिए प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में देवदासियां अक्सर भीख मांग कर अपना गुजारा करती है।
देवदासी प्रथा के उन्मूलन तथा इनकी दशा सुधारने हेतु सरकार ने समय-समय पर कई कानून बनाए लेकिन अन्य सामाजिक समस्याओं की तरह देवदासी-प्रथा के उन्मूलन हेतु केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए शिक्षा और ज्ञान का प्रचार प्रसार अत्यन्त आवश्यक है। सामाजिक जन-जागरण के साथ कानूनों का सख्ती से पालन किया जाना भी आवश्यक है। दलालों के खिलाफ कठोर कारवाई वृद्ध देवदासियों को पेंशन, सरकारी नौकरियों में देवदासियों व उनकी संतानों के लिए उचित आरक्षण, देवदासी पुत्री को अपने पिता की सम्पŸिा में अधिकार दिया जाना आदि बातें इस कुप्रथा के उन्मूलन हेतु अनिवार्य है।